Wednesday, May 12, 2021

विपक्ष छोड़ ज़िम्मेदारी ले

फैनहे लोग काम ढेला भर नही करेंगे,रोएंगे इतना कि जैसे इनसे ज़्यादा किसी ने मेहनत नही की है । सत्ता पक्ष विपक्ष के सामने अपना फैनहापन लेकर फिर खड़ा हो गया है । पुराना खटराग चालू है कि विपक्ष नही करने दे रहा,वह हुल्लड़ मचा रहा,बदनाम कर रहा है ।

अरे कौन विपक्ष तुम्हारा हाथ पकड़े ले रहा कि तुम लोगों को वैक्सीन न दे पाओ । विपक्ष कहाँ तुम्हारे पैर खींच रहा कि तुम अस्पताल न बना पाओ । विपक्ष कौन तुमको गोदी में दबोचे है कि तुम लोगों को ऑक्सीजन न दे पाओ । विपक्ष कौन तुम्हे रस्सी से बांधे दे रहा कि गरीब की मदद न कर पाओ । विपक्ष तो कह रहा है की थोड़ा संवेदनशील हो जाओ,तुम इसे हूटिंग ही समझ लो ।

अब सचिन कहें कि हूटिंग हो रही थी,तो हम रन नही बना पाए,धोनी कहें कि हूटिंग में हमसे कप्तानी नही हो पाई । गांगुली कहें कि हूटिंग से हमे बदनाम किया जा रहा,तो हम बैटिंग कैसे करें । अरे अगर तुम वाक़ई कुछ कर रहे हो तो हूटिंग से क्या घबराना,धोनी, सचिन,गांगुली सब अपने काम से पहचाने गए,हूटिंग पर फैनहापन फैलाने से नही सम्मान पाए हैं ।

एक बात जान लें,अगर आपने ईमानदारी से काम किया है, तो कोई विपक्ष आपको बदनाम नही कर पाएगा । अगर लोगों को ऑक्सीजन और अस्पताल समय पर मिला है, तो कोई इसे झुठला नही पाएगा । नदियों में लाशें फूलकर तैरती हुईं दिखें,श्मशान में लाइन लगनी पड़े,दवाओं के लिए मुँहमाँगी रकम देनी पड़ी,एक अदद बेड के लिए हर घर की चौखट पर भीख मांगनी पड़े, तो इसे अगर कोई कहे या न कहे,आवाम को महसूस तो होगी ही,यहाँ विपक्ष के ऊपर नथुने फुलाकर रोने से काम नही चलेगा,आपको असलियत में काम करना होगा ।

बचपन में जो लौंडा ढंग से क्रिकेट नही खेल पाता, वह कभी बल्ले की कमी निकालता, कभी पिच की,कभी बॉल की,तो कभी सामने के खिलाड़ियों की,तो कभी तेज़ धूप की,तो कभी हम हवाओं की,तो कभी जूते की तो कभी मैच देख रहे लोगों की,मगर वह कभी अपनी कमी नही देखता,इसलिए वह कभी अच्छा क्रिकेटर नही बन पाता । इसलिए कह रहे विपक्ष पर ठीकरा फोड़ने से पहले अपनी ज़िम्मेदारी उठाना सीखें ।

विपक्ष वही करेगा,जो उसे करना चाहिए, आपकी पहाड़ जैसी गलतियों को वह बतलाएगा,आप चाहे नथुने फुला फुलाकर उन्हें चाहे साही बना दें,विपक्ष अपना चरित्र नही छोड़ेगा, आप भी सत्ता का चरित्र यानि ज़िम्मेदारी लेना,सीखिए । लोगों को तक़लीफ़ थी,है, यह देखिये,विपक्ष को गरियाने का बहुत मौका मिलेगा, उसपर राजनीति मत कीजिये, वरना जल्द ही विपक्ष में होइएगा और फिर कोई और आपके गले में अपनी नाकामियां डालकर रायता फैलाएगा ।
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Saturday, May 8, 2021

मदर्स डे

हैप्पी मदर्स डे । अक्सर जब भी मदर्स डे आता तो हम इमोशनल हों जाते हैं, मां में संसार,ईश्वर,देवी सब देखने लगते हैं, हमें तो साक्षात देवी के अस्त्र शस्त्र भी दिखने लगते हैं । जैसे ही फूल से झड़ते शब्द लिखने बैठते हैं, लगता है कोई बहुत ही चपटी चीज़ पीठ में चट सी चिपकी है, जब तक इसको पहचानने की कोशिश करें,तब तक गिनती दहाई छूने लगती और जब अपने बहुत से निशान छोड़ देती,तब एहसास होता कि चप्पल है, जिसने अपनी जगह को दगा देकर,हाथों से अपने हुनर को दिखाने को हमारी पीठ चुनी है ।

मां है तो तमाम एहसासों का नाम मगर जिसने हैंगर की मार ही न खाई हो,वह कैसे भला माँ को याद कर पाएगा । सर पर हाथ तो तब फिरते थे,जब बुरे दिन होते मगर अच्छे दिनों में अगर झाड़ू,वाइपर,बेलन,पँखा हमारे जिस्म को न छू लें,तो लगता मां हैं ही नही क्या,इनके बिना मां का तसव्वुर बेईमानी लगता है । 

पिता जी पर रखा गुस्सा हो या दादी की ज़ुबान को ज़ब्त करते हुए अपने दर्द को रास्ता देना हो,जो सबसे आसान शिकार मिलता,उसपर बरसने वाले इन हाथों को आज याद करना चाहिए । हम हमेशा संवेदनाओं से लदे पेड़ की तरह मां को याद नही करना चाहते,हम उन्हें देवी की तरह एक कमरे में बैठाकर पूजना नही चाहते । हम उनकी मार से बचते हुए ज़िन्दगी गुजारना चाहते हैं, उनकी घूरती हुई आंखों के डर के साय में निडर होना चाहते हैं ।

हमारी पीठें,हमारे सर,हमारे कूल्हे,हमारी फीलियां गवाह होनी चाहिए कि जब इन्होंने अपनी सीमाएं लांघी थीं, तो इन्हें छाँट दिया गया था । मुझे मां का वही रूप पसन्द है, जो बच्चों को बच्चा बनाए रखती थीं । मुझे वह बड़ी होती औलाद की माँ नही पसन्द,जिसे अपनी खुशी को गले मे घोटना पड़े । मुझे अपने बेटे के सामने संकोच में मुँह न खोलने वाली मां नही पसन्द,बल्कि बेटे के कनपटी लाल करके उसकी गलती को सुधार देने वाली मां पसन्द है ।
मुझे मां की मूरत नही पसन्द बल्कि गलती करके मां के सामने मूरत बनी औलाद वाली मां पसन्द है । हममें से अधिकतर को ऐसी ही मां मिली हैं, जिन्होंने हमे छाँट कर बड़ा किया है । तो क्या हमारी मोहब्बत में कोई कमी आ गई,हरगिज़ नही,बल्कि बनावटीपन के हर पर्दे हमने उतार दिए ।

आज मदर्स डे है, तबियत से याद कीजिये मगर बदन के उस हिस्से को भी सहला लीजिये, जिसपर माँ ने तराश लगाई थी । वह बड़े ही फीकी औलादें हैं, जिनको मां के हाथ के अस्त्र का स्पर्श नही हुआ है, खैर हम लोगों को तबियत से स्पर्श हुआ है । मुनव्वर राना के शेर तो श्रद्धा लाते हैं मगर मां के हाथ का बटा प्रसाद भी याद आता है, यही मिश्रण तो हमारा जीवन है, जिसे हम कम नही करना चाहते,मदर्स डे की शुभकामनाएं💐♥️
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बोया पेड़ बबूल

एक बात हमेशा पढ़ते आए थे मगर उसपर इतना पुख़्ता यक़ीन नही था । हमें लगता था कि जो मिसालें दी जाती हैं, वह सच्ची शायद ही हों,हम बस मिसालें दोहरा दिया करते थे,कभी यह नही सोचा कि यह हमारे सामने इस क़दर सच्ची होकर खड़ी हो जाएंगी ।

एक मिसाल थी कि बबूल का बीज बोओगे तो फल आम के नही पाओगे । हम लोग अक्सर इसको बोल देते थे,हम तो बहुत बार कट्टरपन के पक्ष में खड़े लोगों से यह कहा करते थे,मगर सच में हमें नही लगता था कि यह मिसाल इतनी जल्दी आंखों में आँखे डालकर हमारे सामने खड़ी हो जाएगी ।

हमने नफरत की माला पहनाकर,अपने दिल को इसके ज़हर में डुबाकर एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए चुन लिया,की उसकी खूबी ही नफरत थी । हमने बबूल को लाइन लगकर बोया था,सबके दिमाग मे मीठे आम की तस्वीर उभर रही थी । हुआ क्या,जब पेड़ बड़ा हुआ,तो कांटो ने हमारा स्वागत किया,फल की आस में दो फलों वाले कांटे ने पाँव में चुभकर एहसास करवाया की जो बोया है, वही पाओगे ।

यह बात सच्ची साबित हुई कि किसी के प्रति नफरत रखकर, ईर्ष्या को पालकर,हिंसा पर पलके झुकाकर, झूठ को ज़ेवर बनाकर,कभी कोई नस्ल खूबसूरती से आगे नही बढ़ सकती है । जब दिल में विनाश,नफ़रत और दूसरे की बर्बादी के बीज रोपे जाएँगे,तो तामीर भी नफरत के महल ही होंगे,जो हमारे चबूतरों से खुशियों को ऐसे उड़ा देंगे,जैसे वहशी बिल्ली को देख कबूतर उड़ जाते हैं ।

एक धर्म,एक जाति, एक क्षेत्र से की गई नफ़रत सिवाए सबकी बर्बादी के और कुछ नही लाती । हाथ मे बबूल के बीज लिए आम के ख्वाब देखना,खुद से छलावा था । खुद को धोखा देना था, अपने बच्चों को ग़लत रास्ता दिखलाना था । यह सब साबित हो गया है । कांटे को चुभना आता है, उसे होंठो से चूमना सिर्फ भरम था ।

जब भी अपने चुने इंसान को देखना,तो गौर कर देखना उसकी खूबियों को,उसके पास सिर्फ एक खूबी है, जो हमारी नफ़रत को सांस देती है बस । हो सके तो अपनी मिट्टी से वफादार हो जाना,इस मिट्टी पर खड़े लोगों से मोहब्बत करने वाला ही इसका वफादार है । इस मिट्टी पर खड़े इंसान की पीठ में खंजर उतारने वाला इस मिट्टी का दुश्मन है, हो सके तो तमाम तबाही के बाद आपस में मोहब्बत कर लेना ।

यह बात किसी एक धर्म,जाति, वर्ग,क्षेत्र या लिंग के लिए नही है । हर एक केलिए है कि आपस मे प्रेम,सद्भावना,एकता से रहो, ताकि हर दर्द का मिलकर मुकाबला कर सको । जो तुम्हे बांटे, उसमे बबूल के बीज देख लो और अपने बच्चे के हाथ में आम थमाने का अगर ख्वाब देखते हो,तो इस बीज से दूरी बना लो ।
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Thursday, May 6, 2021

कहानी यम और मलकुल

आसमान के नीचे और ज़मीन के ऊपर बड़ी अफरा तफरीह थी । दो अजीब सी शक्ल वाले लोग पसीने से तर बतर मेहनत में लगे हुए थे । दोनों अपने कामों को इस क़दर मुस्तैदी से अंजाम दे रहे थे कि एक से एक मेहनती इंसान भी उनके सामने शर्मिंदा हो जाए,हालांकि इंसान शर्मिंदा होने के सिवा कर भी क्या सकता है ।

दोनों आजकल ओवरटाइम कर रहे थे,ओवरटाइम क्यों कहे,बल्कि टाइम जैसी चीज़ गायब हो चुकी थी, बस काम ही काम था । यह दोनों आपस मे पहले परिचित थे या नही,पता नही,मगर आजकल दोनों लगातार भागदौड़ कर रहे थे,अपने नीचे की कलीग को निर्देश देते और ख़ुद बिना उनकी तरफ देखें, अगले बिस्तर की तरफ बढ़ जाते,हाँ बिस्तर, उनके काम की वजह आज बिस्तर पर ही तो थी ।

यह दोनों अपने अपने मानने वालों के घर जाते और इतनी तेज़ी से उस घर से निकल जाते की घर के लोग कुछ समझ पाते,उससे पहले यह दूसरे घर घुस जाते,यूँ इनका आना जाना कोहराम मचाए था,मगर यह सब चीज़ों से कान ढके,बस बढ़ते ही चले जा रहे थे ।

अब तक अपने अपने हिस्से के घरों में दाख़िल होने वाले यह दोनों,अचानक एक ऐसे घर में पहुँच गए,जहाँ इनके पैर ठिठक गए । एक को एक महिला को लेकर जाना था, दूसरे को उस महिला के पुरुष को ले जाना था,दोनों के जाने का वक़्त एक था,इसलिए यह दोनों अचानक एक घर पहुँच गए ।
दोनों ने पहली बार नज़र भरकर एक दूसरे को देखा, फिर बिस्तर पर पड़े दो इंसान देखे और उनके सीने पर हाथ रखे एक चार साल के बच्चे को देखा । बच्चा अपने हाथों से दोनों को जिलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था । बिस्तर पर पड़े उसके मां बाप सांस उखड़ने और चलने के बीच दम लेकर बच्चे को देखते और कसमसा कर रह जाते ।
दूर खड़े यह दोनों पहली बार शंका में थे कि कौन पहले अपना काम करे,जब दोनों बच्चे को देखते तो ठहर जाते,इनकीं आंखों में शर्म थी,यह शर्म पहले भी तमाम बच्चों को अनाथ करते आ जानी थी मगर सबको पता है, हम अकेले बहुत बेशर्म होते हैं, किसी के सामने बड़े शर्मदार,तो आज मौका था कि यह दोनों आमने सामने थे,तो एक दूसरे की आंख में शर्म भी टपकने लगी ।

एक ने पूछा,तुम कौन हो,उसने कहा मलकुल मौत और सवालिया नज़रे पहले वाले कि तरफ गड़ाई,वह बोला मैं यमराज । मलकुल मौत ने अपने समकक्ष यमराज को देख कहा,आजकल आपपर बहुत काम पड़ रहा होगा,यमराज ने हाँ में सर हिलाया और बोले,आप को भी लगातार लगे रहना पड़ रहा होगा,इन इंसानों को थोक में ढोना मुश्किल हो रहा,खैर अपनी सुनाए, यह दोनों अपनी बातचीत में लग गए और उधर बिस्तर पर पड़े दोनों अपने बच्चे को सांसों के सहारे आखरी गिनती सिखाने लगे ।

जब दोनों की बात खत्म हुई,तो यमराज बोले,इसका क्या करें,एक तुम्हारा है, रक हमारा,यह बच्चे का क्या होगा,इसे लेने किसे आना पड़ेगा । मलकुल मौत बोली हो सकता है, बच्चे को हम सबकी ज़रूरत ही नही पड़े,वह खुद ही चला आए,जहाँ उसकी मर्जी हो,हमे तो इनमें से अदला बदली कर लेनी चाहिए । यमराज बोले हाँ, यह दोनों ज़िन्दगी भर गंगा जमुनी तहज़ीब ज़ुबान पर लाते रहे हैं, चलो आज इंसानों की गंगा जमुनी तहजीब अपनाकर देखी जाए,तुम मेरे वाले को लो जाओ और हम तुम्हारे वाले को लेकर चलते हैं ।

दोनों ने ऐसा ही किया और जैसे ही घर से बाहर निकले,मलकुल मौत के कंधे पर यमराज का हाथ था,दोनों कहकहे लगा रहे थे ,मलकुल मौत ने कहा,भाई,आपके पास आजकल हमसे ज्यादा काम है, कहिए तो हम भी हाथ बंटा लिया करें । आप अकेले पपरेशान होते हैं । यमराज की आंख में आंसू आ गए और मलकुल मौत से कहा, यह कोरोनाकाल निकल जाए,तो हम मिलकर साथ खाना खाएँगे, हम भाई ही तो है, अगर मिलकर काम करते,तो इतनी बोरियत नही लगती,कभी तुम मेरे आंसू पोछते तो कभी हम तुम्हारे,ज़िन्दगी कितनी खूबसूरत होती यार । बच्चा बिस्तर पर पड़े जिस्म देख रहा था और देख रहा था गंगा जमुनी तहज़ीब को दूर आसमान और ज़मीन के दरमियान गुम होते हुए भी....
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Monday, May 3, 2021

हज़रत अली

किसी को लगता था कि धोखे से पीठ में उतारा एक ख़न्जर उनको ख़त्म कर देगा,ज़ालिम भूल रहा था कि वह शख्सियत मिट्टी के जिस्म की मोहताज ही नही थी । उनका जिस्म तो रुखसत हुआ मगर उनकी रूह दुनिया में ऐसी चमकी,ऐसी चमकी की पूरी क़ायनात ही रौशनी से भर उठी। उनमें नरमी ऐसी की नरमी से पिघला मोम भी उनके पैतियाने बैठ सीखे।   ताक़त इतनी की उस दौर में का सख्त तपा हुआ लोहा मुरझा जाए । मोहब्बत इतनी की ख़ुशबू रहती दुनिया के बाद भी महके है। इल्म इतना की लाखों किताबें एक करवट से निकलें। ख़िदमत ऐसी की दुनिया की सबसे शानदार मिसाल । दानशीलता ऐसी की खुद का खून निचोड़ कर ज़रूरतमंद में बाँट दें । इंसाफ ऐसा की तराज़ू का कांटा माशा भर भी इधर उधर न झुके । यूँ कहे हर फ़न में तारीख़ गढ़ने वाली नायाब शख़्सियत ।

जिनकी पैदाइश का गवाह काबा और शहादत के आँसू मस्जिद ने बहाए हों  । जिनको मिटाने के लिए भी रास्ता वह चुना गया,जब उनका सर खुदा के सजदे में हो, खुदा के सामने झुके सर पर भी पीठ पर वार करके सोचा था कि उन्हें मिटा लेंगे और वह चमक कर घर घर,नस्ल नस्ल में रौशन हो गए ।यह हैं हमारे  हज़रत अली ।

मेरा दिल जब डूबकर लड़खड़ाता है तो उसे सहारा देते हैं मेरे अली। अली ने सूफ़िज़्म की वह नीव रखी जिसकी आगोश में सारा जहाँ आ गया। जब उन्होंने मोहब्बत से बाहे फैलाई पूरी आवाम सर झुका के खड़ी हो गई। हर एक के सवाल,परेशानी,दर्द,तकलीफ़ में जिसने फाहे का काम किया वह अली थे। 

जब आँखों में अँधेरा और मुस्तकबिल में कालिख़ दिखी तब रौशनी का काम किया अली ने। मेरे अली ने हर पके दर्द में शिफ़ा का चीरा लगाया। हर तकलीफ़ में मरहम के फाहे रखे ।  इंसानियत को अपनी मोहब्बत और दूरंदेश सोच से ऐसा रास्ता दिखाया की इंसानियत की राह आसान हो गई।

 जिन्होंने हज़ारों साल पहले वह कह दिया जिसकी आज भी उतनी ही ज़रूरत है जितनी तब थी। अपने क़ातिल तक के लिए कहा की इसको सिर्फ इतनी ही सज़ा देना जितना इसका गुनाह है । सज़ा गुनाह से बढ़कर मत हो। इंसाफ में माशा भर फ़र्क़ न आने पाए ।

आज 21वीं रमज़ान उनकी शहादत का दिन है,एक कुंठित बीमार दिमाग ने उन्हें खत्म करना चाहा था। 19वी रमज़ान को पीठ पर खंजर मारा और 21वीं रमज़ान यानी आजके रोज़ हज़रत अली जिस्म से आज़ाद होकर इंसानियत के ज़र्रे ज़र्रे में ज़िन्दा हो गए । अली अपने जिस्म से उठकर आम लोगों की रूह में उतर गए। आज जब हज़रत अली को याद करिए,तो सबसे पहले खुद में सब्र लाइये, हिम्मत को जगह दीजिये,सख़ावत को ज़ेवर बनाइये,इल्म में डूब जाइये और ऐसे मोती चुनिए की इंसानियत मुस्कुराए ।

 हज़रत अली से सीखिए की गरीब अमीर के फ़र्क़ बिना,मज़हब और सोच के फ़र्क़ बिना,काले गोरे के फ़र्क़ बिना,औरत आदमी के फ़र्क़ बिना इंसाफ और मदद कैसे की जाती है । दुनिया की वह नायाब मिसाल जिसने अपनी बीवी हज़रत फातिमा को बराबर से बैठाया,उनके इल्म ओ हुनर को महकने दिया,उनके किरदार पर पहरे बैठाने की जगह उसे खुलने दिया,बेपनाह मोहब्बत भी की और हौसला भी दिया । अपने बच्चों को सच्चाई के लिए मर मिटने का सबक़ देकर बड़ा किया, उनमें ख़िदमत को कूट कूट कर पैबस्त किया और ज़ुल्म के आगे झुकने की जगह तनकर खड़े होने का गुर सिखाया,उनसे सीखिए और अपने परिवार,अपने घर,अपने दोस्तों,जानने वालों को सुधारिये, सिखाइये,खुद को निखारिये,यही हज़रत अली को याद करने का सबसे बेहतर तरीका है ।

जो इंसाफ के साथ है, वह हज़रत अली के पीछे खड़ा है । जो ज़ुल्मी के ख़िलाफ़ मज़लूम के साथ खड़ा है, उसके सर पर हज़रत अली का हाथ है । जो इल्म के लिए भूख प्यास भूला है, उसकी आँखों की चमक हज़रत अली हैं । जो झुककर परेशान को सहारा दे रहा, उसके कंधों पर हज़रत अली का हाथ है । जो यतीमों को मोहब्बत,इज़्ज़त और मज़बूती दे रहा,उसके दिल की खुशबू हैं हज़रत अली । जो हर एक कि बराबरी के लिए लड़ रहा,उसकी ढाल हैं हज़रत अली । हर अच्छाइयों की वजह हैं, हमारे हज़रत अली,बस दुआ की सुई की नोक के बराबर भी आपका किरदार हममें आ जाए,तो ज़माना महक जाए,दुआएँ ...