Tuesday, January 29, 2019

गाँधी

अर्रे मुझसे छुप क्यों रहे हो,मेरे करीब आओ,मेरे पास बैठो।तुमने मुझे गोली मारी,मुझे ज़रा भी दुःख नही।तुम मुझसे नाराज़ थे,बहुत बार नाराज़गी में ऐसे कदम उठ जाते हैं।मुझे आज नही तो कल मरना ही था।आखिर कितना जीता मगर यक़ीन करो गोडसे मैं तुम्हारे काम से रत्ती भर नही नाराज़ हूँ।तुमने तो वोह किया जो तुमने अपने संगठन के बड़ो से सीखा।मुझे तुम्हारी फाँसी पर अफसोस है।जब तुमको मुझे मारने के जुर्म में फाँसी दी जा रही थी तब मैं तड़प रहा था।

मैं ठीक उस वक़्त चाह रहा था की काश मैं ज़िंदा होता और तुम्हे अपनी चादर में छुपा साबरमती आश्रम लिए जाता।मुझे पता है जब तुमने मुझपर गोली चलाई तो तुम मुझसे हद दर्जे नफ़रत करते थे।मगर गोडसे मैं फिर कह रहा हूँ की तुम्हारे साथ जो किया गया।जो मेरे ख़ून का बदला लिया गया।भले कानून का ही सहारा लिया गया हो फिर भी यह गाँधी का रास्ता नही था।तुम्हे पता है मुझे कब सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ पहुँचती है जब कोई कहता है"गाँधी हम शर्मिंदा हैं-तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं"।सोचो यह नारा,किसी की मौत की कामना का नारा गाँधी को कितना शर्मिंदा करता है।

आओ मेरे पास आओ मैं तुम्हारे पाँव के काँटों को निकाल दूँ।तुम्हे जो तक़लीफ़ मुझे खत्म करने के बाद मिली,मेरी नज़र में नही मिलनी चाहिए थी।गोडसे अगर मुमकिन होता की मैं ज़िंदा हो सकता तो तुम मान लो मैं तुम्हारे हाथ से तमंचा लेकर चरखा पकड़ा देता।भले ही तुम फिर मुझे गोली मार देते।मैं फिर उठकर तुमसे कहता यह सारे लोग मेरे अपने हैं।तुम फिर चाहे गोली मार देते

गोडसे ने गाँधी जी से अपनी रोई हुई,भरी आँखों से कहा की क्या आपने मुझे माफ़ कर दिया।तब वोह बोले,हम नाराज़ ही कब थे।हाँ नाराज़गी तुम्हारी सोच से थी।तुम्हारे दिल में उठती नफ़रत से थी।किसी को अपना न समझने से नाराज़गी थी।अगर हो सके तो यहाँ से अपने लोगों के लिए प्रार्थना करो की वोह नफ़रत से दूर रहें।

आओ तुम्हे यहाँ हर उससे मिलवाता हूँ जिसे किसी न किसी ने अपनी सोच के खिलाफ चलते शहीद कर दिया है।देखो भगत सिंह भी तुमसे नाराज़ नही हैं।मान लो हम सबकी लड़ाई तुमसे या किसी इंसान से नही थी,हम तो नफ़रत वाली सोच के खिलाफ थे।इंसान को इंसान का गुलाम बनाने के खिलाफ थे।खैर छोड़ो और सुकून से यहाँ रहो।
गोडसे रोता हुआ उनके पाँव में झुका जैसे आजके ही दिन भीड़ के सामने वोह गाँधी के कदमों में झुका था।मगर जब सर उठाया तो उसकी आँखे रो रोकर लाल हो चुकी थीं और गाँधी उसके सर पर हाथ रखकर कह रहे थे,नफरत को जीत लो तो सुक़ून मिलेगा।तुम्हारी बेचैनी दूर होगी।उसने रोते हुए तीन बार कहा"महात्मा,महात्मा,महात्मा गाँधी"

Monday, January 28, 2019

विचार

बदन की खूबसूरती तब दिखेगी,जब लिबास से नज़र हटेगी । रूह की खूबसूरती तब दिखेगी जब बदन से नज़र हटेगी । मेरी खूबसूरती तब दिखेगी,जब रूह से नज़र हटेगी...रूह के बाद जो है, वह मैं हूँ......

Friday, January 25, 2019

26 जनवरी

हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई, गोरा,काला, ऊँचा, नीचा, गरीब,अमीर,औरत,आदमी,बच्चे,बूढ़े,जवान सब की पहचान मिटकर आज के ही दिन 'हम भारतीय" की हो गई थी । आज ही सारे फ़र्क मिटाकर,हम भारत के लोग एक मुट्ठी बन गए । जो आज भी भारत के इस मूल तत्व एकता के साथ हैं । उनके लिए यह महान दिन है ।जो आज भी बंटे हुए हैं या बाँटना चाहते हैं, उनके लिए यह अफ़सोस का दिन है क्योंकि उनके घिनौने ख्वाबों पर हमारे पुरखों ने पानी डाल दिया था ।

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाओं के साथ यह दोहराइये
भारत यह था,यह है,और यही यही रहेगा.......

"WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved to constitute India into a SOVEREIGN, SOCIALIST, SECULAR ,DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;

LIBERTY of thought , expression, belief, faith and worship;

EQUALITY of status and of opportunity; and to promote among them all

FRATERNITY assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation;

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this twenty-sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION"

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा
उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा
इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

Wednesday, January 23, 2019

घर से बड़ा घर

एक बड़ी सी कालोनी में एक लड़के का बड़ा से घर था । घर मे ऊँची दीवारें,खूबसूरत फर्नीचर,उम्दा पेड़ पौधे,ज़बरदस्त लाइट भी थीं । ज़ाहिर है कालोनी में और भी घर थे,कुछ इससे बड़े कुछ छोटे,कुछ खूबसूरत तो कुछ कम खूबसूरत ।
लड़का अक्सर छत पर खड़ा किसी घर की छत पर रखे गमलों की तारीफ करता,तभी बाप झल्लाई हुई आवाज़ में कहता तुम्हे अपने घर के पेड़ नही पसन्द आएँगे, कमबख्त घर से मोहब्बत नही,लड़का मन मसोस लेता ।
कभी खड़ा होकर किसी और घर की दीवारों की तारीफ कर देता की उसका रंग बड़ा खूबसूरत है, बाप फिर खफा की कमीने को अपने घर के रंग की तारीफ नही करनी,दूसरों की करनी है ।एक दिन तो हद ही हो गई कि रास्ते मे एक घर की चमकती लाइट पर लड़के ने कहा,यह रोशनी कितना सुकून दे रही कि बाप ने हाथ ही उठा लिया । तुम्हे अपने घर की रोशनी नही पसन्द मनहूस,जो यह सुकून देती है । लड़का रो दिया,क्योंकि वह बाप को यह समझा नही सकता था कि दूसरे की तारीफ का मतलब अपनी बुराई करना नही है ।

वह लड़का नही कह सकता कि हमारी दीवारों में सीलन आ चुकी है  कुछ पुरानी हो चली हैं उनकी मरम्मत की ज़रूरत है । वरना कुछ बारिश में ढह जाएँगी । बाप यह बर्दाश्त ही नही कर सकते क्योंकि उनकी आँखों मे आज भी वह सर्वश्रेष्ठ हैं । उनके बराबर का कोई नही ।उनसे बढ़कर कोई नही ।उनसे बुलन्द कोई नही ।उनसे ज्ञानी कोई नही । उनसे खूबसूरत ज़ुबान कोई नही । उनसे बेहतर ज़ायका किसी का नही ।उनसे अच्छा कोई नही ।

लड़का यह नही बता सकता कि स्वकेन्द्रित होना मानसिक बीमारी है ।दूसरों की अच्छाई या तारीफ से चिढ़ना फ्रस्टेशन है । यह खुद से हारे हुए इंसान का फ्रस्टेशन है कि उसमे सुधार हो नही सकता,वह बढ़ नही सकता ।
लड़का जो बाप को देख रहा है । उसे पता है एक दिन जब ज़मीन बेचैन होकर गर्मी बढ़ा देगी । पँखो को चलाने वाली बिजली उसकी हवा थाम देगी ।बादल जो बरसेंगे कम और उमस ज़्यादा बढ़ाएंगे ।
तब कमरों से जिनमे बाप ने खुद को कैद कर रखा है ।छत पर जाएगा,और एक हवा के झोंके के लिए नंगी पीठ पलँग पर लेटकर आसमान तकेगा ।दिल कहेगा कि ए बादल बारिश ला दे,मन कहेगा कि ए दूर लगे वृक्षों हवा को चला दे ।

एक अदद सुकून की नींद के लिए वह नही सोचेगा की उस हवा देने वाले पेड़ से अच्छे उसके घर मे पौधे हैं ।वह नही सोचेगा बादलो से अच्छी उसकी छत है । बाप को जानना होगा कि दुनिया बहुत बड़ी है, उसके पास बहुत कुछ है जो बाप ने देखा भी नही । दुनिया उसके घर,मोहल्ले,शहर,देश से आगे एक बहुत बड़ा गोला है, जिसमे हर तरफ शुरुआत है और अंत है ।

लड़का चीखकर कहना चाहता है कि बाप अब बाप मत बनो । बाप बनना है तो लड़के की ज़िंदगी मे रंग भरो,हवा भरो,खुशबू भरो,प्रेम भरो....दुनिया की तारीफ करो,उससे प्रेम करो,उसके गले लगो...खुद में कैद होंगे तो रोगी बनोगे । खुद में आज़ाद होंगे तो इंसान..समाज का लड़का बनें, बाप मत बने,वरना बहुत सी आज़ाद सांसो के हत्यारे बन जाएंगे..

Tuesday, January 22, 2019

सुभाष बाबू

लोग मर रहे थे।पूरा शहर हैजा की चपेट में था।कहीं बच्चे की लाश पर माँ तड़प रही थी तो कहीं औरते सुहाग की चूड़िया तोड़ रही थीं।कहीं बीवी को खोने के ग़म में कोई आदमी छुपकर फफक कर रो रहा था।शहर का मशहूर बदमाश हैदर खान का भी परिवार हैज़ा की गिरफ्त में था।हैदर खान खूँखार था मगर हैज़ा के आगे एक न चली।सबका ख़ून एक झटके में बहा देने वाला अपने परिवार को हैज़ा के सामने बेबस देख रहा था।

तभी नौजवानो का एक दल आता है।जिसका नेतृत्व एक खूबसूरत नौजवान कर रहा है।वोह हैदर खान के घर में फैली गन्दगी को साफ़ करने लगते हैं।यह दल पूरे शहर में सफ़ाई अभियान चलाकर हैज़ा से निपट रहे थे।हैदर खान दरी पर पड़ा पड़ा लड़को को सफ़ाई करते हुए देखता है।जब सफ़ाई हो जाती है तो लड़को से वोह पूछता है तुम हमें जानते हो।मैं एक खूँखार बदमाश हूँ।मेरी चौखट पर डर के मारे लोग नही आते।मुझसे कोई मिलना पसन्द नही करता।

तब दल का नौजवान लीडर कहता है ए हैदर खान हमें पता है तुम क्या हो।तुम इतनी ताक़त के बावजूद हैज़ा के आगे बेबस हो।मेरे लिए तुम्हारी तक़लीफ़ दूर करना ज़रूरी है।हम सब शहर की सफ़ाई करके हैज़ा से लड़ रहे हैं।तुम्हारे घर में इतनी गन्दगी थी की उसे तो साफ़ करना ही था।तब हैदर खान कहता है तुमको क्या लगता है की तुमने मेरा घर साफ़ किया है।तुमने तो मेरा मन साफ़ किया है और यह कहता हुआ हैदर खान उस नौजवान केगले लग कर रोने लगा।साथ ही बदमाशी छोड़ समाज के लिए लग गया।

अब सुनिए यह नौजवान कौन था।आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को गढ़ने वाले,गाँधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता कहने वाले,देश के सबसे ज़्यादा दिलों पर राज करने वाले नेता जी सुभाष चन्द्र बोस।उनके शौर्य और संगठन और क़ाबलियत को लेकर बहुत से किस्से याद हैं।मगर आज उनकी पैदाइश के दिन उस शुरआत को बताना ज़रूरी था जो एक लीडर को गढ़ता है।

सुभाष को मानने वाले सुभाष की ज़िन्दगी से सीख आगे बढ़ते हैं।सुभाष के विचार और मार्ग को खत्म करने वाले उनको गाँधी,कांग्रेस और दूसरे विवादों में उलझाते हैं।वोह सुभाष की ज़िन्दगी के खूबसूरत पलो पर बात नही करेंगे।उनकी दिल जोड़ने की कोशिश को नही समझेंगे।उनके भारत के हर नागरिक और धर्म के प्रति मोहब्बत को नही बताएँगे।यह तोड़ने वाले लोग नेता जी के जीवन से सिर्फ विवाद ही खोजकर लाते हैं।उन नफ़रत फैलाने वालों को अपना काम करने दें।आप नेताजी के जन्मदिन पर उनकी ज़िन्दगी के बड़े कदमो,त्याग,प्रेम,सेवा,राष्ट्र प्रेम,समर्पण,संगठन क्षमता के किस्सों को आम कीजिये।

Monday, January 21, 2019

रोशन सिंह

"ज़िंदगी जिंदा-दिली को जान, ऐ रोशन
वरना कितने ही यहाँ रोज़ फ़ना होते हैं"
इलाहबाद की नैनी जेल से जब यह शेर बाहर आया तब इसके पीछे पीछे एक जनाज़ा भी बाहर आया।उस जनाज़े को उठाने के लिए जेल के बाहर एक क़तार लगी हुई थी।लोग एक झलक अपने महबूब दोस्त को देखना चाह रहे थे।औरतें,बच्चे आदमी सब इंतज़ार कर रहे थे उस नौजवान को देखने के लिए।

जेल में इस नौजवान ने फाँसी के फंदे को खूबसूरती से चूमा था।अपनी आखरी काल कोठी को सिर्फ इसलिए प्रणाम किया की ईश्वर की दी हुई यह आखरी छत थी।अब वोह सीधे उस ईश्वर से पूछेगा की हमे तो आज़ाद कर दिया मेरी माटी को कब गुलामो से आज़ाद करोगे।शायद ईश्वर उसकी आँखों में आँखे डालकर कह दें,बस अब,आजही।

शाहजहाँपुर के इस नौजवान का नाम रोशन सिंह है।जिन्होंने आज ही जन्म लिया था।जो गाँधी के आह्वाहन पर घर बार छोड़ आंदोलन में कूद गए।भगत सिंह और दूसरे साथियों के सम्पर्क में रहकर आज़ादी के ताने बाने बुने।आखरी में गिरफ्तारी के बाद क्राँति की सबसे खूबसूरत चौखट फाँसी तक पहुँचे।इकलौता ऐसा क्रन्तिकारी जो बेहद धार्मिक होते हुए बेहद मोहब्बत से दूसरे मज़हब की खुशबू बिखेरता रहा।यह नौजवान जेल में गीता का पाठ करते हुए हर एक को मोहब्बत और भाईचारे से जोड़ने का नुस्खा बाटता रहा।

आज आप सबको ठाकुर रोशन सिंह को पढ़ना होगा।यह आज़ादी गाँधी की मज़बूत पकड़ और रोशन सिंह जैसे क्रांतिकारियों की फाँसी से उपजे बीज का परिणाम है।देखिये इन लोगों ने कैसे समाज को एक एक करके जोड़ा था।यह भी देखिये इनके दिलों में कौन सा धर्म था,जो आपके दिलों से दूर हो रहा है।वोह कौन से लोग थे जो गीता को आत्मसात करके बाइबिल और कुरान वालों को एक कर रहे थे।

अभी कह रहे हैं ढूंढिये,उन किरदारों को पढ़िए,तभी रास्ता दिखेगा वरना भरम में जीये।ठाकुर रोशन सिंह की शहादत पर सर झुक जाता है।आज आपका जन्मदिन है, सलाम की आप थे।आपके होने की वजह से आज हम हैं।हम सब तब तक रहेंगे जब तक हममे आपस मे प्रेम रहेगा...

Saturday, January 19, 2019

सरहदी गांधी

लोहे की मोटी मोटी जंज़ीरों से पैरों का गोश्त फट गया था।गोश्त और ख़ून दोनों बाहर आ रहे थे।वोह बूढ़ा इंसान उस ज़मीन में क़ैद था जिसे उसका कहकर उसे दिया गया था।इशारों पर चलने वाले उसके दोस्तों की ज़बानों में हुक़ूमत का ज़ायका लग चुका था।साथ के लोग भी अब उसकी तरफ मुड़कर नही देखते की उसे देखते वक्त कहीं आँखे न झुक जाएँ।
जिस किसी ने ज़मीन के बटवारे को रोकना चाहा था उसे या तो क़ैद मिली या गोली।एक भीड़ थी जो महात्मा को मार देना चाह रही थी तो एक भीड़ दूसरे महात्मा की खाल ज़ंज़ीरो से खीच लेना चाह रही थी।मैं आज यह क्यों लिख रहा हूँ ताकि तुम देखो की भेड़िये कैसे होते हैं।

खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान को जब महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान भेजा तब वोह दर्द के साथ बोले गाँधी जी आपने मुझे भेड़ियों के हवाले कर दिया मगर खान बाबा इधर के भेड़िये नही देख पाए।उधर के भेड़ियों ने सरहदी गाँधी को जंज़ीरों से बाँध कर कैद कर दिया और इधर के एक भेड़ियों के झुँड ने महात्मा गाँधी को शहीद कर दिया।
मेरी नज़रों के सामने गाँधी और सरहदी गाँधी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं।आज बादशाह खान की पुण्यतिथि है तो ठीक 10 दिन बाद महात्मा गाँधी की शहादत का दिन है।

दोनों की मोहब्बत और एक दूसरे के साथ हद दर्जे तक खड़े रहने की मिसाल कम ही हैं।खान बाबा हम सबकी रौशनी हैं।भारत से बेहद मोहब्बत और अपनेपन ने,उन्हें आज़ादी के बाद भी दशकों पाकिस्तानी जेल में रखा।हो सके तो आज ढूंढकर उनहे पढ़िए उनके ख़ुदाई खिदमतगार को महसूस कीजिये।बादशाह खान की इंसानियत की देखिये।उनकी तरफ नज़रें कीजिये,एक सौंधी सी खुशबू आएगी जिसमे अथाह सुकून होगा।आज बेचैन दिलों के साथ मोहब्बत और ख़िदमत की मिसाल खान साहब को याद करने का दिन है...

Thursday, January 17, 2019

मंटो

गुज़री रात सोचा की लिखें,सुबह सोचा की लिखें,दोपहर में सोचा की लिखें,शाम में सोचा,सोचते सोचते रात हो आई।जनाज़ा सामने रखा रहा,कुछ कहानियाँ मक्खियों की तरह कफ़न पर भिनभिना रहींथीं।उठकर उन्हें उड़ाता की ऊँगली में फंसे अल्फ़ाज़ गिर जाते।

होते होते रात हो आई,कहानियाँ अब उड़कर अपनी अपनी कबरनुमा कोठियों में चली गई,अब मुर्दा सुक़ून से लेटा है।अब अँधेरे में उसके पाँव के पास सर रखकर रोते हुए कह सकता हूँ की ऐ मंटो,तुम भी चले गए।अँधेरे में चीखकर कहूँगा की आज मंटो मर गया,चलो उसका सोग मनाते हैं, उससे पहले की सुबह कहानियाँ फिर उड़कर आएं, चलो उसे कब्र में दफना आएं, शायद मंटो वहाँ सुक़ून पा जाए...
अच्छा भला मंटो को कब्र में भी सुकून कहाँ होगा ।लेटा लेटा वहां भी कहानियाँ बुन रहा होगा ।हश्र के रोज़ वह ख़ुदा के सामने इन कहानियों को खोलेगा । जब वह मुर्दों पर से सड़कर झड़ते कफ़न और उससे बाहर आते नंगे जिस्म की सच्चाई लिखेगा तो कौन कहेगा कि मंटो,मुर्दो को तो कपड़े पहने दो । जब मंटो के जिस्म को कीड़े खा रहे होंगे तो वह तड़प नही रहा होगा बल्कि कह रहा होगा और आओ,हमे नोच नोच खाकर अपनी भूख मिटा लो,तुमसे पहले और इस क़ब्र के ऊपर भी लोग हमें नोच रहे थे ।अपनी भूख मिटा रहे थे ।जब उनकी भूख मिट गई तो मुझे यहां कब्र में तुम्हारे सामने फेंक दिया ।

ए कीड़े मकोड़ों आओ और जल्दी जल्दी मुझे नोच लो अगर तुम जिस्मो में मज़हब का परहेज़ न करते हो  ।
मैं यही सोचता रहा कि मंटो को आखिर सुकून कहाँ होता,तब मंटो ने एक जोरदार हाथ मारने की आवाज़ मुँह से निकाली, क्योंकि मंटो तो चींटी भी नही मार सकता था तो हाथ क्या मारता । चीखकर बोला, सुकून होता तो मंटो मर जाता ।बेचैनी है, तो मंटो है, जब तक बेचैनी रहेगी मंटो मरेगा नही...उसकी मौत का दुख मत मनाओ बस बेचैन फिरते रहो, मंटो बेचैनी के पीछे पीछे चलता जाएगा.....

Tuesday, January 15, 2019

यह चार्जशीट

हाँ तो अब जब चार्जशीट की शीट बिछ ही गई है तो पर्दे के दूसरी तरफ़ भी देख लीजिए । कन्हैया या उमर ख़ालिद ने क्या कहा और क्या किया यह जगज़ाहिर है । सबके अपने हिस्से के सच हैं और सबके अपने बुने झूठ ।  दो हज़ार सोलह हो या सत्तरह इसे ग़ौर से देखिए,फिर अट्ठारह को देखिए उसके बाद उन्नीस जो गुज़रेगा उसे भी गुज़र जाने से पहले देख सकते हैं ।

आपको याद होगा जब टीवी पर कनहैया और उमर थे और उनके सामने मोदी थे,जो बेहद मजबूत थे ।सोलह में देशद्रोही वर्सेज़ देशभक्त चला,जिसका सबकुछ मोदी को हासिल था और बचा खुचा इन दोनों को मिला था ।हर एक जो मोदी के खिलाफ था वह इनके साथ था ।इन दोनों की जंग में जो सहमी खड़ी थी,वह कांग्रेस थी और जो बिना तवज्जो खड़ा था,वह राहुल गाँधी था ।
फिर वक़्त गुज़रा और सत्तरह के आखरी महीनों के साथ सन अट्ठारह आया ।कनहैया और उमर चैप्टर किनारे लग चुका था ।अब सामना था मोदी और राहुल का ।एक तरफ थे मोदी तो दूसरी तरफ उनकी मुखालफत करती हर ताक़त थी राहुल की ओर । कनहैया और उमर थे ज़रूर मगर सोलह और सत्तरह की काँग्रेस और राहुल की तरह । राहुल को हमदर्दी मिलती गई और उनकी मेहनत पर मोहर लगती गई जिससे मोदी के कई किले एक साथ ध्वस्त हो गए ।

अब आया उन्नीस यानी चिंतन का वर्ष । उसी कमरे के वही चार लोग फिर इक्ट्ठेहुए जो सन दो हज़ार नौ में इक्ट्ठेहुए थे । फ़ैसला सुनाया की जाओ और वह रजिस्टर खोलो जो जेएनयू वाला है, कृपा वहीं अटकी है ।

अब एकबड़ा हिस्सा कनहैया और उमर की चार्जशीट पर बहस करेगा । उनपर डिबेट होगी ।वह सेंटर में होंगे जिसके हर ओर मोदी होंगे और कांग्रेस राहुल संग किनारे खड़ी इस कठपुतली नाच को देखेगी ।अगर वह इसे छुएगी तो जलेगी,दूर रहेगी तो बहुतों से दूर होगी ।खामोश होगी तो चहुँओर मोदी मोदी होंगे । क्योंकि उन्हें पता है उनका आख़री मुकाबला चुनाव में होना है जिसमे सीधे सामने कांग्रेस होगी । यदि यह केंद्र बदल जाए और मुकाबले के दूसरे जनाधारविहीन चेहरे बड़े दुश्मन बनाए जाएं तो विराट पुरुष घोड़े की ढाई घर की चाल चल सकता है ।
यह सब हो सकता है क्योंकि होता आया है ।टीवी जिसको दिखाएगा,वह ही माहौल बनाएगा ।एक बात गिरह बांध लीजिये कन्हैया हों या उमर,यह सब किसी की कुर्सी की गर्मी बनी रहे,उसका ईंधन भर हैं ।हम सब भी सत्ता का ईंधन ही हैं ।
कुर्सी के लिए बहुतों को बदनाम किया जाता है । बिन पेंदी के लोटों को मशहूर किया जाता है । दुश्मन को मक़बूल होने से पहले पर्दे से हटाने के खेल होते हैं । कुछ अवाम जान जाती है तो कुछ कभी नही जान पाती ।
फ़िलहाल राहुल पर्दे से हटे और उनसे ज़्यादा दूसरों पर बात हो तब तो यह फँसा पहिया निकल सकता है वरना नही क्योंकि राहुल को सामने रखकर लाख कोशिश के बावजूद वह लड़ाई देशद्रोही बनाम देशभक्त नही बना सकता । राहुल ने थोड़ा सा धर्म वाला हिस्सा भी हथिया लिया इसलिए उससे धार्मिक लड़ाई भी उतनी आसान नही ।इसके लिए खुद नए दुश्मन बनाए जाएँ, उनमे वह हवा भरी जाए जो वह निकाल सकें ।

एक और आखरी बात देश चुनाव मोड पर जा चुका है । अब हर गतिविधि के तार लोकसभा में करंट ही दौड़ाएंगे ।हर कदम की एक ही दिशा है, लोकसभा चुनाव । नज़दीक़ से देखिए,हम यह नही कहते कि किसे चुने और किसे चुने,बस हर उसे चुने जो कम से कम आपको हर बार उन्हें चुनाव में चुनने का तो मौका देता रहे ।

कनहैया और उमर पर यह चार्जशीट कम है, यह तो राहुल को बहस से बाहर करने की कोशिश है । देश को देशद्रोह बनाम देशभक्त की फ़िज़ूल गढ़ी हुई वेब सीरीज़ में झोंकने की कोशिश भर है । जिसको कुछ एंकर चटखारे के साथ परोसेंगे और घर घर मे नफरत की अँगीठी दहकाएँगे ।एक दिन न मोदी रहेंगे और न राहुल और न ही कोई और मगर कुछ पन्ने रहेंगे ।जिनपर दर्ज रहेगा कि राजाओं ही ने नही बल्कि जनता द्वारा,जनता केलिए चुने हुए सेवकों ने खुद को सेवक बनाए रखने केलिए क्या क्या छल,प्रपंच नही किये ।हम आज भी इंतेज़ार में हैं कि कोई बताए तो सही की यह कौन सी चीज रह गई है जिसे हमने राजनीति में इस्तेमाल न किया हो....

Monday, January 14, 2019

मायावती

वह यूपी के मामूली से गाँव में,बेहद मामूली परिवार में पैदा हुई।बाप घर में बेटा चाहते थे,एक के बाद एक तीन लड़कियो के बाद छ लड़के पैदा हुए जिनमे वह सभी लड़को से बड़ी थी।दिल्ली के इन्द्रपुरी की झुग्गी झोपड़ी में नौ भाई बहनों मे पली बढ़ी।
उस वक़्त दिमागी सीलन,पिछड़ेपन,सामाजी तौर पर अछूत दँश को सहते हुए लड़की होना किसी गुनाह से कम नहीं था।वही लड़की को एक धुन थी की आईएएस बनकर अपने समाज को आगे बढ़ाना है।वह सब दूर करना है जो उसने झेला है।वह आईएएस नही बन सकी।बीएड के बाद साधारण टीचर रहकर लॉ में एडमिशन ले लिया ताकि अपनों के लिए लड़ पाए।वह तमाम मुश्किलो से लड़ी।हर एक गलत को जवाब दिया।

यहां तक उस दौर के वरिष्ठं नेता राजनारायण को उनकी ही सभा में उसने अपने तीखे सवालों से खामोश कर दिया।इतना सख्त विरोध किया उस मामूली सी लड़की ने की राजनारायण वापिस जाओ के नारे से हाल गूँज गया।उसी निर्माण काल में एक गुरु ने उसे गुन सिखाया।वह IAS ना बनकर सिस्टम के सिर्फ एक पेंच की जगह,पूरा सिस्टम ही बन गई।डाकघर में नौकरी करने वाले जिस बाप ने नौ बच्चों में लड़को के मुकाबले लड़कियो को नकारा, उसकी इस बेटी ने इतिहास रच दिया।संसद की चौखट पर जब उसके पसीने की बदबू से एलीट महिलाओ ने नाक पर रुमाल धर कर उसे नीचा दिखाया।तब उसने सियासत और समझ की वह खुशबू बिखेरी की एलीट क्लास ध्वस्त हो गया।

उसका उगना और छा जाना हमारे लोकतन्त्र का जादू ही था।मैं बात कर रहा हूँ मायावती की।उनके संघर्ष की।कभी ना टूटने वाली जीवटता की।सीखे वह लोग जिन्हें समाज को आगे बढ़ाना है।दो चोटी धरकर मायावती ने किसी ज़माने में पैदल और साईकिल से चलकर अगड़ो से जूझकर मिसाल रखी थी।कमज़ोर के गले की आवाज़ बनकर वह मुल्क़ में गूँजी थी।

आज फ़ख्र से हाथ हिलाती माया के पीछे वह संघर्ष है जो ज़्यादा बाहर नही आया।माया का बचपन वह था जिसका उसने कभी चीख चीख कर ढिंढोरा नही पीटा।मेहनत से देश के सबसे बड़े स्टेट की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर दिखा दिया।मैं राजनीती की जगह लीडरशिप पर बात कर रहा हूँ।लीडरशिप पैदा करना एक बड़ी कला है।बतौर लीडर मायावती के संघर्ष और विकास की दास्तान इतिहास के सुनहरे वरखों में दर्ज हो चुकी है।हो सकता है संघर्ष और महत्वकांक्षाओं के उस दौर में बहुत सी गलतियां की हों या रास्ते डिगे हों फिर भी मायावती की मेहनत और लगन को दरकिनार नही किया जा सकता।

आज मायावती का जन्मदिन है।हम चाहते हैं माया पीछे मुड़कर देखें उस वक़्त को जब काशीराम उनको दलित समाज की कमज़ोरी को दूर करने के ताबीज़ दे रहे थे और वोह बेलौस,बेधड़क उस दर्द को मिटा देने की चाहत रखती थीं।राजनीती के अवसान से पहले वोह कुछ ऐसा कर जाएँ की उनका संघर्ष ज़बानों पर आ जाए।इस वक़्त उनकी ज़रूरत हमेशा से ज़्यादा है, वक़्त के इस मोड़ को मायावती पहचान लें।जन्मदिन की खूब मुबारकबाद।