Friday, November 18, 2011

zawaal

देखा वो शाही महल ,
आँखों ने जी भर-भर के.
दिल बुझता रहा उन हालातो पे,
जब सूना हुआ महल रो-रो के.
नगमो-निगार के थे सब मालदार,
बर्बाद हुए हकीर हो-हो के.
थी हाथो में उनके जिन्दगिया,
खुद रुखसत हुए जो घिसत-घिसत के.
बड़े बनते फिरते थे रौबदार,
गुरूर ने दिखाया तमाशा हस-हस के.
सोचा भी नहीं था ख्वाबो-ख्याल में,
इस तरह रेगा होंगे बिखर-बिखर के.
बड़ी इज्ज़त थी ज़माने में उनकी,
कुदरत ने उतरा जामा धो-धो के.
कह रहा था दर पे खड़ा दरबान,
जनाब से अच्छी किस्मत मेरी हस-हस के.
साडी ज़िन्दगी तफरीह-ठहाको में काँटी,
ढलान पे रो रहे है फफक-फफक के.
जिदगियाँ समेत दी ऊँचे महल बनाने में,
बुझती आँखों के सामने जो ढहे भरभरा के.
अपनी खुदाई में इक इंसा भी बनाया होता,
कोठरी में रो न रहे होते अकेले हो-हो के.
जिन अजीजो की दी थी जहाँ की नेमते,
हालाते गम  में बिछुड़ गई वो भी इक-इक हो के.
शोहरतो-इज्ज़त में बिता के साडी ज़िन्दगी,
ज़वाल में खड़ा है आंखे मूँद-मूँद के.
आज उसके खंडहर से महल पे बैठा,
लिख रहा हु हाले दास्ताँ  सोच-सोच के.

Thursday, August 18, 2011

kaise log

आज भारत में एक जूनून सा दिख रहा है.लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे है.सवाल हैएक  की एक  अरब लोग अगर इसके खिलाफ है तो कैसे भ्रष्टाचार फलफूल रहा है.अगर हम इतने ही इमानदार है तो जन्लोक्पल की ज़रूरत ही क्या है
अन्ना के इर्दगिर्द नाचने वालो में सब इमानदार है इसपर शक है.भारत का हर तबका आज एक हो गया है तो क्यों न दिल से भ्रष्टाचार ख़त्म किया जाए.कब तक कानून के सहारे हके जाएँगे.सड़क पर चिल्लाने से अच्छा है की खुद 
सुधरा जाए.गाँधी को मानने वालो में काफी लोग खुद इमानदार थे.अन्ना की इस भीड़ में इसकी ख़ास कमी है
मेरी समझ में एक अरब आबादी को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए किसी खास कानून से ज्यादा इमानदार नियत की
ज़रूरत है

Sunday, June 19, 2011

hamsafar

पता नहीं क्यों आज एक चिड़िया को देख कर सारा बचपन आँखों के सामने आ गया.वो भी एक साधारण सी गौरैया को देखकर.सच में ये बेशर्म आँखों में आंसुओं ने फिर से जगह बना ली .याद आ गई वो बचपन की शरारत जब डलिया में दाने डाल कर इन बेचारी गौरैया को पकड़ने की असफल कोशिश किया करता था.सारा घर जब दोपहर में आराम करता तो मई इन्हें पकड़ने के लिए उस उम्र के सारे जतन कर रहा होता.....आज वो बचपन फिर तैर गे ..सोचा ज़माने ने हमें कहन से कहन लाकर खड़ा कर दिया की ..अब इन चिड़ियों को देखना भी नसीब नहीं होता......जिस तरह नानी दादी ज़िन्दगी से जाती रही....ये खूबसूरत चिड़िया भी कहीं दूर उड़ गई......अब तो इन्हें देखकर पकड़ने का भी मन नहीं करता बस यही जी चाहता है इन्हें एक उम्र तक सिर्फ निहारता रहूँ...........................सच यही तो मेरा बचपन है कौन इन्हें भूलना चाहेगा.......ये चिड़िया नहीं ये तो बचपन के फ़साने की पारिया. है जो हमेशा याद रहेंगी........सबके भाच्पन की तरह ये भी हमारे बचपन के अकेलेपन की एक शरारती साथी थी.............अगर सुन सकती हो गौरैया तो आज मई तुमसे अपने प्यार का ऐलान करता हु..........  

Thursday, June 16, 2011

kavi..........

हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.
कैसे बोलूँगा तुम्हारे खिलाफ
ये काम भी आँखों को करना होगा
कल तक तुम मेरी थी
न जाने कैसे हो गई पराई
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
कल तक मेरे हाथो में था जादू
आज ये इतने गरीब क्यों.
क्यों तुम्हे मेरी अदाएं
लगने लगी काँटों सरीखी
इसलिए फिर मै बोलता हु
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा



अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.

adab

आखिर मीडिया के लोग इतने अख्खर क्यों होते है................क्यों उन्हें इतना घमंड होता है........आसुतोष हो या रजत ....माना  की आप एक बार नाम है लेकिन.............क्यों.......मई भी मीडिया में एक नाम तलाश रहा हु ...........लेकिन अपने चैनल से दुसरे चैनल तक सब एक जैसी जमात बिची हुई है..........
भाई भतीजावाद पर सबसे ज्यादा ऊँगली हम ही युथाते है......लेकिन क्या मीडिया से ज्यादा कहीं और है ऐसा................बहुत अफ़सोस होता है देख कर ये सब..............लेकिन मन में तगर विश्वास है की ये सब सुधर जाएगा......................थोरी सी या बहुत सख्त मेहनत की ज़रुरय्त है................
हम काम दिखने वाला तो अच्छा करते ही है लेकिन हमारे आफिस में क्या चलता रहता है जग ज़ाहिर है...................शराब और शबाब आम है...................

Wednesday, June 15, 2011

adab

तहजीब की दुनिया को हमारे आगाज़ का आदाब  .
अब आप हमसे और हम आप से रूबरू होंगे.