Thursday, November 24, 2016

लज़्ज़त वर्सेज़ ज़िल्लत


अहा कितनी खुशबू आ रही है।ज़ाफ़रान से रँगी शीरमाल और कबाब।बिरयानी और शोरवा।शोरवे में डूबी खुशबूदार बोटियाँ।दस्तरखान अपने उरूज पर महक रहा है।रोस्टेड चिकन अपनी टाँग उठाए रखा है।उसकी दरारों में मुगलई मसालों ने परत जमा रखी है।फ्राई फिश बोनचाइना की खूबसूरत प्लेट में करतब कर रही है।शाही टुकड़े के क्या ही कहने।चाँदी के वर्क़ और ज़रद रँग पर उमड़ी सफ़ेद परत में उमराव जान नज़र आ रहे हैं।वोह हरी पत्ती चावल का ज़र्दा भी तो तड़प कर बता रहा है की मियाँ हम भी बाक़ी हैं।सब कुछ हज़म कर लेने वाले पेट में थोड़ी जगह रखना।हर एक चीज़ लज़्ज़त के साथ तड़प रही है।
लानत हो।लानत हो।लानत हो।
ऐसे दस्तरखान और उसकी खुशबू में मदहोश ज़बान को क्या कहें।यह उन रसूल के उम्मत का शाही दस्तरखान है।जिन्होंने चीख़ चीख़ कर।मिन्नते करके।समझा समझाकर भेजा था की अपनी भूख से कम खाना।खाना गर्म मत खाना की कहीं तुम ज़ायके के चक्कर में भूख से ज़्यादा न खा जाओ।वोह रसूल खुद एक वक़्त खाना खाते।एक ही चीज़ खाते।अगर गोश्त को ज़बान लगाते तो रोटी और चावल की तरफ न देखते।दाल रोटी होती तो दूसरी तरफ न देखते।उन्होंने ताउम्र भुना गोश्त ज़बान पर नही रखा।हमेशा कहा की सबकी फ़िक्र करो।पड़ोस का दस्तरखान अगर सूना है और तुम्हारे दस्तरखान पर बहार आई है, तो इस बहार को लानत है।वोह रसूल जो पेट में पत्थर बाँधकर तरक्की के रास्ते बनाते चले गए।वोह मोहम्मद जिन्होंने मामूली सी मामूली चीज़ पर छांप छोड़ी।जिन्होंने यहाँ तक कहा की अँधेरे में पानी मत पीना।इतनी नीचे से ऊपर तक किसने उनसे पहले सोचा और समझाया था।
मैं अभी कह रहा हूँ जितनी जल्दी हो सके अपने आप पर मेहनत करो।अपने किरदार को तराशो।मोहम्मद के जैसी मोहब्बत दिलों में लाओ।हर बुरे,बद एखलाक,दुश्मन को मोहब्बत से जीतो।दिल बड़ा करो।ज़िन्दगी में किसी से बेहतर सीखने के लिए पीछे मत हटना।राम,कृष्ण,बुद्ध,नानक,ईसा या जिससे भी कुछ पा सको जो ज़मीन को महकाए,उसे बिना फ़र्क़ अपना लो।इतना जान लो इस ज़मीन पर मोहब्बत के सिवा सब खत्म होगा।मोहब्बत इसलिए रहेगी ताकि आने वाली नस्लें में उर्वरा बनी रहे।जिन्होंने मोहम्मद को नही पढ़ा,समझा है।वोह ज़हमत करें और ज़िन्दगी को जीने का सलीक़ा सीखें।ऊपर सजे दस्तरखान से मुँह फेर कर रसूल की ज़िन्दगी के फ़लसफ़े को अपनाओ।

Tuesday, November 22, 2016

मोहब्बत का ज़ायका

आओ तुम्हे पुराने खड़ंजे पर ले चले।उस खड़ंजे से सटी कच्ची गली में ले चले।कच्ची गली के तीसरे घर में ले चले।तीसरे घर के छप्पर में पड़े पलँग पर बैठाएं।तब कोई तुम्हे मट्ठे का गिलास भर कर दे।हल्की सी शकर डालकर।तुम पियो तो,मट्ठे की खटास मिठास के साथ जब मुँह में घी की हल्की सी फुटकी फूटेगी और उसके दानेदार बिखराव से ज़बान एक अलग एहसास को महसूस करेगी।इसका ज़ायका कहीं और नही मिलेगा दोस्त।
अच्छा चलो तुम्हे चमकते हुए इंटरलॉकिंग टाइल्स पर ले चले।रास्ते में लगे झुरमुट फूल वाले पेड़ो से सर को बचाना।विक्टोरियन लैम्प की खूबसूरती में रुक मत जाना।तुम्हे चलो हॉउस नम्बर 12/345 में ले चलें।गेट से घुसते ही खूबसूरत घर में दमकते मार्बल में ले चले।ज़बरदस्त खूबसूरती बिखेरती पीयूपी और दूधिया रौशनी उड़ेलती एलईडी में ले चलें।इटैलियन डायनिंग टेबल पर बोन चाइना की नाज़ुक प्लेट में कोई नेपकिन लगाकर तुम्हे अगर अपने हाथ की बनाई ओनियन पकौड़ी दे तो इसका भी मज़ा कहीं और नही मिल सकता मेरे दोस्त।
देखो दोनों तरह के ज़ायके और माहौल का मज़ा लेना हो तो बिंदास,बेलौस लोगों के दिलों में उतरो।उनकी धड़कन को महसूस करो।उनके जज़्बात की क़दर करो।उनकी साँसों की पाकीज़गी पर सर झुकाओ।यक़ीनन तुम्हे सब ज़ायके अपनी खलिस खास खुशबु के साथ तुम्हे वजूद को महका देगी।मगर,हाँ मगर जैसे ही तुम इसमें मज़हब देखोगे,इसमें अपने विचारों की शक्ल देखोगे,इसमें पार्टी देखोगे,इसमें ज़ात या भोगौलिक सीमाएँ देखोगे,एक झटके में तुम किसी घूरे की तरह इनसे कहीं दूर खुद को पाओगे।मट्ठा और पकौड़ी तो लोग तुम पर फेक जाएँगे मगर कभी भी तुम्हे वोह आलीशान कोठी स्वीकारेगी और न वोह सौंधा छप्पर।तुम अकेले अपनी गन्दगी के साथ खुले आसमान के नीचे पड़े रहना।
मैं अभी कह रहा हूँ अगर इस ज़मीन की खुशबू महसूस करनी है तो अपनी हदें तोड़ दो।इस माटी को ज़िन्दगी में महसूस करना है तो नफ़रत के नुकीले तारो को काट दो।इस मिटटी के सच्चे आशिक बनना है तो दूसरों से नफ़रत करना छोड़ दो।इस माटी का सच्चा वारिस वही है जो इस माटी पर बसने वाले हर एक से मोहब्बत करे।उसके दर्द को समझे।उसकी खुशिओं में शामिल हो।आओ चलो तुम्हे मोहब्बत के दरिया में ले चलें जहाँ बुधई की दुल्हन मट्ठा लिए बैठी है और करन की ममा ओनियन पकौड़ी।आओ तुमहे दोनों की ऊँगली का ज़ायका दिलवाऊँ, बसतुम नफ़रत को बहुत दूर जाकर थूक दो मेरे दोस्त।

Monday, November 21, 2016

यह भी तो हैं

देखो दूर कहीं मीर अनीस खड़े हैं।रुँधे गले से मर्सिये सुना रहें हैं।मैं तुमसे कह रहा गर्दन घुमा कर देखो तुलसी अवधी में रामायण के पन्नों को पलट रहे हैं।पीछे देखो रसख़ान कृष्ण के पाँव में पड़े दोहे चौपाई की फसल बो रहे हैं।उधर दूर सर ऊँचा करके देखो न मोहम्मद रफ़ी ने तान भर दी है।सर झुकाकर देखो उस्ताद बिस्मिल्ला खान शहनाई बजा रहे हैं।देखो चौकी पर मुँशी इंशा अल्लाह खान रानी केतकी को बैठाए निराला से बतया रहे हैं।वोह रहे जायसी और ख़ुसरो,देखो क्या बुन रहे हैं।कबीर काली दास को गेंदे की माला पहना रहे हैं।अरे उधर गाँव तकिया से टेक लगाए ग़ालिब,कृष्ण बिहारी नूर,फ़िराक़,मीर तक़ी मीर,साहिर,मजाज़ की महफ़िल को देखो न।बगल में लेटे सज्जाद ज़हीर और प्रेमचन्द की तो फ़िक्र कर लो न।अमृता,मंटो,इस्मत,श्रीलाल,केपी सक्सेना,राही मासूम रज़ा उधर बैठे अंताक्षरी खेल रहे हैं।
यह सारे नाम आज क्यों ले रहा हूँ।ताकि तुम देख लो इस बहस और घुटन भरे माहौल में तुम क्या क्या छोड़ते जा रहे हो।देखो जब तुम्हे सिर्फ दो ध्रुओं पर खड़ा कर दिया गया हो तो यह ओस की बूंदे कहाँ महसूस होंगी।जब तुम्हारी सुबह से रात सिर्फ सियासी चौखट पर बीतेगी तो इन्हें कहाँ महसूस कर पाओगे।सच बताऊँ जब जब तुम्हे सिर्फ सियासत में उधड़ते,बिखरते,मिटते देखता हूँ तो लगता है की यह क्या हो गया।जब तुम ज़िन्दगी के रस को छोड़ विषपान कर रहे होते हो तो डर जाता हूँ।जब तुम उन विषयों पर खुद को बाँट रहे होते हो जो दूसरों ने तुम्हारे दिल में डाले हैं तो अफसोस होता है।मेरा यक़ीन करो जब तुम उलझ जाना।जब तुम अवसाद के मुहाने पर होना।जब तुम बेचैन होना तो ऊपर बताए किसी को भी थाम लेना।सुकून मिलेगा।वही सुकून जो तुम कहीं किसी कोठरी में रख कर भूल गए हो।अपने को पार्टी का कार्यकर्ता या प्रवक्ता मत बनाओ।इधर उधर मौजूद हर रस का मज़ा लो।यही तो ज़िन्दगी है।ज़िन्दगी को जियो ताकि चेहरे पर मुस्कान बाकी रहे।

Saturday, November 19, 2016

डर का व्यापार


देखलो आपातकाल के नाम से मुल्क़ को डरवाना बन्द कर दो।लोगों के दिलों में डर मत पैदा करो।उन्हें कल के अँधेरे की तरफ आज ही मत ले चलो।जिस देश ने हर तरह के ज़ुल्म सहकर आगे के ख्वाब बुने हों,उन्हें कमज़ोर मत करो।
मैं मानता हूँ की कुछ कदम गलत हैं, तो कुछ तरीके।मगर मेरा यक़ीन करो इस मुल्क़ को इन सबसे निपटना आता है।मैं तुम्हे किसी भी हाल में सीरिया,लेबनान,लीबिया,इराक़ नही बनने देना चाहता।मेरी तरफ देखो,सोचो,तुम्हारा हर क़दम इस ज़मीन के उस हिस्से को संवारने में लगना होगा जहाँ तुमने पहली साँस ली थी।किसी प्रोपेगण्डे में मत पड़ना।अगर तुम्हे लगता है, यह सरकार गलत है, यह नेता बुरा है तो उठो।लोगों को तैयार करो की वोह इन्हें हटा दे।अपने लोगों पर भरोसा करो,वोह ज़्यादा दिन गलत को सही जगह नही बैठाएंगे।
तुम अगर वाक़ई लीडर हो तो सोच लो की तुम्हारा काम क्या है।तुम्हारा काम है अपनों के दिलों में पैदा डर को खत्म करना।मगर तुम आपातकाल को दिखाकर अपनों को डाराओगे तो बताओ तुम्हे कैसे अपना लीडर कहूँ।मेरी बात की गम्भीरता को पकड़ो।डराने का काम वोह करता है जिसके पास जनाधार नही होता।जिसे अपने अंदर ही आत्मविश्वास नही दिखता।अगर तुममे कोई भी खूबी है, खुद पर भरोसा है तो अपनी जनता से कहो,जो होगा देखा जाएगा।लोगो को हिम्मत दो की हर ज़ुल्म के खिलाफ हम आगे खड़े मिलेंगे।
मैं अभी कह रहा की बहसी नेता मत बनों।लोगो को हिम्मत दो।लोग अगर परेशान हों तो उन्हें ज़िन्दगी के सुनहरे दौर को दिखाओ।उनमे विश्वास भरो।उनसे कहो की दोस्त अगर आपातकाल आ भी गया तो हम और तुम मिलकर उससे निपट लेंगे।कोई ने अगर देश को ज़रा भी नुकसान पहुँचाया तो हम और तुम मिलकर उससे अंत तक निपटेंगे।यह भरोसा दो की अगर तुम्हारी थाली में रोटी खत्म करने की साजिश होगी तो मैं तुम्हे अपनी आधी रोटी दूँगा।अपनी अवाम को भरोसा दो की मौत,ज़ुल्म,अँधेरा सब का तुम तक पहुँचने से पहले,मुझसे निपटना होगा।
अभी वक़्त है हर मुश्किल से लड़ने को तैयार हो और लोगो को तैयार करो।मायूस ज़रा भी मत हो।आज तुम्हारी बात भले अनसुनी हो जाए मगर यक़ीन करो ज़ख्म कब तक मरहम से भागेगा।लोग तुम्हे नही,बल्कि तुम्हारे अंदर मौजूद अपनी हिम्मत को ढूंढ ही लेंगे।रुदाली बनकर सिर्फ दामन ही नमकीन होंगे।लोगो को हिम्मत देकर तुम वाक़ई लीडर बनोगे।सोचो तुम्हारे पास से जो गुज़रे,वोह ज़बरदस्त तेज के साथ आगे बढ़े।उसके इर्द गिर्द मायूसी दम तोड़ दे।यह सच है जिस दिन से तुम डराने की ढाल की जगह हिम्मत की तलवार लोगे,यक़ीनन तुम लीडर बन जाओगे।देश लीडर की कमी से जूझ रहा है।देश क्या दुनिया जूझ रही है।अभी उठो और अस्थिमज्जा बन कर लोगो को मज़बूत करो।
जब जब तुम सीना तानकर खड़े होंगे।तब तब आपातकाल कुपोषण सा तुम्हारे सामने रेंगेगा।यक़ीन न हो तो आपातकाल से निपटने वाली पिछली पीढ़ी को देख लो।भरोसा रखो,गलत को गलत कहने से मत हिचको और सही को सही कहने के लिए मौत से गुज़र जाओ।बस ख्याल रखना हर कदम मुल्क़ और इंसानियत की तरफ हो।

Friday, November 18, 2016

जँगल जँगल


आपका बोलना,बोलने की लय, लय का उठान,उठान का गिरना,गिरने की खनक,खनक की झनकार,झनकार की गूजँ,गूँज की धुन है मौसिकी।मौसीकि नें मुझे हमेशा खीचा और जंगल ने हददर्जे सुकून दिया।बड़े लम्बे वक्त बाद जान पाया मौसीकि और जंगल का रिश्ता।हमेशा माना की  मौसिकी को ब्रह्मा ने पैदा किया,भरत मुनि ने अप्सराओ तक पहुँचाया फिर नारद मुनि इसे आकाश की खूबसूरत अप्सराओ से लेकर ज़मीन पर लाए।वैसे महादेव और हज़रत दाउद नें भी अपने अपने अन्दाज़ में इसे दुनियाँ में आम किया।

वैसे भी हमारे हर विकास की सीढ़ी जँगल से ही होकर गुज़रती है।वह जँगल जिन्हें हम विकास का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हैं।तभी तो अंधाधुंध खत्म कर रहे हैं।तो सुनिए इन जंगलो ने हमे खाना,रहना,साँसों के सिवा क्या दिया है।मौसिकी यानि म्यूज़िक का आधार दिया है।जँगल का मतलब सिर्फ पेड़ नही बल्कि पूरी एक संस्कृती,जिसमे जानवर भी हैं।सारेगामापा हमे उन्हीं जंगलो के जानवरो की आवाज़ से ही मिला है।

मोर(खड़ज)सा,पपीहा(रखब)रे,बकरी(गंधार)गा,कुलंग(मद्धम)मा,कोयल(पंचम)पा,घोड़ा(धैवत)धा,हाथी(निखाद)नी।यूँ सारेगामा करते जँगल को देखा तभी कहे जंगल क्यो रूह को सुकून देता है।हमारे जैसों का दिल कंक्रीट की दीवारो में कहा लगता बल्कि पत्तियो की आवाज़ हमे गिज़ा देती है।सारा दुनियावी तामझाम कुदरत की आवाज़ में खलल है और वह आवाज़ है मौसिकी।चोंच में सात सुराख़ से मूसिकर ने सुर भरे।यही मूसिकर चिड़िया के नाम से मौसिकी आज भी मुझमें ज़िन्दा है।

आप भी जंगलो को महसूस कीजिये जैसे बुद्ध ने किया था।जंगलो से बात कीजिये जैसे महावीर ने किया था।जंगलो को समझिये जैसे राम ने समझा था।जंगलो से खेलिए जैसे कृष्ण खेलते थे।जँगल को अपनाइये जैसे आदम ने अपनाया था।जँगल वह स्कूल है जो आपको आदिमानव से महामानव बनाता है।यह तो मौसिकी है हम तो सब कुछ जँगल से ही पैदा होते देख रहे हैं।बस जँगल की खूबियों को बिना अपनाये लोग जँगली होते जा रहे हैं।

Thursday, November 17, 2016

तुम हो तो हम हैं


सच बताएँ हम डर जाते हैं।यह डर बेहद दिल तक गहराता जाता है।दिल से ख़ून में उतर जाता है और ख़ून से जिस्म में,फिर जिस्म सफेद पड़ जाता है।सच बताएँ यह डर है तुम्हारे जाने का,तुम्हारे दूर हो जाने का डर।तुम्हारे मुँह फेरने का डर।
मैं कभी नही चाहूँगा की कुछ लीडर,कोई विचारधारा,कोई पार्टी की वजह से तुमसे दूर हो जाऊँ।सच में मेरे लिए रिश्ते अहम् हैं।मेरे लिए तुम्हारा एहसास अहम् है।यक़ीन जानो तुम्हारे लिए बहुत सी चीज़ें छूटी तो यह क्या है।
अगर किसी का विरोध तुम्हे दूर करेगा तो मैं चुप हूँ।अगर किसी का समर्थन तुम्हे दुखी करेगा।तो मैं चुप हूँ।अगर मेरे रास्ते तुम्हारे रास्ते को काटें तो मैं रास्ता छोड़ता हूँ।अगर मेरी आज़ादी तुम्हे चुभे,तो ख़ुशी ख़ुशी गुलाम कर लो।
मैं किसी भी कीमत पर अपने दोस्तों,अपने करीब के लोगो को तकलीफ़ देकर मुस्कुराना नही चाहता।मेरे लिए मेरे साथ के लोगो की मुस्कान अहम् हैं।उनके एहसास अहम् हैं।मेरे बगल में बैठा मेरा अपना अगर कुर्सी दूर कर ले तो यह शर्म की बात है।मेरे लिखे से अगर मेरा अपना चार फ़र्लांग दूर चला जाए,तो उस लिखे पर लानत है।मुझे पता है मुकम्मल मुस्कुराहट के लिए दांत और होंट का साथ आना ज़रूरी है।इन दोनों का एका ही तो ठहाका है, खुशियाँ हैं।
हमारा चरित्र सिर्फ जोड़ने वाला होना चाहिए।अगर यह तोड़ने लगेगा तो सब खत्म हो जाएगा।अपने इर्द गिर्द के लोगो को अपनी बहसों,झगड़ों,विचारों से दूर मत कीजिये।सारा वक़्त निकल जाएगा।लीडर निकल जाएँगे।मगर दिलों में पड़ी गिरह खत्म होने की जगह पकेगी ही।बाद में इस गिरह में पस पड़ेगा फिर नासूर।इसलिए ख़ामोशी से नासूर के बीज को खत्म कीजिये।
हर अपने को अपना बनाए रखने की मुकम्मल,मज़बूत कोशिश कीजिये।वोह हैं, तो हम हैं।हम हैं तो सब हैं।सब हैं तो भारत है।

Wednesday, November 16, 2016

सरमद


"हाँ तो कर दो न सर कलम।जब मेरा सर धड़ से जुदा होकर ज़मीन पर गिरेगा तब देखना,हाँ तब भी देखना सरमद मुस्कुरा रहा होगा।उसकी मुस्कान तुम्हारे आलमगीर के दिल में जलते गुरूर के चराग़ को बुझा देगी।"
सरमद को सर कलम करने से पहले उसका गुनाह बताया गया की सरमद के जिस्म पर एक भी कपड़ा नही रहता है।वोह नंगा घूमता है।आलमगीर के कई बार मना करने के बावजूद सरमद ने शर्मगाह पर एक बालिश्त का कपड़ा भी नही ढका।यह कुदरत के कानून के खिलाफ है जिसको ध्यान में रखकर सरमद को सज़ाए मौत दी जाती है।
सरमद मुस्कुराता हुआ कहता है कुदरत का कानून।जाओ अपने छोटे से दिल वाले बड़े आलमगीर से कहना की कुदरत का कानून सरमद ने नही तुम सबने तोड़ा है।तुम्हारे नंगे पैदा हुआ बादशाह ने अपने तन पर मखमल का टुकड़ा डाल कर कुदरत का कानून तोड़ा है।तुमने इंसानों के लिबास में फ़र्क करके कुदरत का कानून तोड़ा है।देर न करो ऐ मेंरे प्यारे जल्लाद।कहीं तुम्हारा दिल सरमद की बातों में लिपट कर सही तरफ न चला जाए।तुम्हे तुम्हारे ही आलमगीर से ज़िन्दगी छीन लेने का फरमान न मिल जाए।मेरा सर कलम कर दो।
एक झटके में मशहूर सूफ़ी सरमद का सर ज़मीन पर पहुँच गया।इस तरह आलमगीर ने अपने सबसे बड़े दुश्मन,कुदरत के कानून को दरकाने वाले,सरमद को सज़ाए मौत देकर ईश्वर की सत्ता की रक्षा की।इतिहास सरमद,आलमगीर और हमारी नज़रों में हमेशा उलझा रहेगा।

Tuesday, November 15, 2016

स्टील


बेगम अम्मी ने चीख़ कर कहा यह स्टील का गिलास कौन ले आया दहलीज़ पर।तुम कमबख़्तो को नही पता की स्टील की झूठी और आम चमक हमारी ज़मीदारी को निगल जाएगी।जब वोह चीख़ रही थी तो किसी को नही पता था स्टील, ज़मींदारी के गुरूर को कैसे तोड़ेगा।
देखते देखते ताम्बे और पीतल के बर्तनों की जगह स्टील और एल्युमिनयम ने ले ली।कहर तो तब टूटा जब चीनी और ताम चीनी की खूबसूरत नक्काशीदार प्लेटें बाजार में पहुँच गई या कूड़े के ढेर में और उनकी जगह स्टील ने लेली।बेगम ने पूरी हुक़ूमत को ताम्बे की तरह पिटते देखा।पीतल की तरह घिसते देखा।रौब और गुरूर को बार बार चीनी के बर्तन सा टूटते देखा।
एक दिन बेगम के कान में पड़ा की चना महंगा हो गया है।इतना महंगा की उसने गेंहूँ को भी पिछाड़ दिया है।गेहूँ से महँगे चने का तसव्वुर बेगम की सल्तनत की आखरी कील थी।वोह मुरझाई हुई,पान की बची इकलौती गिलौरी मुँह में रखती हुईं बोली"आह, मोटे अनाज ने महीन अनाज को पिछाड़ दिया है।यह हमारे डूबने की आखरी निशानी हैं।" इतना कहते हुए बेगम ने वही तख्त पर लुढ़क कर दिखा दिया की वाक़ई शम्मा बुझ चुकी है।बेगम के जिस्म पर उनका खुद का बुना कामदानी का सफ़ेद दुपट्टा डाला गया।कब्रिस्तान भी उन्हें उस वक़्त मयस्सर स्टील के पलँग पर ले जाया गया।आखिर स्टील ने अपनी वफ़ादारी निभाई और ज़मीदारी का गुरूर कब्रिस्तान तक पहुँचा कर पूरी कोठी को अपना लिया।

Monday, November 14, 2016

बिरसा मुंडा


कितना खूबसूरत स्कूल है।इतना विशाल की उसकी कल्पनाएँ मन में हिलोरे पैदा कर रही हैं।इंग्लिश ऐसी की वारे जाऊँ।यहीं स्कूल की दहलीज़ से खूबसूरत चमकता हुआ सुनहरा भविष्य दिख रहा है।आने वाला कल जिसमे मेरी टेबल पर बटर एन ब्रेड के साथ इंग्लिश का रुतबेदार अख़बार होगा।चार नौकर होंगे जो मुँह से निकले लफ़्ज़ को ऐसे लपकेंगे जैसे उनकी किस्मत बदलने वाली हो।
यह सब किसे नही अच्छा लगता।यह कल्पनाएं किसे नही ललचाएँगी।मगर जो इन सबको एक झटके में तोड़ दे।जो सुनहरे स्कूल की शक्ल से मुँह फेर ले।जो बटर एन ब्रेड से हाथ हटाकर धनुष थाम ले।जो अपनी भूख में दूसरों की भूख की तड़प देखे।जिसका भरा पेट अपनों की ख़ाली थाली के तसव्वुर भर से उलटी कर दे।जिसके गले में बिलखते बच्चों को देखकर निवाले फंसने लगे।वही तो है, जिसपर आज लिखा जाएगा।जिसपर कल भी लिखा जाएगा।
सर उठाकर देखिये।रोते बिलखते नेता बहुत मिल जाएँगे।गर्दन घुमाकर कर देखिये डराने वालों की कतार लगी हुई है।एक बार दिल में झाँक कर देखिये,तब दिल कहेगा की दोस्त तुम ख़ाली हो।तुम्हारे पास कोई लीडर नही,जो दिल के ख़ौफ़ को दूर करे।जो तुम्हे डराए नही बल्कि बढ़ाए।जो तुम्हारे लिए संघर्ष करते हुए सलाखों में दम तोड़ दे।दोस्त तुम्हारे पास कोई बिरसा मुंडा नही है।
आज यह सारी खूबियाँ।मुंडा समाज को लोहा बनाने की अद्भुत कला।एक एक आदिवासी के दिल में यह डालना की तुम हो तो सब है, वरना कुछ भी नहीं।बिरतानियों के दिल में जो ख़ौफ़ बिरसा मुंडा ने भरा वोह कौन कर सकता है।आदिवासियों को जो हिम्मत दी वोह कौन कर सकता है।अपना सुनहरा कल छोड़ संघर्ष में कुर्बान बिरसा मुंडा की आज पैदाइश है।आज उनको याद करके संघर्ष सीखने का दिन है।पूरे समाज को कैसे आगे लाए,कैसे उनकी साँसों की हिफाज़त करें,सीखने का दिन है।बिरसा मुंडा जैसी शख्सियत अब पहले से ज़्यादा ज़रूरी हैं।थोड़े थोड़े बिरसा हो जाओ दोस्तों,हम सब कल का बेहतरीन भारत गढ़ेंगे।सलाम बिरसा मुंडा।

Sunday, November 13, 2016

नानक

मैं मोहब्बत में था,नही नही बल्कि हूँ।उनकी मोहब्बत में,क्योंकि उनके दिल की नरमी ने मेरे दिल को छुआ था।उनके अल्फ़ाज़ ने मेरी रूह को रूह बनाया।मैं भी इंसान को बिना फ़र्क देखने लगा।मुझे लगा की चाहे रेत हो या जँगल,चाहे ज़मीन हो या समन्दर सब जगह मोहब्बत से बदलाव हो सकता है।
मैं कभी दोहों में अटका तो कभी दिल से फूटे अल्फाज़ो में गुँथा,कभी ख़िदमत में पैबस्त हो गया।मैं ज़िन्दगी के हर रँग को सिर्फ आपकी खुशबू से पहचान पाया।दावे से कहूँगा की अगर आपके मानने वालों ने आपकी ज़िन्दगी और फलसफे को छुआ होता तो आपके किरदार की ताक़त उन्हें हर जगह हर हिस्से में पहुँचा देता।
मैं सिंधु के पानी को छूना चाहता हूँ।मैं उस माटी को चूमना चाहता हूँ।मैं उन दोहों को ज़िन्दगी बना देना चाहता हूँ जो मेरे हाँ मेरे नानक के होंटो से निकले हैं।कोई गुरु यूँहीं नही हो जाता।कोई गुरु बड़ी बड़ी पी आर एजेंसी से नही बन जाता।गुरु तो दिल से होता है।जो सबको सुनता है।गले से लगाता है।समझाता है।पुचकारता है।मनाता है।तभी तो गुरु होता है।गुरु नानक होता है।
अभी कहता हूँ आज गुरु की पैदाइश में लंगर बाटो या न बाटो,बस गुरु की ज़िन्दगी को अपनी ज़िन्दगी में उतारो।गुरु के दिल के इतनी मोहब्बत को उतारो।उतनी तक़लीफ़ को बर्दाश्त करो।गुरु के लिखे,सिर्फ गुरु के लिखे हर लफ़्ज़ को पढ़ो।समझो और ज़िन्दगी में उतारो।मेरे नानक का दिल जिस दिन तुम्हारे दिल तक पहुँच गया,तुम्हारे चेहरे में चमक आ जाएगी।तुम्हारे लफ़्ज़ दिलों को झकझोरने लगेंगे।मेरे नानक को महसूस तो करो।यह भूमि नानक की वजह से ही महकी है।नानक के लफ़्ज़ और किरदार ही इस देश की ज़रूरत है।नानक हमेशा से ज़्यादा अब ज़रूरी हैं।हम सबमें थोड़े थोड़े नानक हो जाएं तो यह माटी महक उठे।मेरे नानक सुन लो।बस आ जाओ।गुरु ग्रन्थ साहिब से निकल कर, हमे सुधार दो।मेरे नानक।
जगत में देखो प्रीत,
अपने ही सुखसों सब लागे,क्या दारा क्या मीत।।
नानक भव जल पारपै जो जो गावैं प्रभु के गीत।।

Saturday, November 12, 2016

नेहरू

एक इंसान जिसकी ज़िन्दगी पर,उसके रहन सहन पर,उसके अंदाज़ पर हमेशा सवाल किये गए।उसकी बहुत सी खूबियों को दरकिनार करने की कोशिश रही मगर अवाम की अथाह मोहब्बत के आगे ऐसी कोशिश दम तोड़ती रहीं।उसने धीरे धीरे तो कभी तेज़ तेज़ देश को बुना।गुलामी की ज़ंज़ीर तोड़ते ही निर्माण में लगा।अगर उसकी रखी नीव की बात करेंगे तो डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया से बड़ी किताब लिख जाएगी।जिन्हें नही पता,या जो जानना भी नही चाहते या वोह जो अभी कुछ वक़्त पहले अकलमन्द हुए हैं या वो जो अभी अभी देशभक्त हुए हैं उनके लिए उसे बर्दाश्त करना मुश्किल है।
देश को डाकघरों की कतार,बैंको की इमारते,IIT, UGC, संविधान,आर्मी,नेवी,एयर सेनाओ का निर्माण,अस्पताल,इंडस्ट्री,यूनिवर्सिटी,स्कूल, अनाज,खेती,नहरे सबमें काम किया।सबको गढ़ा,सबको बुना,दुनिया के सामने सिद्धांत रखे।दुनिया ने देखा सैकड़ो साल से ज़ंज़ीर में कसा देश कैसे एक दम से खड़ा होता है।
वोह हर एक से मुस्कुराता हुआ,दोस्त दुश्मन को गले लगाता हुआ आगे बढ़ता रहा।17 साल अनवरत काम किया।यह देश की खूबसूरत अवाम थी जिसने अपने निर्माणकर्ता को पलको पर बैठाया।उसे लगातार जिताया।उसे ही अपने बनाने का आधार चुना।
14 नवम्बर को जन्मे जवाहरलाल नेहरू को समझना जितना आसान है उतना ही कठिन।अंग्रेज़ों ने,विपक्षियो ने लगातार नेहरू के चरित्र को निशाना बनाया मगर जनता ने उनको दरकिनार कर नेहरू को चुना।जब हम मुद्दों पर घेर नही पाते तो गिरेहबान में घुसते हैं।मैं नाम भूल रहा पाकिस्तानी लेखक जिसने लिखा था की भारत और पाकिस्तान में सबसे बड़ा फ़र्क़ है की भारत के पास नेहरू थे।
नेहरू के आलोचकों से कोई गिला नही,वोह करें,यह ज़रूरी भी है।मगर समर्थको से,उनकी परम्परा को लादने वालों से शिकवा है की उन्होंने न नेहरू को पढ़ा है और न वोह जानते हैं।वोह नेहरू की लिखी किताबों के नाम भी नही जानते,काम तो बहुत दूर की चीज़ है।
कल जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन है अगर उन्हें महसूस करना है तो उनका लिखा पढ़ना।उनका देखा ख्वाब देखना।उनके इतनी मेहनत करना।उनके इतने साल जूझने को याद रखना।पूरे परिवार का एक साथ जेल में रहने का उदाहरण नेहरू के सिवा कम ही दिखता है।एक बार संघर्ष,निर्माण को पढ़ना।तब देखना की नेहरू क्या थे।आलोचक आलोचना करें तब भी कमसेकम उन्हें पढ़ें तो।समर्थक लहालोट होए मगर समझे तो की नेहरू क्या थे।14 नवम्बर को निर्माण की या कहें आजकी खड़ी इमारत की नीव का जन्मदिन है।हो सके तो याद कर लीजियेगा।