Friday, December 30, 2016

ओह 2017

तुम चले गए।जैसे हमेशा जाते थे।कुछ खटास ,कुछ मिठास,कुछ नमकीन छोड़ गए।तुम्हारा जाना हमेशा खला।दिल में इस वक्त सिर्फ़ और सिर्फ तुम हो।मेरे इस दिल,धङकन और सांसों में सिर्फ तुम हो।मै मजबूर हूँ हमेशा की तरह ।
मै चाहूं या ना चाहूं मगर वह आएगा और उसके आने पर तुम्हारा जाना तय है।यही तो विरह है।तुम यकीन मानों अगर मेरे बस में होता तो मै उस दौर,उस साल को कभी ना जाने देता जिसमें मै बेसाख्ता हँसता था।जो जी में आए करता था बिना घबराए ,बिना बेचैनी के मगर वह भी चला गया।बहुत से चले गए और अब तुम भी जा रहे हो जाओ ।अब मै नए साल का इस्तेकबाल कर रहा हूँ बिना किसी हसरत के।तुम्हें अलविदा 2016, तुम्हारी ही दी ताकत से कह पा रहा हूँ सलाम 2017।
बस अब तुम भी इम्तिहान ना लेना।तुम नतीजा सुनाना नए दोस्त।तुमसे वादा बाकी सबको पीले पन्नों में भुलाकर सिर्फ तेरा हुआ हूँ।मैं कोई नए वादे कभी नही कर सका।बस तुम जैसे चाहना मोड़ते जाना।मुझे तुम्हारे काँटों या फूलो से कोई परहेज़ नही।मैं नही कहता की 2017 तुम सिर्फ खुशियाँ लाना,तुम जैसे चाहो आओ।तुम्हारा स्वागत है।तुम चाहो तो शुरआत से आखरी तक आँखों को आँसुओं से भर दो,तुम्हारी मर्ज़ी।मैं सच बताऊँ तुमको लेकर मुझे कोई हलचल या उम्मीद या मायूसी नही है।मुझे पता है मुझे क्या करना है।उस करने में अगर तुम साथ रहे तो ठीक वरना अगला साल सही।
हाँ एक बात तो कहेंगे की मैं पिछले गुज़रे हर साल से बेहद खुश रहा हूँ।सभी सालों में रोया भी हूँ।जीता हूँ तो बहुत बार हारा हूँ।यानि सब तरह के मज़े रहे।तो तुम भी एक सा स्वाद मत देना।मैं जब जीत रहा होऊँगा तो तुम हमे ज़बरदस्त हराना ताकि हम ज़िन्दगी के चटखारे ले सकें।जब रोज़ हार रहा होऊं तो एक बार जिता देना ताकि मुस्कुरा सकूँ।खैर मेरी फेहरिस्त का क्या तुम खुद बड़े वाले बौड़म,अल्हड़,फक्कड़ हो 2917।।।।जो दिल में आए करना।बस इतना बेहद मुबारक ए नए साल।💐💐💐

Wednesday, December 28, 2016

बूढ़ा सूरज

सूरज कोहरे में खोया हुआ है।इसे नही मालूम की आने वाली सुबह किस बेसब्री से इनका इंतज़ार कर रही है।सफेद रुई नुमा हवाएँ फ़िज़ाओं में उड़ रही हैं।कभी गाल,कभी नाक तो कभी बालों में उलझकर उनके रँग हल्के कर रही ओस की बूंदे नारंजी सूरज की किरणों तक बिखरी पड़ी हैं।
सूरज जैसे ज़िम्मेदार,निष्ठावान,बलवान को यूँ कोहरे और ओस से हारते हुए देखना बुरा लग रहा है।उसे पता है की उसकी एक मज़बूत किरण एक झटके में ओस और कोहरे को पानी में,फिर पानी से भाप में,भाप से उसका वजूद खत्म करके रख देगी।मैंने सूरज को मई जून में गुरूर से ठहाके लगाते देखा था।पता नही यह दिसम्बर उसे इतना कमज़ोर क्यों कर देता है।
अक्सर जाते हुए साल में मुझे सूरज बूढ़ा लगने लगता है।सुबह सुबह तारे उसे दोनों हाथों से पकड़ कर लाते हैं।चाँद पीछे से सहारा देता है।आसमान मुलायम हो जाता है।सूरज कराहता हुआ झुर्रियों के साथ एक दो किरणों को ज़मीन पर भेजता है।किरणे भी बुढ़ापे में कोहरे और ओस से हाथ पैर जोड़ती हुई ज़मीन तक पहुँचने की इल्तिजा करती हैं।बेहद हस्सास ओस को तरस आ जाता है और वोह रास्ता छोड़ देती है।
सबको पता है कमज़ोर सूरज कल फिर घमण्ड से ज़मीन का पानी सुखा देगा।लेकिन सबका दिल सूरज की तरह सख़्त थोड़े ही है।सबके दिल में अथाह नरमी है,उसके दिल में अथाह गर्मी।

Monday, December 26, 2016

खिड़की


एक लम्बी सी दीवार थी।खूब ऊँची,सपाट, खूबसूरत,मज़बूत सी दीवार।उसके पीछे से कभी ठहाकों की अवाज़ आती तो कभी रोने की।कभी बच्चों के खेलने की तो कभी लड़ने की आवाज़।दिवार मज़बूत भले ही थी मगर वोह आवाज़ को नही रोक पा रही थी।

इधर की भी खुशियों की झनकार,रोने की कलकल,हँसने की खूबसूरत आवाज़,सिर्फ आवाज़ उधर जाती ही होगी।इस दीवार ने दोनों तरफ दो लोगों,दो परिवारों,दो खानदानों,दो सभ्यताओं,दो धर्मो,दो विचारों को कैद कर रखा है।कुछ को लगता है ऐसी लम्बी,ऊँची,सपाट दीवार उन्हें हिफाज़त देंगी।मुझे लगता है यह तो क़ैद है,खुद को गुलाम बनाने की अहमकाना हरकत है।

मेरी दीवार ऊँची,लम्बी,मज़बूत सब होगी मगर उसमे बड़ी बड़ी खिड़कियाँ होंगी।जिनसे मैं दूसरे की तक़लीफ़ में मरहम,आँसू में रुमाल,ख़ुशी में मुस्कुराहट,जीतने में बधाई,हारने में ढाँढस दे सकूँगा।यह खिड़कियाँ हमारे होने का एहसास होती हैं।इनसे मोहब्बत पैदा होती हैं।यह घर का ट्रेलर होती हैं।खुली खिड़की घर के खुशदिल इंसान की गवाही देती हैं।जो इन्हें बन्द करके दीवार बनाते हैं वोह अपनी ज़िन्दगी में सीलन को न्योता देते हैं।

दो धर्मो के बीच दीवार होना कोई बड़ी बात नही रही।फिर भी हमारे बुज़ुर्गों ने इसमें खिड़कियाँ खोली,जानते हैं वोह खिड़की कया है।त्यौहार।जिस धर्म में यह त्यौहार की खिड़की बन्द हो गई वोह धर्म क़ैद हो गया,अपनो के हाथों क़ैद।

मुझे तो दीवार ही नही पसन्द फिर भी दो दिलों में अगर दीवार ज़रूरी हो तो खिड़की ज़रूर रखिये,वरना खत्म हो जाइयेगा ,घुट घुट के,बन्द दीवारों में,एक ही रँग में,एक रँग मुर्दे की निशानी है।खिड़कियाँ खोल दो।।।

Saturday, December 24, 2016

ईसा

सर पर कांटों का ताज और जिस्म सूली पर।आखों से कतरा कतरा बहता खून और जबान से लोगों को माफ़ करते  हुए लफ्ज़ ।जिसनें ताउम्र हरी घास का तिनका नही तोङा।ज़मीन पर पाँव रखकर उसकी गर्मी खुद में उतारकर वोह कुछ हड्डियाँ मुस्कुराती रही।पता था की कोई अपना ही उनके ख़ून का सौदा करेगा,फिर भी उसे अपनी महफ़िल में रुस्वा न किया।नँगे बदन जब अवाम का लीडर क्रूस खींचता हुआ काँटों पर जा रहा था तो उसकी नज़र झुकी नही थी।लोगो की भरी हुई आँखों में दर्द तो था मगर हिम्मत नही थी उसे थाम लें।वोह ख़ून से लथपथ सिर्फ इनकी माफ़ी की दुआएँ करता हुआ बढ़ा जा रहा था।वह यकीनन मसीह हैं ।मेरे ईसा हैं ।
इतने हस्सास की उनका रत्ती भर भी मुझमें आ जाए तो मै सारा दर्द  सह लू ।इंसान बन जाऊँ वही इंसान जो दर्द को महसूस कर सके ,जो दर्द  दूर कर सके।जो इंसान में फर्क ना करे।मै पूरे दावे से कहूंगा की इस पूरी कायनात में मेरे ईसा जैसा दिल किसी का नहीं ।रेत हो या घास या जंगल या पहाड़ आज भी उनकी खासियत ज़बानों पर है।फेस्टिवल तो खूब सेलिब्रेट होंगे मगर इनमे क्या ईसा होंगे।करोणों की भीड़ में मेरे ईसा का दिल होगा जो हर मज़लूम के लिए तड़पे।क्रिसमस ट्री के कंगूरों की चमक में मेरे ईसा के दिल की रौशनी होगी जो मायूस आँखों के आँसू सुखाकर मुस्कान भर दे।
मैं कह सकता हूँ जहाँ जहाँ दिल मासूम,मोहब्बत और ख़िदमत होगी वहाँ मेरे ईसा सफेद चादर ओढ़े भेड़ के संग मुस्कुराते हुए खड़े मिलेंगे।जो इंसानों पर सख्ती करेगा,वहाँ मेरे ईसा रोते हुए उसकी नादानी को दूर करने की दुआ करेंगे।मेरे ईसा मेरे इर्द गिर्द हमेशा रहते हैं।जब जब मै कमज़ोर हुआ और दिल मायूस हुआ मेरे ईसा ने मुझे पहाड़ जैसा मजबूत किया मोम जैसी नर्मी के साथ।  ईसा नें  मुझें हमेशा अपना दिल मासूम करने की सलाह दी।लोगों को माफ करने को कहा।जुल्म से रोका और कहा अगर तुम मुझे रत्ती भर चाहते हो तो नफरत मत करना ,मोहब्बत करना और सादा जिंदगी जीना ताकी सारा आलम मोहब्बत से खुशहाल रहे।तो वादा मेरे दोस्त,मेरे उस्ताद ,मेरी मोहब्बत ,मेरे ईसा ताउम्र आपकी ख्वाहिश को अपनी जिंदगी का मकसद बना कर जिएंगे।बस आप यूंही मेरे साथ मेरे हमसफर बनकर रहें ताकि मै कमज़ोर ना हूँ ।
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Friday, December 23, 2016

नाज़ुक

दोनो के होंट बेहद गुलाबी थे और बहुत बारीक़ से।लगता जैसे किसी ने सफेद बुत के चेहरे पर कलम से सुर्ख़ लकीर खींच दी हो।।इनकी आँखे बड़ी और तेज़ थीं।काली चमकदार पलकें अमूमन झुकी रहती मगर जब यह ओस से भीगी पलकें उठती तो अच्छे अच्छे गिर जाते।दोनों के बदन खूबसूरती की हर नोक पलक पर बराबर उतरते।
ऐसे में नक्काशीदार संगेमरमर की चार दीवारों में इन दोनों की खूबसूरती के किस्से अच्छों अच्छो को गुलाम बनाए हुए थे।कोई इनके बालों में उलझा था तो कोई आँखों में डूबा था।हो न हो हर एक को बाँधने का कुछ न कुछ इनके जिस्म में तराशा हुआ था।बड़े वक़्त के बाद दोनों बेगमो को खूबसूरती से तौलने पर एक सा वजन आया तो सवाल हुआ कौन है अव्वल।तो किसी फ़ालतू से इंसान ने कहा इनमे जो मिजाज़ में ज़्यादा नाज़ुक हो वोह है अव्वल खूबसूरत।दोनों से नाज़ुक होने के सवाल नवाब ने दाग़ दिए।
पहली बोली की, हुज़ूर मेरा गला बैठा हुआ है, ज़बर्दस्त ज़ुकाम है।नवाब ने पूछा ज़ुकाम कैसे हुआ,तो वोह बोली हुज़ूर रात गए मेरा पाँव मूली के पत्ते पर पड़ गया था,जिससे यह जिस्म ठण्ड का शिकार हो गया।नवाब ने कहा, ओह,तुम ही हो अव्वल दर्जे की खूबसूरत ए मेरी बेगम और मुस्कुरा कर दूसरी को देखा,
तो वोह तक़लीफ़ में बोली मैं क्या कहूँ हुज़ूर रात से पीठ ही नही टिक रही दर्द में,नवाब ने कहा आपको क्या हुआ।तो उसने नवाब का हाथ अपनी पीठ पर रख दिया।पीठ पर उभरे हुए बरेते(कोड़े का निशान) को देख सिहर गए।यह क्या है बेगम।बेगम ने कहा गई रात मेरे बिस्तर की तहों के नीचे किसी कमबख्त का बाल पड़ा था।यह उसी का निशान है।

Wednesday, December 21, 2016

कृष्णीसा

कल हम कृष्ण की उँगली पकड़े हुए चले जा रहे थे।मेरे कृष्ण को सहारे की नही बस साथ की ज़रूरत है।जो दिल की धड़कन को सुने और महसूस कर सके।रास्ते में गंगा पड़ी।उनके इशारे को समझते हुए हमने एक काँसे में गंगा को समेट लिया।गंगा ने मुस्कुराते हुए इशारों में कहा की यह दो चार क़तरे नही हैं, यही तो पूरी गंगा है।मैं लपक कर फिर कृष्ण के पीछे हो लिया।पता नही वोह किधर जा रहे थे,बस दिल कह रहा था की उनके पीछे चलते रहो।
चलते चलते कब मिटटी से रेत,रेत से पहाड़ आ गए पता भी नही चला।एक पहाड़ की चोटी पर पहुँच कृष्ण ने पूछा अच्छा बताओ,किसी अपने को मैं अपनी कौन सी चीज़ दूँ,जो उसे भी ख़ुशी दे और मुझे भी।मैं भी बिना रुके बोला,बाँसुरी।।वोह मुस्कुरा दिया।

हम फिर एक गुफा में दाखिल हुए।उसमे एक टाट के टुकड़े पर कोई लेटा हुआ था।हल्के सफेद और काले से लम्बे लम्बे बालों ने कन्धों को ढक रखा था।अचानक हम दोनों के आने से पास में खड़ी भेड़ मिमयाई।वोह शख्स उठ गए मैंने देखा कृष्ण थोड़ा सा ही झुके थे की उन्होंने लपक कर कृष्ण को गले लगा लिया।मैं दूर खड़ा देख रहा था कृष्ण मिलकर रो रहे थे।लग रहा था अरसे बाद जिस्म रूह से मिला है।इस क़द्र मोहब्बत,दोनों सिसकियों से रोए जा रहे थे।कृष्ण ने मुझसे कहा गंगाजल दो।मैंने देखा जो जल मेरे हाथों में है वह हूबहु कृष्ण और उनके उस दोस्त की आँखों में है।कृष्ण ने वोह जल उनको दे दिया।

फिर आँखे पोछकर कमर से बाँसुरी निकालकर मुस्कुराते हुए कृष्ण ने उनके हाथ में रखी और अपना मोरपंख निकालकर उनके बालों में फंसा दिया।फिर कहा जब मैं अपनी भूमि से चला तो समझ न आया क्या ले चलूँ।फिर दिल ने कहा गंगा की शीतलता इस कड़ी चट्टान में आपके पाँव को सुकून देगी।यह बाँसुरी आपको मेरे करीब रखेगी।यह मोरपंख हमारी मुलाकात की पहचान बनेगा।

मैं तब चौका जब मेरे कृष्ण ने उनको ईसा कहा।और कहा की आपके जन्मदिन पर मैं और क्या लाता।सब कुछ तो आपका ही है।ईसा मुस्कुराते हुए बोले।हे कृष्ण तुम हो तो हम हैं।हम हैं तो तुम हो।यह लो मेरी चादर,यह तुम्हे बाँसुरी की कमी नही लगने देगी और अपनी चादर कृष्ण को उढ़ा दी।कृष्ण, जब मैं जन्माष्ठमी में आया था तब तुमने यहाँ आने का जो वादा किया था,वोह पूरा किया।मेरे पास तुम्हारी तरह गाय का मक्खन नही है मगर भेड़ का दूध है।लो पियो।
अचानक मेरे आँसुओं से निकले शोर से दोनों ने गर्दन मोड़ी।मेरे मोटे से आँसू देख दोनों मुस्कुरा दिए।मेरे कृष्ण ने मुझे भेड़ का दूध दिया,तभी ईसा ने उसमे गंगा के दो क़तरे डाल दिए।और कहा,लो हो गया मुक़म्मल।

मैं कृष्ण की ऊँगली पकड़े इंसान बना,लौट आया।अभी भी बाँसुरी की अवाज़ मेरे पीछे है और कृष्ण की उँगलियों की गरमी मेरे साथ।ईसा के टाट की धूल कृष्ण के मोरपंख की तरह चेहरे पर बिखरी पड़ी है।

Monday, December 19, 2016

निवाला


सफेद बाउंड्री के बीच हरा हरा लॉन।अंदर पाँव रखते ही बड़ा सा वारामदा।अंदर कमरों और आँगन के बाद डायनिंग रूम।डायनिंग रूम में बड़ी सी डायनिंग टेबल।उसके एक किनारे पर इटली की खूबसूरत चीनी की पलेट।पलेट की नक़्क़ाशी में मछली का जाल।उस जाल पर आलू के दो क़त्ले और बेडौल सी एक तवे पर सूखी रोटी।आलू भी रह रह शिकायत कर रहे की हमें तो ठीक से पकाया होता।

सादा सफेद कुर्ता पहने वोह टेबल के एक किनारे एक लुकमा खाता और रोता।एक टुकड़ा तोड़ता और रोता।घर में बिखरे पड़ी अमीरी की नफासत और नज़ाकत को देखता और चिटखी हुई रोटी को देखता ,आँखे भर आती।नौकरों की कतार को देखता और पानी में डूबे नमक मिले आलू देखता तो गले में निवाले फंस जाते।सब उसके इर्द गिर्द खड़े उसे आलू और सूखी रोटी खाता हुआ देख रो ही सकते थे।

कल उसकी बीमार माँ ने पूरे 4 साल भर बाद बावर्चीखाने में पैर रखे थे।किसी तरह रुक रुक के, उठ बैठ के आलू और रोटी बनाई।वोह इन रोटियों को कल से खा रहा था।उन फीके आलुओं में माँ का दर्द था।उस सूखी रोटी में माँ की सूख चुकी खाल थी।

माँ का मन और हाथ से छुआ सूखा आटा भी वोह मज़े दे रहा था की पूरा गाल आँसुओं से तर था।


Sunday, December 18, 2016

तुम हो??

मुझे आज भी शक होता है की कोई ख़ुदा है।पता नही क्यों जब फलों से लदे बाग़ को देखता हूँ तो कह उठता हूँ की हाँ ख़ुदा तो है।पर जैसे ही पुरई की ख़ाली थाली देखता हूँ तो कह उठता हूँ ख़ुदा नही है।
मैं जब झूले पर झूलती और आइसक्रीम से तबियत भरने पर कोन को फेकती बच्ची की मुस्कान को देखता हूँ तो यक़ीन हो जाता है ख़ुदा इस मुस्कान में है।तभी डबडबाई आँखों से पॉलिश नँगे बदन जूतेको पॉलिश करने के लिए भागते बच्चे को देखता हूँ और ख़ुदा से दिल हट जाता है।
मैं आजतक क्यों नही सोच सका की मेरा ख़ुदा लदे फलों,भरी थालियों,मुस्कान में होने के बावजूद आसुंओं से क्यों दूर भाग जाता है।एक ही वक़्त में वोह भूख से सैकड़ों की आँखों में आँसू लाता है तो उसी वक़्त वोह उन आसुंओं का नमक सैकड़ो की बिरयानी में उड़ेल देता है।

मैं इसे बेइंसाफी नही कहूँगा।न मैं ख़ुदा के वजूद पर हाथ धरूँगा।मैं सिर्फ तुमसे पूछता हूँ की मेरी थाली और पुरई की थाली में इतना फ़र्क़ क्यों।मेरी आँखों की चमक और दूसरी डबडबाई आँखों में इतना फ़र्क़ क्यों।अगर यह फ़र्क़ ज़रूरी है तो मेरा दिल ऐसा क्यों बनाया।क्यों मुझे अपने निवाले गले में फंस कर उतरते हैं।बोलों न,या सिर्फ तारीफ़ के लिए हो।या तुमसे भी सवाल नही किये जा सकते हैं।
तुम मेरे दिल में मौजूद इन आँसुओ की गिरह को खोल दो,मैं पैदल चलता चीखता जाऊँगा की हाँ ख़ुदा है।हाँ मैंने देखा है ख़ुदा।मैं ज़मीन के खुदाओं और तुम्हारे नाम की रजिस्ट्री अफसरों के फतवों से रत्ती भर नही डरता।मुझे पता है अगर मुस्कान है तो तू है।अगर बहार है तो तू है।यहाँ तक अगर आँसू भी है तो तू है।मगर इंसानी ज़िंदगियों में अगर इंसान और जानवर का फ़र्क़ है तो मुझे शक है।

पता नही तुम क्यों नही हाथ घुमाते हो की हर बच्चे की आँखों के आँसू चमक में बदल जाए।पता नही तुम्हारा हाथ क्यों पुरई को खाना देते देते रुक जाता है।पता नही क्यों तुम पलँग पर लेटे चारो बच्चों के पेट ख़ालीरख हमे नींद दे देते हो।यहाँ मौजूद तुम्हारे फ़र्ज़ी सिपाही नहीं समझेंगे मगर तुम तो मेरे दिल की कैफ़ियत समझो ए मेरे ख़ुदा।बताओ करूँ तो क्या करूँ सिवाए तुमसे शिकायत के,सिवाए तुमसे लड़े, सिवाए तुम्हारे कौन है जो इतना बर्दाश्त करसकता है।मेरा दिल क्यों नही फट जाता यह सब देखकर,तब लगता है की हाँ तुम हो।जो दिल को सख्त किये जा रहे हो।

Saturday, December 17, 2016

मैं


मैं अगर तुम्हारे विरोध से बिखर जाऊँ तो मैं हूँ हीं कब।मैंअगर तुम्हारे कहने से कोई मज़हब का सिपाही हो जाऊँ तो यह तुम्हारी भूल है।मैं जो हूँ वो हूँ,मुझे सालों में मेहनत से,मोहब्बत से,तरीके से गढ़ा गया है।मुझमे ऐसा कलफ़ है जो तुम्हारी गालियों,फब्तियों,इल्जामो से नही टूटता।यह कलफ तब ही टूटेगा जब खुद मुझमे बुराइयों की नमी आ जाएगी।

आज तुम सुन लो जो एक एक शब्द से मेरे प्रति विचार बदलते हो।शब्दों में तुम धर्म,संगठन,पार्टी सूँघते हो,मेरे नज़दीक़ तो पहुँच भी नही सकते।तुम शब्द में उलझोगे तब तक मैं तुम्हारे ईश्वर के कन्धों पर हाथ रखकर सैर पर निकल जाऊँगा।

तुम जबजब अपनी सोच की सलाखों में क़ैद मुझसे निराश होंगे,तब तब यह क़ैद और मज़बूत होगी।तुम्हे आज़ाद देखना मेरा मकसद है, मगर कैसे।तुम तो खुद जंज़ीरों से मोहब्बत कर बैठे हो।

तुम मेरे शब्द,शब्दों में छुपे अर्थ में मुझको कभी नही पाओगे।मैं तुम्हारे प्रश्नो के उत्तर के लिए कभी खूंटो में नही बन्ध सकता।मैं तुम्हारे दिमागों की परत में जमी काई को दूर करने का बेमतलब ख्वाब नही देखा करता।

मैं लिख रहा हूँ।पता नही उस लिखने में मैं हूँ भी या नही।बस जो सामने है वोह शब्दों में है।मेरी रूह शब्द अर्थ की मोहताज नही।न ही इस जिस्म को किसी मोहर की ज़रूरत है।यह एक ही पल में कृष्ण की बाँसुरी लेकर ईसा के कानों में बजाते हुए,ईसा की चादर छीनकर मोहम्मद के कन्धों पर डालकर,मोहम्मद की नालैन उतारकर राम के पाँव में डाल सकता है।मैं जो हूँ वोह तुम्हारी हदो से बाहर हूँ।इसलिए तुम मेरे शब्दों में मुझे ढूंढते हो,विरोध करते हो,गाली देते हो,,मोहब्बत करते हो,अपनाते हो।फिर भी बता दूँ ताकि सनद रहे की इन गुने हुए शब्दों में सिर्फ शब्द हैं।रूह से रूह तक पहुँचो।मैं रूह में झाँकता हूँ तुम्हारी तो मुस्कुरा देता हूँ।

शब्द चुभ सकते हैं रूह नही चुभती।रूह को वही महसूस करेगा जो शब्द के प्रभाव से बाहर आ जाएगा।हैशटैग शब्दों का ढेर मात्र है।आओ मुझसे मिलो।मेरे पास बैठो,तब देखना यह शब्द बड़े हैं या हमारा तुम्हारा साथ।दो रूहे शब्दों की ज़ंज़ीर को तोड़कर ईश्वर के द्वार खोलती हैं।आओ जंज़ीरों को तोड़कर आमने सामने,आँखों में आँखे डालकर चरित्र,धर्म,संगठन,रँग,रूप,मानवता,धैर्य,समर्पण,त्याग,तपस्या पर बात करें।तब ही तो मेरा तुम्हारा साक्षात्कार होगा।आओ मिलकर ईश्वर का रूप गढ़े


Friday, December 16, 2016

माइनॉरिटी vs मेजॉरिटी


दुनिया के दो सबसे बड़ी आबादी वाले धर्म ज़मीन के एक छोटे से हिस्से पर माइनॉरिटी हैं।यानि इस्लाम और ईसाई भारत जैसे भोगौलिक छोटे से देश में माइनॉरिटी हैं।भारत में जो धर्म मेजॉरिटी में है वो दुनिया के नक्शे में माइनॉरिटी हैं।

अब कन्फ्यूज़ मत होइएगा मेजॉरिटी और माइनॉरिटी में।यह देखिये मेजॉरिटी भी कहीं न कहीं माइनॉरिटी है और माइनॉरिटी कहीं न कहीं मेजॉरिटी।अब देखिये यह की जब यह मेजॉरिटी में होते हैं तो गुरूर में मदमस्त हाथी हो जाते हैं।माइनॉरिटी के प्रति कर्तव्य से मुँह मोड़ना इनकी पहचान होती है।

जब यह माइनॉरिटी होते हैं तब अआँखो में अआँसू भरे अपने अधिकार माँगते हैं।मुझे हैरत है जहाँ जिसे बड़ा बनना है,वोह वहाँ सबसे छोटा बनता है।यह अजीब लोग हैं जो हर थाली पर अपना पहला हक़ समझते हैं क्योंकि ईनकी भीड़ ज़्यादा है।

एक और चीज़ बता दूँ।हर मेजॉरिटी को माइनॉरिटी की बढ़ती जनसंख्या से आसानी से डराया जा सकता है।

कल माइनॉरिटी डे है।मुझे तो लगता है यह सबको मनाना चाहिए।जो भारत में मेजॉरिटी है वोह विश्वस्तर पर माइनॉरिटी है।इसलिए उसे अपने दर्द,ख़ुशी ज़रुरतो को साझा करना चाहिए।जो विश्वस्तर पर मेजॉरिटी हैं वो भारत में माइनॉरिटी हैं।उन्हें अपने दर्द,ख़ुशी और ज़रूरतों को बताना होगा।

यह लिखने का बस एक मकसद है की मेजॉरिटी के नाम पर जो घमण्ड में चूर सब तहसनहस करते चल रहे हैं वोह देखें की वोह भी माइनॉरिटी हैं।जो माइनॉरिटी अपने हक़ और बराबरी के लिए आँखों में आँसू भरे परेशान खड़े हैं वोह भी देखें की जहाँ वोह मेजॉरिटी में हों वहाँ माइनॉरिटी की आँखे भरी न हों।

हक़ पाना है तो देना सीखिये।जिस ज़मीन पर बड़ी भीड़ छोटी भीड़ को सिर्फ इसलिए टतंग करे की उसकी चारपाई पर ज़्यादा बच्चे हैं तो वोह भी तहस नहस होंगे।

म्यांमार में रोहिंग्या तो पाकिस्तान में हिन्दू और भारत में कुछ जगह मुस्लिम ,ईसाई अगर आँसुओं से रो रहे हैं तो मेजॉरिटी सोच ले की उनकी ज़िन्दगी का सुकून ईश्वर ने छीन लिया है।

सुनो,दूसरे मुल्कों के उदहरण से अपनी ज़मीन को ऊसर बनाना सबसे बुरा है।उठो और बराबरी से सबको गले लगाओ ताकि जब तुम कल कहीं खड़े हो तो तुम्हे वहाँ भी कोई अपना खड़ा मिल जाए जो लपक कर तुम्हारे गले लग जाए।यही तो इंसानियत है, वरना जानवर ही मेजॉरिटी में माइनॉरिटी के ख़ून से अपने दांत सुर्ख़ करते हैं।इंसान बनो।

Thursday, December 15, 2016

दर्द पुराना है

यमुना में कितना पानी बह चुका है।कुछ याद आया।16 दिसम्बर।निर्भया।आदोलन।नारे।शीला दिक्षित।खूब उधम हुआ था।इडिंया गेट से जंतर मंतर तक मोमबत्तिया और चीखते लड़ते नौजवान।ठहरिये।जो आपकी माँगे थीं वह सब पूरी हो गई।शीला चली गई।काँग्रेस चली गई।मज़बूत कानून आ गया।दो दो लौह पुरूष दिल्ली की सत्ता में आ गए।अब सोचिए क्या रूक गए बलात्कार।क्या अब वह दर्द नही होता जो निर्भया में था या यह सारा दर्द सियासत का था।आंदोलनों में हमारे आक्रोश,दर्द,तक़लीफ़ को उभारा जा रहा था।उन्हें बेचाजा रहा था।हमारे कन्धों पर हमारे ज़ख्मो से सियासी रोटियां सिक रही थी।और हमे रत्तीभर नही पता था कुछ भी।
अब क्यों नही खुलकर सियासी सेवकों पर सवाल उठाते हैं।अब क्यों नही रेप पर चैनल में डिबेट होती है।अब तो पूछने वाले को जूतेमारने की धमकी,सवालों को फैशन कह देने की भभकी, और बड़ी से गुनाहों की काली चादर डालकर सब ढक दिया जाता है।बलात्कार अब भी हो रहे हैं बस सियासी लोगों को अब उनमे ज़ायका नही लगता।देखिये यह आपके नुची हुई बोटी पर तब ही निकलेंगे जब इन्हें इनकी ज़रूरत होगी वरना वही बोटी सींक का कआपको एक सच बता दें कल भी आप अपनी कमिया नही देख रहे थे और आज भी नही।जबकी आपको अच्छे से पता है की ऐसी कमिया समाज की हैं नाकि सियासत की।सियासत में इस्तेमाल होने से बचिए बस।

हम खूब आदर्शों की बात करते हैं।इतिहास का ज़खीरा निकाल लाते हैं अपनी महानता का।और जब हमारे बीच से कोई इन्सानियत को तार तार करता है तब हम सारा मामला सियासत पर डाल देते हैं।वक्त है अभी अपनें बच्चो को संभालिए,सिखाइये दूसरों की इज़्ज़त करना।मोहब्बत करना।आप अपनें आसपास सुधार लें तो पक्का है आपको किसी युगपुरूष की ज़रूरत नही पड़ेगी।आइये मिलकर मोहब्बत से लबरेज़ एक इज़्ज़त से भरे हिंदुस्तान की तामीर करे।जहाँ कोई कभी भी निकलते वक्त डरे नही।आइये बनाए एक निडर हिंदुस्तान।अपना हिंदुस्तान।