Thursday, February 28, 2019

रूसो

जब उसने खूबसूरत दुनिया की तरफ पहला कदम बढ़ाया। तब ही उसकी माँ कभी ना खत्म होने वाला गम देकर अलविदा कह गई।किसी तरह पलने से उसने ज़मीन पर पाँव उतारे।बाप जो घड़ी बनाने में महारत रखता था उसने अपने बेटे का वक़्त बुरा बनाना शुरू किया।12 साल के मासूम बच्चे को रात में सराहने बिठाकर उसने उससे अश्लील साहित्य सुनाने का काम दिया।मासूम मन ऐसे ही घिनौने कीचड़ में फलता रहा।वो मासूम लड़का अब मासूम नही रहा।दुनिया की हर गलाज़त को उसने चखा।

फ़्रांस की गलियों को पैरों से रौंदा।इतना रौंदा की उसमे से विचारों के सोते फूटने लगे।उसने जब भी औरत के जिस्म को छुआ फ़ौरन समानता का वो विचार लिख डाला जो रूहानी था।उसने शराब को हाथ लगाते ही सामाजिकता पर वो लिखा जो अब तक न लिखा था।जुआ खेलते खेलते दुनिया के ढाँचे को लिख डाला।गाली, अक्खड़पन,रूखेपन,गुस्से,निराशा, बीमारियो,ठुकराये जाने के दर्द के साथ एक ऐसी समाज की कल्पना कर डाली जिसने मील के पत्थर का काम किया। उसने पूरे नशे में सरकार का नशा उतार दिया।

बचपन से जवानी तक फूटते असंतोष और विद्रोह में सरकार की यह कल्पना की कि सरकार को किसी व्यक्ति को इतना शक्तिशाली नही होने देना चाहिए की वह किसी नागरिक के जीवन को खरीद सके,और इतना कमज़ोर भी नही रहने देना चाहिए की किसी को अपने को बेचना पड़े।वो लिखता रहा।हर बुरे काम में लिखता रहा।इतना लिखा की उसकी हर कमी उसके लिखे के आगे हार गई।बुराई ने दम तोड़ दिया और उसके विचार ने उड़ना सीख लिया।

पेरिस,जेनेवा की दीवारो से निकल कर उसने दुनिया के कूचे कूचे को छू लिया।दुनिया आज भी उसके विचारों के आगे सर झुकाय खड़ी है।उसका नाम है रूसो।दार्शनिक,राजनैतिक,सामाजिक विचारक रूसो।मेरा दोस्त रूसो।हम जैसों का रूसो जो कहता है हालात चाहे जैसे हों,अतीत कितना ही भयंकर हो,वर्तमान कितना की संघर्ष युक्त हो,पढ़ो और लिखो । पढ़ो अपने लिए,लिखो आने वाली नस्लों के लिए क्योंकि यही रह जाएगा ।

Friday, February 22, 2019

मौलाना आज़ाद

जामा मस्जिद का दरवाज़ा।एक कंधे की टेक लगाए खड़ा एक शख्स।रुंधा गला।,एक तरफ झुकी गर्दन,भर्राती आवाज़...रुक जाओ मुसलमानो,तुम्हे जामा मस्जिद की मीनारे पुकार रही हैं..... एक मज़बूत आवाज़ जिसने टूटते रिश्तों,बिखरते भरोसे को रोक दिया।हर शख्स ठहर गया जो जहाँ था।।।।।।दौड़ कर अपने खड़े भाइयो को गले लगा लिया और कहा,हम जैसे भी रहे,खाना हो य न हो मगर अब तुमको नही छोड़ेंगे।इसी माटी में दफ़न होंगे।वादा।

जामा मस्जिद की दीवारें गवाह हैं की बंटते हुए लोगों को उसके सहन से ही जोड़ा गया था।उसके दरवाज़े पर खड़े शख्स ने वोट की नही बल्कि दिल जोड़ने की अपील की थी।उसकी मीनारों से उस बूढ़े शख्स की टूटती हुई आवाज़ भी इंसान को रोने को मजबूर कर रही थी।
वोह लाल दीवारें देख रहीं थी कोई कैसे इतने दिलों पर राज कर सकता है।जब हर तरफ अपनो से भरोसा टूट रहा था तब उसकी आवाज़,हाँ सिर्फ आवाज़ लोगों में ऐसा भरोसा दे गई की इंसान इस माटी का ही होकर रह गया।

यक़ीन न हो तो हमारे ख़मीर में शामिल उस शख्स को देख लो जो अपने आप में चलता फिरता इंस्टिट्यूट था।जिसकी ज़मीन पर जितनी पकड़ थी उतनी ही कलम पर।उतनी ही ज़बान पर।तभी तो वोह दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र का सबसे पहला शिक्षामंत्री बने।उनकी रखी बुनयाद पर ही आज हम झण्डे गाड़ रहे हैं।

वह अपने किरदार,बातो में एक सा वज़न रखने वाले मौलाना अबुल कलाम आज़ाद थे।आज उन्हें याद करलें।आज उनको रोज़ से ज़्यादा याद करने का दिन है।उनकी जामा मस्जिद की स्पीच को सुन लीजिये।आपके पाँव खुद बखुद नफ़रत से दूर मोहब्बत को जोड़ने बढ़ जाएँगे।

Thursday, February 21, 2019

कस्तूरबा

लम्बा लिखा है, फुर्सत हो तो पढ़िए,वरना फुर्सत निकालकर कभी पढ़ियेगा।22 फ़रवरी 1944 यानि आज ही के दिन हम सबकी बा यानि कस्तूरबा गाँधी का निधन हो गया था।हम उनपर बहुत लिख सकते हैं मगर आज दिल किया की वह ख़त पोस्ट करदें,जो सुभाष चन्द्र बोस ने कस्तूरबा के निधन पर लिखा था.....

"श्रीमती कस्तूरबा गांधी नहीं रहीं । 74 वर्ष की आयु में पूना में अंग्रेजों के कारागार में उनकी मृत्यु हुई । कस्तूरबा की मृत्यु पर देश के अड़तीस करोड़ अस्सी लाख और विदेशों में रहने वाले मेरे देशवासियों के गहरे शोक में मैं उनके साथ शामिल हूं । उनकी मृत्यु दुखद परिस्थितियों में हुई लेकिन एक गुलाम देश के वासी के लिए कोई भी मौत इतनी सम्मानजनक और इतनी गौरवशाली नहीं हो सकती । हिन्दुस्तान को एक निजी क्षति हुई है । डेढ़ साल पहले जब महात्मा गांधी पूना में बंदी बनाए गए तो उसके बाद से उनके साथ की वह दूसरी कैदी हैं , जिनकी मृत्यु उनकी आंखों के सामने हुई । पहले कैदी महादेव देसाई थे , जो उनके आजीवन सहकर्मी और निजी सचिव थे। यह दूसरी व्यक्तिगत क्षति है जो महात्मा गांधी ने अपने इस कारावास के दौरान झेला है ।

इस महान महिला को जो हिन्दुस्तानियों के लिए मां की तरह थी , मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और इस शोक की घड़ी में मैं गांधीजी के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करता हूं । मेरा यह सौभाग्य था कि मैं अनेक बार श्रीमती कस्तूरबा के संपर्क में आया और इन कुछ शब्दों से मैं उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगा । वे भारतीय स्त्रीत्व का आदर्श थीं , शक्तिशाली, धैर्यवान , शांत और आत्मनिर्भर। कस्तूरबा हिन्दुस्तान की उन लाखों बेटियों के लिए एक प्रेरणास्रोत थीं जिनके साथ वे रहती थीं और जिनसे वे अपनी मातृभूमि के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मिली थीं । दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के बाद से ही वे अपने महान पति के साथ परीक्षाओं और कष्टों में शामिल थी और यह सामिप्य तीस साल तक चला ।

अनेक बार जेल जाने के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ लेकिन अपने चौहत्तरवे वर्ष में भी उन्हें जेल जाने से जरा भी डर न लगा । महात्मा गांधी ने जब भी सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया,उस संघर्ष में कस्तूरबा पहली पंक्ति में उनके साथ खड़ी थीं हिन्दुस्तान की बेटियों के लिए एक चमकते हुए उदाहरण के रूप में और हिन्दुस्तान के बेटों के लिए एक चुनौती के रूप में कि वे भी हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में अपनी बहनों से पीछे नहीं रहें ।
कस्तूरबा एक शहीद की मौत मरी हैं । चार महीने से अधिक समय से वे हृदयरोग से पीड़ित थीं । लेकिन हिन्दुस्तानी राष्ट्र की इस अपील को कि मानवता के नाते कस्तूरबा को खराब स्वास्थ्य के आधार पर जेल से छोड़ दिया जाए , हृदयहीन अंग्रेज सरकार ने अनसुना कर दिया । शायद अंग्रेज यह उम्मीद लगाए बैठे थे कि महात्मा गांधी को मानसिक पीड़ा पहुंचा कर वे उनके शरीर और आत्मा को तोड़ सकते थे और उन्हें आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर सकते थे ।

इन पशुओं के लिए मैं केवल अपनी घृणा व्यक्त कर सकता हूं जो दावा तो आजादी , न्याय और नैतिकता का करते हैं लेकिन असल में ऐसी निर्मम हत्या के दोषी हैं । वे हिन्दुस्तानियों को समझ नहीं पाए हैं । महात्मा गांधी या हिन्दुस्तानी राष्ट्र को अंग्रेज चाहे कितनी भी मानसिक पीड़ा या शारीरिक कष्ट दें , या देने की क्षमता रखें, वे कभी भी गांधीजी को अपने अडिग निर्णय से एक इंच भी पीछे नहीं हटा पाएंगे । महात्मा गांधी ने अंग्रेजों हिन्दुस्तान छोड़ने को कहा और एक आधुनिक युद्ध की विभीषिकाओं से इस देश को बचाने के लिए कहा ।

अंग्रेजों ने इसका ढिठाई और बदतमीजी से जवाब दिया और गांधीजी को एक सामान्य अपराधी की तरह जेल में ठूस दिया । वे और उनकी महान पत्नी जेल में मर जाने को तैयार थे लेकिन एक परतंत्र देश में जेल से बाहर आने को तैयार नहीं थे । अंग्रेजों ने यह तय कर लिया था कि कस्तूरबा जेल में अपने पति की आंखों के सामने हृदयरोग से दम तोड़ें । उनकी यह अपराधियों जैसी इच्छा पूरी हुई है , यह मौत हत्या से कम नहीं है । लेकिन देश और विदेशों में रहने वाले हम हिन्दुस्तानियों के लिए श्रीमती कस्तूरबा की दुखद मृत्यु एक भयानक चेतावनी है कि अंग्रेज एक-एक करके हमारे नेताओं को मारने का ह्रुदयहीन निश्चय कर चुके हैं। जब तक अंग्रेज हिन्दुस्तान में हैं , हमारे देश के प्रति उनके अत्याचार होते रहेंगे।

केवल एक ही तरीका है जिससे हिन्दुस्तान के बेटे और बेटियां श्रीमती कस्तूरबा गांधी की मौत का बदला ले सकते हैं, और वह यह है कि अंग्रेजी साम्राज्य को हिन्दुस्तान से पूरी तरह नष्ट कर दें। पूर्वी एशिया में रहने वाले हिन्दुस्तानियों के कंधों पर यह एक विशेष उत्तरदायित्व है , जिन्होंने हिन्दुस्तान के अंग्रेज शासकों के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़ दिया है। यहां रहने वाले सभी बहनों का भी उस उत्तरदायित्व में भाग है । दुख की इस घड़ी में हम एक बार फिर उस पवित्र शपथ को दोहराते हैं कि हम अपना सशस्त्र संघर्ष तब तक जारी रखेंगे , जब तक अंतिम अंग्रेज को भारत से भगा नहीं दिया जाता ।"
(नेताजी संपूर्ण वांग्मय,पृ.177,178 ,टेस्टामेंट ऑफ सुभाष बोस, पृ. 69-70 )

Monday, February 11, 2019

इश्क़ ए सोनिया

इसे पढ़ सकना तो मेरे दिल को छू पाना,वरना अल्फ़ाज़ तो रोज़ बिखरेंगे मगर उनमे शायद हम न होंगे।आज जो लिख रहा हूँ वोह प्रेम ही है।मगर इस प्रेम को तुम महसूस नही कर पाओगे।मुझे पता है तुम्हारी सीमाएँ हैं।तुम राजनीती की जंज़ीरों से बंधे हुए हो,तुम्हारे दिमागों में उसके लिए पहले से ऐसे ख़ाके भरे हुए हैं की तुम उसके प्रेम की खुशबू को महसूस ही नही कर सकते।

मेरे लिए प्रेम वही है, जो उसने किया।एक इंसान से इश्क़ में अपना सबकुछ छोड़ दिया।यहाँ तक उस चौखट को भी छोड़ दिया जिसमे कभी उसने बचपन गुज़ारा था।अगर उसकी चौखट छोड़ना सियासत है दो दूसरों का अपना परिवार छोड़ना भी एक नाटक ही है।उस माटी के विरह को तुम महसूस ही नही कर पाओगे जो उसने सिर्फ अपनी मोहब्बत के लिए किया।

मोहब्बत को देखना होगा तो उसकी आँखों में झाँक कर देखना।हम सब तो ज़िंदा से मोहब्बत करते हैं।उसे चाहते हैं जो जिसे हम छू सकें।जिसके साथ हम क़दम से क़दम मिलाकर चल सकें।मगर उसने तो उसे चाहा जिसे बीच सफ़र से छीन लिया गया।उससे पूछे जिस एक ऊँगली को पकड़ वोह एक भरोसे से आई थी,उस ऊँगली के छूट जाने पर उसकी बेचैनी को देखो।अपनी माटी से ज़्यादा अपने आशिक़ की माटी में बिखर जाने की तड़प देखनी होगी तो तुम सोनिया को देखना।

सोनिया गाँधी और राजीव गाँधी के इश्क़ की दास्ताँ किसी भी तरह मिसाली इश्क़ से कम नही।जिसने राजीव के साथ की सोनिया की आँखों की चमक को महसूस किया होगा।सिर्फ वोह ही उनके न रहने पर सोनिया की आँख का खालीपन पढ़ सकता है।सोनिया के हाथ में राजीव के पाँव की धूल को अगर देख पाना तो इश्क़ को समझना।सोनिया को बेचैनी से राजीव की शाल को ओढ़ते हुए देखना तो इश्क़ समझना।देखना की बच्चों के लिए मुस्कुराती वोह राजीव के दर्द को कैसे सीने में दबा ले गई।परिवार की मोहब्बत को एक परिवार वाला ही समझ पाएगा।उस एहसास को समझना जब बिना राजीव के पहली बार वोह सबके सामने आई।उस हल्के छुपने और रोने को महसूस करना सियासी दिमागों के बस की बात नही।मैं कहता हूँ की जिसमे इश्क़ है, उसमे सबकुछ है।जिसमे इश्क़ नही,वोह किसी काम का नही।जब इश्क़ में होना तो कोई परवाह मत करना बस चाहना,हद दर्जे चाहना और अपनी चाहत के ख्वाबो को बुनने में अपनी ज़िन्दगी को खत्म कर देना।सियासत से बजबजाते दिमाग कभी इस मोहब्बत को महसूस नही कर सकते।मुझे पता है वोह कभी इतना ऊपर उठ ही नही पाएँगे की सोनिया और राजीव की मोहब्बत की भीनी भीनी खुशबू को सूँघ सके।

मगर तुम जब मोहब्बत करना,जब तुमसे तुम्हारी मोहब्बत बीच सफ़र में छुट जाए,या तुम्हे तुम्हारी मोहब्बत ज़िन्दगी भर न मिले तो तुम अपनी मोहब्बत को ही अपनी ज़िन्दगी बना लेना।उसकी आँखों को अपनी आँखे,उसकी आवाज़ को अपनी आवाज़,उसकी जिम्मेदारी को अपनी ज़िम्मेदारी,उसको ही पूरा पूरा अपना लेना।मोहब्बत में शक और शिकवे नही होते हैं।यही तो है इश्क़ में सोनिया होना।।।

Friday, February 8, 2019

प्रेम मीरा फरवरी

राजपूतों का आलीशान दरबार तमाम दरबारियो से सजा और बीच में राजा।राजा के तख़्त के सामने घुंघरुओं में जकड़ी उसकी बहु।पूरे दरबार के सामने आज उसकी बहु की मोहब्बत का इज़हार था।।मोहब्बत में चूर जैसे ही उसने पांव थिरकाय राजसिंघासन काँप गया।तख्त हिलने लगे।दरबारियों ने सर झुका लिए।
वो नाची जी भर नाची सारा राजपाट देखता रह गया।सारे बंधन सारी परम्पराये,लोकलाज,सब हर थिरकन के साथ टूट गई।घुंघरुओं की आवाज़ ने उबल रहे गुस्से पर इश्क़ की गुलाबी छींटे डाल दीं।हज़ारों साल से चली आ रही परम्पराएं उसके पाँव की थिरकन और मदमस्त होकर नाचने में कबकी बिखर गईं।वो मोहब्बत में थी और मोहब्बत कानून से नहीं चलती।उसमे शर्म,हया,लोग क्या सोचेंगे,नहीं चलता।बस ख़ालिस मोहब्बत।उसके नाचने ने हज़ारो साल की बेड़िया तोड़ दी।मोहब्बत को कैद करने की परम्पराएं चिटख गईं।

पूरे राज्य ने आज उसकी मोहब्बत की पुकार को सुना और उसके सामने सर झुका दिया।आज हम और आप मामूली से हैसियत में बगावत नहीं कर पाते और उसने उस दौर में पूरी शान ओ शौकत और राजपाट को ठुकराकर अपनी मोहब्बत का इज़हार किया था।आज मामूली सी हैसियत के बाद भी आप दिल की बात नही कह पाते, हिम्मत से दुनिया के सामने कुछ भी नही कह पाते मगर उसने उस दौर में अपने इश्क़ में अपने ही राज दरबार में नाचकर मोहब्बत का परचम फैलाया था।वोह हिम्मत से लबरेज़ हमारी मीरा थी।उसकी पाक मोहब्बत का जिसमे न कोई लालच थी न कोई फायदा।मीरा का प्यार अपने गिरधर गोपाल के लिए।

मीरा ने उस दौर में हर बेड़िया तोड़ी थीं गिरधर के लिए।मीरा में मोहब्बत थी।मीरा मोहब्बत में थी या कहे मीरा ही मोहब्बत थी या मोहब्बत ही मीरा थी।कृष्ण,मीरा,मोहब्बत सब मिल चुके थे।कुछ भी जुदा ना था।इश्क़ के चबूतरे पर मीरा की छाँव में अगर बढ़ सको तो बढ़ो।जिसे चाहो तो टूटकर चाहो जिसमे हासिल की शर्त न हो।जिसमे नफा नुकसान न हो।जिसमे सवाल जवाब न हो। जिसमे मैं और तुम का फर्क न हो,जहां तुम ही मैं हूँ औऱ मैं ही तुम । बस चाहने,टूटकर चाहने की तड़प हो।इसी को तो कहते हैं इश्क में मीरा होना...

Tuesday, February 5, 2019

सरहदी गाँधी

कद उस दौर के सारे नेताओं से लंबा।वज़न ऐसा की चलने से ज़मीन धमके।ज़ात वो जो लड़ाका,वहशी।यानि कुल मिलकर जब चाहे जहाँ चाहे जैसे चाहे ज़ुल्म करने की सारी सलाहियत। मगर नहीं उन्होंने अपनाया अहिंसा का रास्ता। इंसानियत,मोहब्बत और ख़ुलूस का रास्ता।अपने महात्मा का रास्ता। अपने पैग़म्बर की मोहब्बत और सादगी का रास्ता । जिन की ज़िन्दगी से खुद गांधी मुतास्सिर हुए । जिनकी खिदमत में गांधी खड़े रहे वो थे खान अब्दुल गफ्फार बादशाह खान। मुल्क बंटने के खिलाफ सबसे तेज़ और कड़ी आवाज़,बादशाह खान ।

जो अपने महात्मा के कहने पर पाकिस्तान चले गए,जहाँ सलाखों और जंज़ीरों से उन्होंने हिंदुस्तान से मोहब्बत का ईनाम पाया।उनमे इतनी ज़हनी और जिस्मानी ताकत थी की वो सलाखें तोड़ देते मगर नहीं आखिर वो महात्मा का हमनाम हो चुके थे, सरहदी गांधी। बेड़ियों ने उनकी खाल को उधेड़ दिया,गोश्त सफ़ेद और लाल रँग के साथ बाहर आगया मगर उफ़ नाकि।बस इतना कहा की मै यहाँ खिदमत के लिए आया हु।इंसानियत की खिदमत।ताउम्र खिदमत की,शराफत,पाकिगज़ी की वो मिसाल रखी जो सरहद के दोनों ओर नही मिलती।दिलों में उतर गए एक एहसास की तरह,दिमागों को बदल दिया एक मोजज़े की तरह।दूर जाने पर भी हिंदुस्तान की रूह में हमेशा के लिए उतर गए।

खान साहब इस दौर की बड़ी ज़रूरत हैं जो अपने कामों से आपके दिल में उतर जाए और इंसानियत व रूहानियत की ऐसी रौशनी जलाए की सारी नफरत ख़ामोशी से निकल जाए।।।आज का दिन उनका है,उनका जन्मदिन हम सबके लिए शपथ का दिन है, ऐसी शपथ जिसमे इंसानियत कायम रखने के लिए आखरी सांस तक जूझने का जज़्बा हो । मज़हब,सोच,संगठन या कोई भी फर्क जो दो इंसानो के बीच दूरी लाता हो उससे हम दूर रहें । खान साहब की तरह अपने आख़री वक़्त तक इंसानियत,मोहब्बत और भाईचारे के लिए जूझ जाएं,यही खुदाई खिदमतगार की निशानी है