Friday, July 26, 2019

तब कहाँ थे

तुम तब कहाँ थे ? इससे ज़लील बात पछले बहुत से सालों में हमने नही सुनी । यह वह वाहियात वाक्य है, जो गुनहगार को बच जाने का रास्ता साफ़ करता है ।

तुम इतना जानो,पिछली गलतियों को अगर ज़रा भी सुधारने की मुझमे ताक़त होती,तो मैं सबसे पहले आदम और हव्वा का गंदुम खाने का मसला ही सुलझा देते । एडम और ईव के वर्जित फल चखने की गलती सुधार देते । मनु और सतरूपा को ऊपर ही रहने की कोई युक्ति करते । इतिहास की यह गलती दुरुस्त हो जाती,तो यकीनन यह एक दूसरे की टांग नोचने वाली इंसानी नस्ल ही शक्ल न लेती । मगर करें तो क्या करें,हमसे तो यह बात लिखने से पहले हुई गलती भी सुधारी नही जा सकती,सिवाए इसके की आगे ऐसी गलती न हो ।

आज लिंचिंग हो,नक्सली हमले हों,तमाम आतंकी हमले हों,2002 के गुजरात दँगें हों,कश्मीरी पंडितों का खूनखराबा  हों,84 के सिखों का कत्लेआम हो हों,भागलपुर या दूसरे दँगें हों,47 का बंटवारा हो,1857 की क्रांति में अंग्रेजों की हिंसा हो, उससे पहले मुगलों का विनाश हो,गोरियों का अत्याचार हो,खिलजियों का ज़ुल्म हो,गुलाम वंश की हिंसा हो,लोदियों का दिया दर्द हो,राजा शुंग का अत्याचार हो,कलिंग की हिंसा हो,मौर्यों के युद्ध हों,कुषाण,मराठा,राजपुताना किसी का भी किसी के साथ अन्याय हो या यूं कहें रावण ,कंस,कौरव ब्रदर्स या स्वर्ग पर राक्षसों के हमले हों,हम सबकी निंदा करते हैं, कड़ी भत्सर्ना करते हैं, फिर भी बताओ,इन सबको सुधार कौन सकता है, कौन है जो इनको सही कहता है ।

टिटहरी की खोपड़ी से भी छोटा दिमाग रखने वालों तुम्हे इतनी सी बात समझ नही आती की हमे आज सुधारना है । हमे आज अन्याय रोकना है । हमे आज हिंसा रोकनी है । हमे आज में ही जीना है, उसे सुधारने की बात करना भला अपराध कहाँ से हो गया । मूर्खों अगर तुम्हारे पास कोई युक्ति हो जिससे ऊपर गिनाया कल बदल सको,तो भाई बदल लो । बाबर को सरहद पर ही रोक  दो । जाओ और खिलजी की ज़बान खींच लो ।

वह सब बड़े ही मक्कार लोग हैं,जिन्हें आज हिंसा दिख नही रही है । जिन्हें भीड़ के हाथों होते मानव वध दिखाई नही पड़ रहे हैं । गुलामी और चाटुकारिता,यही दो चीजें तो हैं, जो किसी भी राष्ट्र को खोखला करती हैं । ताज्जुब तो यह है, इनमे बोलने वाले वह लोग हैं, जो जीव बचाने के अभियान चला रहे,जो पेड़ बचाने की कोशिश कर रहें,जो इनवायरमेंट बचाने को बेचैन हैं, मगर मानव वध रोकने पर गुस्से से लाल पीले हो रहे हैं ।

आखरी बात,सन 47 से आजतक और आज से लोकतंत्र रहने तक,हर वह व्यक्ति,संगठन,पार्टी पूरी तरह गलत है, जो मानव किसी भी मानव वध,हिंसा को सही मानता है । जो हिंसा में खड़े लोगों को सही और हिंसा के खिलाफ खड़े लोगों को गलत मानता है, इस देश का असली दुश्मन वही है । लाखों लोग अधर्म और अन्याय की ओर वाह वाह करने लगे इसका मतलब यह नही की हम अन्याय और हिंसा को धर्म मान लेंगे । यह कल भी गलत था,आज भी गलत है, कल भी गलत रहेगा । मैं तो अपनी अंतिम सांस तक मानव वध को अधर्म और महापाप कहता ही रहूँगा ।

Wednesday, July 24, 2019

मौत का एलान

किसी के मुँह से न निकला मेरे दफ़न के वक़्त
कि इन पे खाक न डालो,ये हैं अभी नहाए हुए....

पढ़ते हुए डूबने लगा हूँ, सोच रहा हूँ उस शायर के इन अल्फ़ाज़ पर भी लोगों ने वाह वाह ही तो किया होगा,उसके दिल में बैठी गिरह,भला किसकी नज़र में आएगी । एक लेखक की बदनसीबी होती है कि उसके मौत के एलान पर भी वाह वाह की आवाज़ उठती है, और वह फिर इस नरक में जीने को बेताब हो जाता है ।

मैं गुलाब था,जो अब सूख कर बिखर जाना चाहता हूँ । मेरी मौत के इस फ़रमान पर भी तो लोग दाद ही देंगे । वह कभी नही जानेंगे कि शब्द बिखेरने वाला बिखरी हुई सांसे समेटने में किस क़दर टूट गया है ।

यह बातें जैसे ही मेरे कानों में पड़ी । मैंने इनको सलीके से समेटा और कहा,अपनी कलम से ऐसा पर्दा मत खींचो की दूसरी तरफ से रौशनी ही आना बंद हो जाए । ए लेखक,यह बिखरे बिखरे शब्द  बिखर कर और दूर हो जाएं,की इनको समेट लो,की देर हो जाए,की कोई सुनने वाला रह न जाए,की कोई कहने वाला नज़दीक़ न आने पाए,इस कि से पहले उठो और झाड़ू लगाकर दुःख से भीगे इन शब्दों को बहारकर कहीं दूर फेक आओ ।
क्योंकि अब सरकार भी निराशावादियों को पसन्द नही करती । श्रृंगार और वीर रस में डूब जाओ,ताकि कोई तुमपर मिट्टी न डाल जाए,क्योंकि अभी अभी तो तुम नहाए हुए हो ए लाश...ओह सॉरी तुम

Monday, July 22, 2019

सावन को आने दो

कुछ दिख रहा है आपको।अपनी गर्दन को दूसरी तरफ मोड़िये देखिये ज़मीन ने कैसी चादर ओढ़ रखी है।पूरी धानी धानी हो रखी है।हर तरफ हरियाली उमड़ रही है।यह पता है क्या है, यह ज़मीन की टीन एज है।ज़मीन सालभर में एक पूरी उम्र जीती है, तो यह जो सावन है न यह उस उम्र की टीन एज है।इस वक़्त हर चीज़ बढ़ रही होती है एक नशे में,एक अल्हड़पन में,एक मदमस्ति में।इस वक़्त कोई भी घाँस का टुकड़ा तोड़िये तो उसमे इतना पानी होगा की नाख़ून भीग जाएँ।

सावन महादेव का भी महीना है।
वही जिनमे भोलापन,अल्हड़पन,प्रेम है।आप सोच रहे होंगे शिव जी के गुस्से का ज़िक्र हमने क्यों नही किया।वह इसलिए की सावन में भी भला कोई गुस्से की बात करेगा।यह मौसम तो प्रेम और हल्के डूबने वाले नशे का है।यानि प्रेम नशे का।मदमस्त प्रकृति को छू लेने का मौसम।प्रकृति का यौवन इस वक़्त सर चढ़ कर बोलता है।हरी हरी घाँस जब पैरो को छूती है तो जो गुदगुदी लगती है वह रूह को तरोताज़ा कर देती है।पछिया हवाएँ जब ठण्ड साथ लाती हैं तो टूटकर बादल बरसते हैं।

मैं ज़मीन की इस टीन एज को देख पा रहा हूँ।मुरझाए से मुरझाए पेड़ को सर तानकर बात करते हुए देख पा रहा हूँ।अमरुद कच्चे ज़रूर हैं मगर रसदार हैं।ज़रा से दहलीज़ से पाँव सरकाइये तब देखिये यह सावन आपका सारा ज़हर मारकर आपमे प्रेम भर देगा।हल्की हल्की नींद और हल्के हल्के जागने में दिमाग कुछ सुकून पाता है।

मिटटी सख्ती को छोड़कर मुलायम हो जाती है।वह कीचड़ की शक्ल में आपसे लिपटने को बेताब हो जाती है।इस मौसम में इंसान क्या कीड़े मकौड़ों को भी नया जीवन मिल जाता है।सावन जिस्म के उस हिस्से को तरो ताज़ा करता है जो सालभर थक कर चकनाचूर हो जाता है।इस एक महीने में प्रकृति इतनी ऊर्जा भर देती है की सालभर आप उससे जी सकें।यह जो ज़मीन ने हरी चुनरी ओढ़ी है, वह बता रही की मेरे गुस्सैल बच्चों आओ और मुझसे लिपट जाओ।यहाँ तुम्हे उस माँ का प्यार मिलेगा जिसे तुम सिर्फ ज़बान से माँ कहते हो।सावन में ज़मीन पूरे सालभर किये गए पापों के धब्बों को बहा देती है, फिर एक नई हरी कालीन बिछाती है।

आओ और फिर अपनी नफ़रत और झगड़े से इसे पूरे साल ख़ून से रँग दो।मगर मैं फिर सब साफ़ करके तुम्हारे लिए सावन लाऊंगी।जिस दिन सावन आना बन्द हो जाए तब समझ लेना की प्रकृति तुमसे नाराज़ हो गई,तब तक इस नरम गरम धानी धानी घाँस में लोटो पोटो।आओ हम,तुम,इस ज़मीन के साथ उसी टीन एज में पहुँच कर, सब भूलकर,खेलें,मज़े करें, तफ़रीह करें, गाने गाए।चलो यौवन को दस्तक दें।खट खट खट खट, आओ तुम्हारा सावन आया है।

मैं मर चुका हूँ

लोग कहते हैं तुम्हारी मुस्कुराहट जिंदादिली की निशानी है। एक ज़िन्दा दिल झाँकता है तुम्हारे होंठों से....

मैं सच जानता हूँ,खुद को कितना मारकर यह मुस्कुराहट आई है । मेरे यह होंठ दिल से चुरा कर मुस्कुरा रहें,यह भला मेरे सिवा कौन समझ पाएगा ।

मौत और ज़िन्दगी के बीच बस मुस्कुराहट भर का फासला है । दिल कहता है, आंख बंद करलो, सब अच्छा लगने लगेगा । मैं कहता हूँ दिल से की तुम बंद हो जाओ,सब खुद बखुद अच्छा हो जाएगा ।
हम और हमारी सांसे आजकल रोज़ लड़ती है । दोनों का एक ही लक्ष्य की शांत हो जाएं हम,या तो अंदर से या तो बाहर से,इस जद्दोजहद में होंठ मुस्कुरा देते हैं और दिल को मजबूरन एक धड़कन और बढ़ानी पड़ जाती है....

Sunday, July 21, 2019

प्रेम सावन का

पूरे साल तुम्हारी एड़ियों से घिस घिस करके जो धरती अपना रूप बिगाड़ लेती है।तुम्हारे गन्दे दिमाग से उपजे कामो को बर्दाश्त करते करते उसकी मुस्कान मिट जाती है । तुम्हारे ज़हर को पीते पीते खुद कुम्हला जाती है। तुम सब जो पूरे साल उसकी छाती पर मूँग दलते हो,वह इससे इसी महीने निपटती है।
सावन मेरी धरती के मेकप का महीना है।वही महीना,जब धरती दोबारा उठने को तैयार होती है ।

पूरे साल जितना तुम बिगाड़ते हो उससे ज़्यादा वह इस महीने में कवर कर लेती है।सावन का महीना हमारे हिस्से की धरती के निखरने का महीना है।वह इस महीने इतना कुछ खुद में समेट लेगी की तुम साल भर लूट लूट कर खाना,बिना फ़िक्र किये उसकी हरी घाँस में ख़ून को बहाते जाना,वह सब पीकर तुम्हे अच्छे फल,फसल और पानी देती रहेगी।
सावन जितना धरती के ऊपर उसे निखारेगा उससे कहीं ज़्यादा धरती के अंदर निखरेगा।

खैर अगर इस महीने में भी तुम्हारा दिमाग ताज़ा न हुआ।उसमे कहीं खुरचन भर भी नफ़रत रह गई।इस महीने के गुज़रने के बाद भी अगर तुम अपने साथ के नागरिकों से लड़ते रहते हो तो यह सावन सिर्फ और सिर्फ धरती के लिए आया है।तुम्हारे लिए नही।।।

हो सके तो झूले पर अपने उन दोस्तों के साथ बैठ जाओ,जिन्हें राजनीती,धर्म या जाति की वजह से पीछे छोड़ आए हो और लम्बी लम्बी पीगें बढ़ाओ ताकि देश लहलहाता हुआ आगे खुले आसमान में बढ़ जाए....यही तो सावन की आमद है।मज़े करो,दिमाग को ताज़ा और खुशबूदार करो,ताकि इस बार भी यह सावन निराश न जाए ।
जिस दिल मे प्रेम न पहुँचे वहाँ सावन कभी पहुँच ही नही सकता ।जिस दिल मे सावन हिलोरे लें,वहां नफ़रत भला कहाँ रह सकती है । सावन निर्माण की पहचान है, जो प्रेम से ही सम्भव है । विनाश करने वाले हाथ नफरत के हुनर से छजते है, उनमें सावन का क्या ही काम ।सावन का हर वह मज़ा ले,जिसके दिल मे प्रेम के बीज हैं और बेचारे, वह लोग मायूस होकर देखें इस सावन को जिनके दिल मे प्रकृति और मानव मात्र से प्रेम नही है ।

Thursday, July 18, 2019

हफ़ीज़ को मारना

"हफ़ीज़ को निपटाएँ भी तो निपटाएँ कैसे,मम्मी-दीदी तक तो उसके मोह में हैं । उनके सामने हफ़ीज़ को कैसे हटाएँ,यह सम्भव नही ।"
यह तुम पढ़ तो रहे होंगे,दोस्त । हाँ दोस्त,तुम यहीं फेसबुक पर भी हो और बचपन से हर वक़्त मेरे नज़दीक़ भी । यह सब ही पढ़ लें और देख लें कि इस जीवन मे हमने भी कितने ब्रूटस कमाएँ हैं,.... तुम भी😢

यह मेरे बड़े ही नज़दीकी के कन्वर्सेशन में से एक टुकड़ा भर है । बताइये दिल और विश्वास का टूटना क्या होता है । बताइये इन्हें हमे मारने की ही क्या ज़रूरत,यह इतना भर कह देते की हफ़ीज़ मेरा तुम पर भरोसा नही रहा । इतने भर से मेरा जैसा इंसान मर ही जाता ।

यह बातचीत इस बात पर ही कि मेरा दोस्त आज भी हमसे क्यों बातचीत करता है । उसका दोस्त उससे पूछता है कि तुम तो भाजपा से बढ़िया से जुड़े हो,यह हफ़ीज़ अब तक काहे हैं, ऊपर से तुम्हारे घर भी आना जाना लगा है । सब उससे ही प्रभावित हैं ।
तो मेरे दोस्त का जवाब बड़ा शानदार है कि "बताओ,उसे हटाएँ तो कैसे हटाएँ। वह राम की तो कभी कृष्ण की बात करता है । मेरे घर के कितने मसले हल किये हैं, अगर कुछ कह दिया,तो घर मे ही तमाशा हो जाएगा । हफ़ीज़ को निपटाने के रास्ता मुझे नही दिखता,झेला जाए,जब तक झेल सकें"
यह बात सुनने के बाद मैं वाक़ई निपट गया हूँ । एक बात तो बताए ही दे रहा हूँ कि मैं इतनी आसानी से मिटने वाला नही हूँ । छिपकर या खुलकर सामने आ जाओ,रत्तीभर डरता नही हूँ । मुझे पता है कि मेरे रास्ते मे तुम जैसे तमाम दोस्त,रिश्ते अपना रंग दिखाएँगे ही,हम भी रुककर अफसोस करेंगे, फातिहा पढ़कर आगे बढ़ जाएँगे । जब तुम्हारे पिता,शराब पीकर,पूरे घर को तमाशा करते हुए,तुम्हारी ही माँ पर हाथ उठाएं, तब हफ़ीज़ हफ़ीज़ कहकर मेरा नाम ले लेना । इतने भर से तुम सब उस रात सुक़ून से सो जाओगे । तुम्हारा धर्म भी खतरे में नही आएगा । तुम्हारा बेलगाम पिता भी भयँकर नशे में शांत हो जाएगा ।

अफसोस ज़रूर है कि जहाँ इतने दिन दोस्ती का नक़ाब ओढ़े थे और दिन ओढ़े रहते मगर यह भी तो है । धर्म इतना सर चढ़कर बोलेगा,तुम्हे इतनी घुटन होगी अगर ज़रा सा भी पहले मुझे पता होता,तो तुम मेरी याददाश्त से कबके मिट जाते ।
हाँ एक आखरी बात अगर तुम्हें तुम्हारी धर्म की रक्षा में किसी की हत्या करनी हो,तो सबसे पहले मुझे चुनना,क्योंकि इतना वक़्त तुम्हारे साथ बिताया है, तो उसका इतना हक़ तो बनता है । तुम पढ़ रहे होगे, समझ भी रहे होगे, मान लेना,मुझे तुम खुद अपने हाथ से क़त्ल करना । अच्छा लगेगा,तुम्हे भी,हमे भी...
यह #हैशटैग नही है, यह वह बात है, जो चार दिन पहले घटी है, कोई अफसोस न करे,बस देखे मेरे दोस्त की घुटन तो देखे...

Tuesday, July 16, 2019

ईश्वर और राजनीति

वह रोज़गार माँगने वाले आ रहे थे,मैंने उन्हें ईश्वर की तरफ मोड़ दिया ।
वह स्वास्थ्य के लिए सिस्टम की तरफ बढ़ते की मैंने उन्हें ईश्वर की ओर मोड़ दिया ।
वह भयँकर बाढ़ में डूबने से बचने को व्यवस्था के कॉलर पकड़ते की मैंने उन्हें ईश्वर की इच्छा की ओर मोड़ दिया ।

वह जो कुछ भी चाहते थे,वह सरकार दे तो सकती थी मगर ईश्वर ज़्यादा अच्छे से दे सकता था । थोड़ा इंतेज़ार ही तो करवाता है ईश्वर,जीवन,सिर्फ एक दो जीवन भर ।
यह  लोग जो घिसट घिसट के ,क़तारों में लगकर,सड़कों पर चटाई बिछाकर नमाज़ पढ़ते हुए,पहाड़ो पर नंगे पाँव घण्टिया बजाते हुए,मांग क्या रहें हैं, वही तो पूरा करने के लिए सरकार थी । बेचारे ईश्वर के आगे रोते हैं, इन्हें नही पता,इनके हिस्से की प्रार्थनाएं ईश्वर ने पूरा करने के लिए मनुष्य ही को बनाया है ।

नादान अपनी बनाई सत्ता से मांग नही सकते,ईश्वर के आगे गिड़गिड़ाते हैं । खिसियाए हुए यह लोग,एक दूसरे के धर्म को अपनी तरक्की का रोड़ा मानकर खुद को महामूर्ख बनाते हैं । यह तरस खाने वाले लोग हैं, जो यह नही जानते,किससे क्या मांगना है, ईश्वर पर जितना भयँकर दबाव होगा,सत्ता उतनी चैन की नींद सोएगी ।

Tuesday, July 9, 2019

बच्चों में क्रांति लाओ

आप हमेशा सिर्फ़ भगत सिंह,महात्मा गाँधी या नेहरू ही क्यों बनना चाहते हैं । आप कभी सरदार अजीत सिंह,सरदार किशन सिंह, करमचंद गाँधी या मोतीलाल नेहरू क्यों नही बनना चाहते । हर परिणाम अपनी ही आंखों के सामने देखने की लालसा हमे गहरे अवसाद में ढकेल देती है । आख़िर हम रास्ता और मन्ज़िल दोनों को क्यो पा लेना चाहते हैं, जबकि जानते हैं कि हमारी लड़ाई सभ्यता की लड़ाई है, हमारी लड़ाई संस्कृति की लड़ाई है, जो एक इलेक्शन या दो इलेक्शन में किसी के हारने या जीतने से तय नही होगी,बल्कि इसमें जिंदगियां जाएँगी ।

भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह को देश से मोहब्बत की सज़ा मांडले (बर्मा) में निर्वासित होकर मिली । पिता सरदार किशन सिंह को नेपाल में पकड़ा गया । यही लोग तो थे,जिनके विचारों से उनके घर मे भगत सिंह का आना तय हुआ । वह करमचंद गाँधी और पुतली बाई ही तो थे जिन्होंने अपने बच्चे को सत्य,अहिंसा और प्रेम के बीज बोए । वह मोतीलाल नेहरू ही तो थे,जो आज़ादी की जंग में कूदकर,एक ऐसा रास्ता बना गए,जिसे उनके बेटे ने गौरव तक पहुँचाकर समृद्ध किया ।

मैं आज बहुतेरों को देखता हूँ,वह देश के हालात देखकर मायूस हैं । वह हिन्दू मुसलमान के नामपर बंटते हुए देश को देखकर इतना टूट चुके हैं कि उनसे मुस्कुराया भी नही जाता । यह इतना हारे हुए लोग हैं कि एक दो चुनाव में यह चिटखकर बिखर जाते हैं । इनसे पूछे कि तुम्हे चुनाव जीतना था या समाज सुधारना । तुम्हे टूटे हुए दिलों को जोड़ना था या उन्हें जोड़कर वोट डलवाना था । अरे,हर अच्छा समय अपनी ही आंखों से देखने को क्यो बेचैन हो,काम करो ,हो सकता है, वह अच्छा वक्त तुम्हारे बच्चों की आंखों के सामने आए ।

बेगम अनीस कहती थीं कि जब देश का बंटवारा हुआ,तो हिन्दू मुसलमान एक दूसरे पर टूट पड़े । पंजाब,दिल्ली,यूपी सब तरफ लोग भयँकर नफरत फैलाते । घर जलाते । औरतों लड़कियों को उठा लिया जाता । उनके घरों में आग लगा दी जाती । यहाँ गांव गांव से मुसलमानों को मारकर निकाला जाता या उनकी घर वापसी कराई जाती,यही हाल सरहद उसपार हिंदुओं,सिक्खों के साथ था । लगता ही नही था कि देश का कोई भविष्य होगा । हम लोग यह सोच भी नही पाते थे कि भारत मे कभी कोई मुस्कुरा पाएगा । बेगम अनीस जैसे सैकड़ो लोग दिन रात काम करते रहे । बूढ़े गाँधी ने इनकी सूखी आंखों में ख़्वाब भरे और कहा काम करो,सब बदलेगा । सब जुट गए राहत शिविरों में,खूब गालियां खाई,इनपर हमले हुए मगर राहत शिविरों में आए हुए लोगों की मदद करते रहे,यही सोचकर कि आज नही तो कल कुछ तो सुधरेगा । सबने देखा कि सब कुछ सुधरा और सन पचास के बाद देश को देखा और नेहरू की मेहनत देखी,लोगों को प्रेम करते देखा,तब दुनिया को एहसास हो गया,बूढ़े गाँधी सच्चे थे । इन सबकी बिना निराश हुए की गई अथक मेहनत से देश पहिये पर आ कर बढ़ गया ।

यह कहने का मकसद था कि जो बुझे बुझे,टूटे हुए लोग हैं । जो निराश हैं कि कुछ भी सही नही हो सकता । वह खुद को सुपरमैन समझने की गलत अवधारणा से बाहर आएँ । वह अपने बच्चों में विचार रोपें,दूसरे बच्चों में रोपें और खुद आख़री तक जोश और हौसले के साथ लड़ते रहे । हो सकता है हम और आप नही,तो न सही,हमारे बच्चों में कोई इस मेहनत का मज़ा चखे । प्रेम कभी भी खाली नही जाता और मेहनत कभी भी रेगा नही जाती । मेहनत कीजिये,काम कीजिये,मायूस मत होइए । निराशा आपके अंदर के वह बीज सुखा देगी,जो आने वाले वक्त में पौधा बनकर वृक्ष बन सकता था । हालात से न निराश हों और न ही निराश करें,यक़ीन करें कि करने से ही बदलेगा । देश और समाज पत्थर हो जाए,तब भी रस्सी बनकर उसे रोज़ रगड़ो । सैकड़ों रस्सियां टूटकर खत्म होंगी मगर कोई तो रस्सी होगी जो पत्थर को घिस जाने का आनंद लेगी...हम नही तो हमारे बच्चे,हमारे बच्चे नही तो उनके बच्चे,कोई तो हमारी आजकी मेहनत से मुस्कुराएगा ही,यक़ीन रखो ।

Monday, July 8, 2019

सोशल मीडिया मृतक

बहुत तकलीफदेह होता है,मरे हुए दोस्तों की आईडी खोलकर अनफ्रेंड करना । बहुत पुराना एक दोस्त था, बहुत साल पहले हमें छोड़ गया । मेरा रोज़ का दस्तूर था कि उसकी आईडी खोली और तस्वीर को ज़ूम इन-ज़ूम आउट करते हुए देखता रहता । उसके लिखे को बार बार पढ़ना मेरे लिए अजीब नही था । आखिर वह मेरा दोस्त था,जिसके साथ तमाम यादें जुड़ी थीं मगर कब तक ।

खुद को तैयार किया कि अब उसको गुज़रे सालभर हो गया,अब हमें अनफ्रेंड कर देना चाहिए । फेसबुक खोलते ही उसका फेस नज़र के सामने दौड़ जाता और झट से हम उसकी वाल पर होते, मगर यह कब तक,आखिर कब तक हम नही मानेंगे की मेरा दोस्त अब नही रहा ।

दिल कड़ा करके अनफ्रेंड किया । उसकी जगह को गिनतियों में दूसरे दोस्तों ने पूरी कर ली मगर वह दिमाग मे न मिटने वाली जगह दर्ज हो गया । उसके बाद बहुत से दोस्त हमे छोड़कर जाते रहे । लंबे वक्त तक जीने की यही सज़ा है कि आप अपने बहुत से करीबियों को मरता हुआ देखते हैं ।  हम भी यहीं एफबी पर बहुत से दोस्तों को मरता हुआ देख चुके हैं ।

तब में अब में यह बदलाव आया है कि अब जब कोई गुज़रता है, तो तीस चालीस दिन में उसे अनफ्रेंड करते हैं । यह वैसे ही तकलीफदेह होता है, जैसे पहली पहली बार किसी की मौत की खबर सुनना। मगर जब वह सशरीर चला गया, तो आईडी का हम क्या करें,जहाँ से अब कुछ भी नही आना ।

मान लिया ज़िन्दगी का सच की जाने वाला लौटकर नही आएगा । मरने वाला मर गया है, अब उसमे कुछ नही बाकी । यह मान लिया कि अब जिसे ज़िन्दा रहना है, वह दिमाग मे दर्ज हो चुका और मेरे इस दिमाग के शांत होते ही सब शांत हो जाएगा । मैं मरे हुए लोगों को अनफ्रेंड करने लगा हूँ,क्योंकि वह मुझे अनफ्रेंड करके कब के जा चुके । यहाँ सोशल मीडिया पर आज हम मरेंगे,कल कोई और चीज़ ट्रेंड कर रही होगी । इस भीड़,इस शोर,इस कभी न रुकने वाली दौड़ में हम वैसे ही मिट जाएँगे जैसे आग और मिट्टी में हमारा शरीर ।

जब कोई मरता है, तो कोई जन्म भी लेता है । दोस्त मरते हैं, नए दोस्त आते हैं । हम मरेंगे,तो दूसरों के नए दोस्त आएँगे । हम सब अपने इर्द गिर्द दोस्तों की पूरी संख्या अंत तक बनाकर रखते हैं । जो चला गया,वह अपनी खूबियों के साथ चला गया । जो आया है, वह अपनी खूबियों के साथ आया है । यह भी सच है, मरे हुए लोगों को अनफ्रेंड कर पाने के लिए मज़बूत दिल चाहिए,वरना पिछला बीता हुआ वक़्त, अच्छी भली तस्वीरों को इतना धुँधला कर देता है कि अनफ्रेंड का ऑप्शन तो छोड़िए,मोबाइल तक दिखाई नही देता....इन आँसुओं का बह जाना अन्दर से हल्का कर देता है ...

Wednesday, July 3, 2019

विवेकानन्द

जब तक आपको मूर्ति में भगवान दिख रहें है तब तक आप ईश्वर से मिलने की पहली ही सीढ़ी पर हैं।जैसे ही ईश्वर मूर्ति से आज़ाद हो जाए वह दूसरी सीढ़ी है और जब यह आपमे दिखने लग जाए तो यह अंतिम सीढ़ी है।आप किसी भी सीढ़ी को नकार नही सकते,हाँ समझ के साथ आप आगे बढ़ते हैं।यह लफ्ज़ हमारे नही हैं।यह वह गहराई के अल्फ़ाज़ हैं जो मेरे कान हमेशा सुनते रहे हैं।दिल ने हमेशा आपके हर लफ्ज़ को उतारा है।मैं सोचता हूँ की आप पर लिखने का साहस भला कब आएगा।

आप पर मैं लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था। अब आप सामने हैं, तो सबकुछ दिखने लगा है । आपका यौवन ओढ़े गम्भीर चेहरा अजब सी रौशनी पैदा करता है।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे अकेले घंटों बातें की तब खुद को समझ सका।वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।

मेरी ज़िन्दगी को हर घङी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप ,वही तो थे मेरे विवेकानन्द।आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बङा फ़र्क है।
आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखायाऔर दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे।मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें 39 साल की मामूली सी उम्र में जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं, पार करना तो सोचे भी ना।

हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ ।तब से मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।लिखने को तो बहुत से किस्से याद आ रहे,आखरी वक़्त पर बिस्तर पर पड़े बीमार चिड़चिड़े विवेकानंद को लिख सकता हूँ,दुनिया को रौशनी देता हुआ चमकदार विवेकानंद लिख सकता हूँ मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं ।सनातन के साथ सारी दुनिया फख्र करे की उसके पास विवेकानन्द हैं और मै फख्र करू क्योंकि अपनें दोस्त की ज़मीन पर पैदा हुआ हूँ।

लोगों के लिए आज आपकी पुण्यतिथि है, झूठ बोलते हैं लोग।मेरे विवेकानंद मुझमे ज़िंदा हैं।वह रोज़ मुझसे बात करते हैं।डाँटते हैं, समझाते हैं, प्यार करते हैं।विवेकानन्द आप हमारे दिल और ज़हनियत में हमेशा मज़बूती से रहेंगे कल रात वाला वादा फिरसे।