Sunday, June 30, 2019

बिधान बाबू

मामूली उम्र में माँ ने साथ छोड़ दिया,वह माँ जो उन्हें हर मुश्किल से बचाए बस आगे बढ़ने के ख्वाब दिखा रही थी।छोटे भाई बहनो की ज़िम्मेदारी और माँ के ख्वाब आपस में टकराकर उसे कमज़ोर करते मगर वह इनसे जूझता रहा।पैसों की तंगी से जूझती पढ़ाई और देश पर छाया गुलामी का अँधियारा उन्हें चैन से नही बैठने दे रहा था,फिर भी वह पढ़ते गए।एक वक़्त के बाद लगा की पहले खुद को इतना क़ाबिल करलें की देश उनसे फायदा उठा सके।हुआ भी यही,देश विदेश में अपने दम पर पढ़कर वह आवाम की ख़िदमत में लग गए।

देशबन्धु चितरंजनदास भी उनके कँधे से कँधे लगकर देश की आज़ादी की लड़ाई समझते रहे।सुभाष चन्द्र बोस ने भी उनसे मिलकर एक किरण उन्हें थमाई।आखिर वह महात्मा गाँधी तक जा पहुँचे और जवाहरलाल नेहरू का हाथ पकड़ कर आज़ादी की अलख जगाते हुए बंगाल में खड़े हो गए।एक ऐसा इंसान जिसके खड़े होने से बंगाल खड़ा होता था,आज ही के दिन उसके लेटने से बंगाल लेट गया था।उसके जाने पर सिसक सिसक कर बंगाल रोया था।वह ऐसी शख्सियत थे जो बंटवारे में दिलों को जोड़ते रहे।उनका दिल पूरे भारत के दिल को जोड़ रहा था।जो इंसान और इंसान के बीच मोहब्बत और इंसानियत के बीज ही बोता रहा।

जब मुल्क़ आज़ाद हुआ तो उन्हें मंत्रालय में जगह दी जाने लगी।बड़ी विनम्रता से उन्होंने मना कर दिया और कहा मुझे मेरे देश की जनता की सेवा हमारे अपने क्षेत्र से करने दें।वह पढ़ाने में लग गए।जो उनका ख्वाब था की यह देश अपने पाँव पर खड़ा होकर सीना तानकर चले।ख़ामोशी से बंगाल में इतना बड़ा स्वतन्त्रता सेनानी पढ़ाने चला गया मगर गाँधी तो ज़िंदा थे।
उन्हें एक एक इंसान के क़द और अहमियत का बड़ा अंदाज़ा था।बंगाल की उथल पुथल से पहले ही नेहरू को भेजकर उन्हें बंगाल का मुख्यमंत्री बनवाने पर राज़ी कर लिया।इस तरह बिधान चन्द्र राय का वजूद इतिहास में दर्ज हुआ।

वह ऐसी शख्सियत जिसका दिल बेहद विशाल,मिजाज़ नरम और ख़िदमत का अटूट जज़्बा।ताज्जुब है प्रकृति ने उन्हें आज ही के दिन पैदा किया और आज ही के दिन अपने पास बुला लिया।एक ऐसा इंसान जिसका होना इस मुल्क़ के लिए ज़रूरी था।बिधान चन्द्र राय को पढ़ा जाना चाहिए।काँग्रेस के इस महान नेता ने बंगाल को बहुत गहरी नीव दी साथ ही देश को शिक्षा और स्वास्थ्य में अमिट पहचान।वह व्यक्ति जो आज़ादी की लड़ाई भी लड़ता और रात तक लोगों के दर्द भी दूर करता।मैं बार बार कहता हूँ यह देश बिधान चन्द्र राय जैसे मोहब्बत से भरे हुए इंसानों के ख़ून पसीने की नीव पर खड़ा हुआ है।हो सके तो भारत रत्न बिधान बाबू को उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि,जो आज ही हैं थोड़ा सा याद करलें।इस देश की बुनियाद और फ़ख्र दोनों ही हैं बिधान चन्द्र राय और उनके जैसे समाज सेवी,राजनीतिज्ञ,स्वतन्त्रता सेनानी।।अपने काम से मुल्क़ की धड़कन सुधारने वाले बिधान बाबू की याद में ही आज भारत में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है।

बंगाल, जिसे आज बिधान बाबू की ज़रूरत है । जो टूटते दिलों को जोड़ने खड़ा हो । गाँधी की छाँव से निकला यह बीज और इनका किरदार ही ,टूटते दो दिलों को जोड़ सकता है...नफरत को मिटाकर प्रेम का झंडा बिधान बाबू जैसा चरित्र ही।लगा पाएगा ।आजकी ज़रूरत हैं बिधान बाबू ।

Saturday, June 29, 2019

नेहरू पर बबेले

सब काम 4 मिनट रोककर, ठहर कर इसे पढ़ लो,ज़रूरी है, बेहद ज़रूरी....पीयूष बबेले ने लिखा है

नेहरू और यूनानी देवता प्रोमीथियस

जब जब नेहरू का जिक्र आता है तो मुझे यूनान के एक पुराने देवता प्रोमीथियस, जिसे हिंदी में प्रमथ्यु भी कहते हैं, की कथा याद आती है. प्रोमीथियस स्वर्ग से धरती को देखता था. नीचे देखता तो इंसान बड़ी बदहाली में दिखाई देता. कभी उसके बच्चों को जंगली जानवर खा जाते, तो कभी वे जाड़े से मर जाते. देवताओं की तरह दो पांवों पर चलने वाला यह प्राणि सारे चौपायों से गया गुजरा नजर आता.

तब प्रोमीथियस को एक युक्ति सूझी. उसने देखा कि स्वर्ग में आग है. इस आग ने देवताओं को बहुत से सुख, शक्ति और सुरक्षा दी है. अगर यह आग किसी तरह धरती पर इंसान के पास पहुंचा दी जाए, तो इंसान अपनी बहुत सी पीड़ाओं से मुक्त हो जाएगा.

आग पर स्वर्ग और देवताओं का कॉपीराइट था. प्रोमीथियस क्या करता. उसने स्वर्ग से आग चुरा ली. चुपके से आग धरती पर इंसानों को दे आया. आग मिलते ही इंसान की रातें रोशन हो गईं, उसका भोजन पकने लगा, जंगली जानवर उससे डरने लगे. धरती पर सुख की ऊष्मा पसरने लगी. सुख आया तो देवताओं की चाकरी बंद होने लगी. मनुष्य अब उन्हें कम अर्घ्य चढ़ाने लगा.

देवताओं ने जांच की तो पता चला कि कांड हो चुका है. देवताओं की बपौती आग, धरती पर पहुंच चुकी है. आदमी आत्मनिर्भर हो रहा है. यह पता लगते भी देर न लगी कि आग प्रमथ्यु ने धरती तक पहुंचाई है. प्रमथ्यु को बंदी बनाकर देवताओं के राजा के सामने पेश किया गया. हर कोई उसे कड़ी सजा देता चाहता था. ज्यादातर तो मृत्युदंड ही चाहते थे. लेकिन मृत्युदंड संभव नहीं था, देवता अमर होते हैं, वे भला कैसे मरें.

तब यूनान के इंद्र ने एक ज्यादा ख़तरनाक सज़ा सोची. प्रमथ्यु को स्वर्ग से निकालकर जमीन पर लाया गया. वहां इंसान की बस्ती के पास कम ऊंची पहाड़ी पर उसे सलीब पर टांग दिया गया. ठीक वैसे ही जिस तरह ईसा मसीह की सलीब पर टंगी तस्वीर हम देखते हैं. उसके शरीर में ठुकी कीलों से रक्त की धारा बह निकली. प्रोमीथियस असहनीय वेदना में टंगा हुआ था. फिर उसके कंधे पर एक गिद्ध बैठाया गया. यह गिद्ध दिनभर जीवित प्रमथ्यु का मांस नोचकर खाता. रात में जब गिद्ध सोता तो प्रमथ्यु का मांस फिर से भर जाता क्योंकि वह अमर देवता था. सुबह से गिद्ध फिर वही क्रम शुरू कर देता.

प्रमथ्यु की चीखें इंसानों की बस्ती तक पहुंचती रहतीं. सुबह की पहली किरण के साथ बस्ती वाले उस पहाड़ के नीचे पहुंच जाते. वे दिनभर प्रमथ्यु की चीखों को तमाशे की तरह देखते और शाम को फिर अपने घर आ जाते.

जिन मनुष्यों के लिए सलीब पर टंगा प्रमथ्यु अपना मांस नुचवा रहा था और असहनीय पीड़ा झेल रहा था, वे उसकी लाई आग से आगे बढ़ रहे थे और उसकी बेबसी का उत्सव मना रहे थे.

कथा यहीं समाप्त होती है. लेकिन कथा में बताई बात कभी खत्म नहीं होती. वह हर महापुरुष पर लागू होती है, जिसे गोली से नहीं मारा जा सका. लिंकन और गांधी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें गोली से मार दिया गया. नेहरू अभागे थे, जो देश की मरते दम तक सेवा करते रहे. जब तक वे सेवा कर रहे थे, जब तक वे स्वर्ग की आग भारत तक ला रहे थे, वे बहुत लाड़ले थे. उनके जाने के बाद हमने उनके पूरे किरदार को सलीब पर टांग दिया और गिद्ध की तरह उसे नोच रहे हैं.

पहाड़ी के नीचे खड़े होकर उनकी पीड़ा का तमाशा देखने का सिलसिला अब इतना लंबा हो गया है कि तमाशाइयों की नई पीढ़ी यह भूल ही गई है कि इस शख्स को किस बात की सजा दी जा रही है. आज नेहरू की पुण्यतिथि पर उन्हें फिर याद दिलाता हूं कि नेहरू का जुर्म यही था कि जब अंग्रेजी राज में वह सारे सुख भोग सकता था, तब वह बागी हो गया. जब नौजवान ही था तब उसने जलिंया वाला बाग हत्याकांड की रिपोर्ट विस्तार से तैयार की. वह उन चंद लोगों में था जो लोकमान्य तिलक की अंतिम यात्रा में गांधी के साथ चल रहा था. वह उन लोगों में था जिसके प्रभाव में आकर उसके पिता ने अपना घर-मकान सब कांग्रेस को दे दिया था. वह उन लोगों में था जो पहली बार अपने पिता के साथ जेल गया था. वह उन लोगों में था जो सरदार भगत सिंह से मिलने जेल गया था. और भगत सिंह की रिहाई के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा था. कांग्रेस के अंदर वह सुभाष चंद्र बोस का सच्चा दोस्त था. अपनी पत्नी कमला की मौत के बाद उनकी चिता की एक चुटकी राख वह जीवन भर अपने साथ रखता रहा. महात्मा गांधी के अंतिम उपवास में चुपचाप खुद भी उपवास करने वाला वह विरला प्रधानमंत्री था. जब वह संसद में ट्रिस्ट विद डेस्टिनी का भाषण दे रहा था, तब उसके दिमाग में लाहौर के वे हिंदू मुहल्ले चल रहे थे, जहां का पानी काट दिया गया था.

वह इतना बुरा था कि जब दुनिया बमों के ढेर पर बैठी थी, तब भी शांति की बात करता था. उसकी शांति का ऐसा जलवा था कि कोरिया के गृहयुद्ध को अंतत: उसी ने एक समझौते पर पहुंचाया था. वह पूरी दुनिया में सम्मानित था और रहेगा. लेकिन उसके घर में उचक्कों का गिरोह, उसकी वेदना से तब भी मनोरंजन करता था और आगे भी करता रहेगा.

#पियूषबबेले #लोकसत्ता

Friday, June 28, 2019

जो चाहिए,वह करो

हमने जो बो रहें हैं, हम नही तो हमारे बच्चे वह फ़सल काटेंगे । दुनिया मे कोई भी चमत्कार बबूल के बीज से आम नही निकाल सकता ।
तुम खून से सनी हुई ज़मीन अपने बच्चों को देना चाहो, तो जमकर नफरत फैलाओ और हर एक से नफरत करो । अपने बच्चों को प्रेम से भरपूर ज़मीन देना चाहो, तो खूब प्रेम और भाई चारा फैलाओ । इसके सिवा कोई रास्ता नही है ।

कल की दुनिया,देश और घर,आज हमारे हाथों से ही बन रहा है । ईश्वर ने इसका निर्माण आज हम सौंपा है । नफरत में बहक कर कल का पानी ज़हरीला करदो या प्रेम बाँटकर आने वाली नस्ल के पानी केवल पानी करदो । जैसी भी दुनिया कल देखनी है, आज उसे करके देखो,कल वह उससे कई गुना बड़ी और फैलकर सामने होगी ।
मैं केवल तुम्हारी बात कर रहा हूँ,समाज को मत देखो,वह एक दिन तुम्हारे जैसा बनकर तुममे समा जाएगा....

Thursday, June 27, 2019

कब्र का बीज

मुझे कब्र में दफ़नाना, दफ़नाना नही है, बल्कि रोपना है । मैं मिट्टी में दबे बीज की तरह किसी दिन कब्र से फूट पडूंगा । मेरी कब्र से निकला अंकुर,एक बड़ा वृक्ष बन जाएगा । उस वृक्ष मे मेरे जैसे और बीज बन जाएँगे जो पूरी धरती पर बिखर जाएँगे ।
तुम्हे पता है कि एक लेखक मरता नही बल्कि बिखर जाता है । उसके शब्द तमाम बीज बालियाँ होती हैं । जो अगले लेखक के आने तक मुस्तैदी से ज़माने के साथ खड़ी रहती हैं ।

मैं कब्र में दफ़न नही बल्कि रोपा जाऊँगा । मैं बीज हूँ, प्रेम का बीज,जिसपर मिट्टी,पर्यावरण,जलवायु और तुम्हारे रोज़ बदलते आचरण का प्रभाव नही पड़ता । मैं प्रेम बीज हूँ, जिसमें अंकुर फूटना ही एकमात्र सत्य है । ऐसा बीज हूँ, जिसे यह ज़माना नफ़रत की उमस से फूटने की हद तक ले जाने को बेक़रार है ...अब बीज को रोप दो उससे पहले की और देर हो जाए...

Tuesday, June 25, 2019

देश मेरा,राम मेरे

हाँ दर्द में हूँ ज़रूर मगर होश में भी बराबर से हूँ । अपनी गहरी नज़रों से देख रहा हूँ कि वह कौन हैं जिन्हें लिंचिंग में लाभ नज़र आ रहा है ।
मेरे दिल मे मेरे राम रहेंगे,मेरे मोहम्मद उसमे बराबर से बैठे हुए ही मेरे दिल की धड़कन रहेंगे । तुमको क्या लगता है, जय श्रीराम नाम लेकर खून बहाओगे और हम अपने राम से दूर हो जाएँगे, हरगिज़ नही ।
मैं उनपर भी नज़र टिकाए हुए हूँ, जिन्हें इस सड़ाँध में अवसर दिखाई दे रहा है । यह भी बात तय है कि चाहे देश की संसद में जितने ही विवेकहीन पहुँच जाएँ, चाहे देश का बहुत बड़ा हिस्सा मुझसे नफरत करके मेरे खून का प्यासा हो जाए,तब भी मैं अपने भारत को चोट नही पहुँचने दूंगा ।
दर्द और बेदिली जितनी भी कोई बढ़ा ले,मेरे दिल से मेरा मुल्क,मेरे राम,मेरे कान्हा,मेरे लोग,मेरा मज़हब कोई के भी खिलाफ मैं नफरत नही पैदा कर पाऊँगा ।

लिंचिंग के वीडियो देखता हूँ । यह भी देखता हूँ कि मेरे कितने ही दोस्त,जो हिन्दू हैं, सवर्ण हिन्दू हैं, यह इसलिए कह रहा हूँ कि जान लो,सवर्ण हों या पिछड़े,दलित हों या अल्पसंख्यक,सबके दिल एक ही होता है । इन दोस्तों को रोते देखा है, अपने सामने परेशान होते देखा है । लिंचिंग पर इनकी शर्मिंदा आँखे देखी हैं । मैं इनके लिए,सिर्फ इनके लिए,कभी भी यह नही कहूँगा की सब कुछ बिखर कर बर्बाद हो चुका है

लिंचिंग मेरे लिए अवसर नही है, मेरे लिए दर्द है । मैं बैठकर, खामोश यह सोचना चाहता हूँ कि इंसान को आखिर वह कौन सी सोच है, जो पल में वहशी जानवर बना देती है । मैं सोचना चाहता हूँ एक माँ के स्पर्श से निकला बच्चा,दूसरी माँ की गोद उजाड़ने को बेताब क्यों हो जाता है । मैं खामोश यह जानना चाहता हूँ कि सात जन्मों तक विवाह के बंधन को सिंदूर में  सुरक्षित रखने को आतुर लड़का,दूसरे की पत्नी को उसके पति के सात टुकड़े भेजकर ठहाके कैसे लगा लेता है, वह कौन सी चीज है, जो इन्हें दूसरे से अलग और विशिष्ट बनाती है, जिससे हत्या,वध में बदल जाती है ।

तुम जय श्री राम के नाम पर मरोगे,राम मेरे नज़दीक़ आकर बैठ जाएँगे । तुम फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद के नामपर मारोगे, भारत माता मेरे पास आकर बैठ जाएंगी । तुम धर्म के नामपर मारोगे, धर्म मेरे हाथ पर आ जाएगा,तुम इन सबसे खाली हो जाओगे,बल्कि खाली ही हो ।
जय श्रीराम का नारा तुमने चिढ़ाने,मारने का नारा बना लिया है । दोस्त,राम मेरे पास तब से ही बैठे हैं । मैं उनकी आंख देख पा रहा हूँ । मैं यहभी देख पा रहा हूँ कि तुम्हारे दिल से सब भगवान बार बारी वापस जा रहें हैं । मैं तुम्हारे दिल,जिसमे कान्हा वास करते थे,उसे खाली होते खंडहर में बदलते देख रहा हूँ । मैं तुम्हारे शरीर मे मरती हुई आत्मा को देख रहा हूँ,जाओ,और अपने शरीर को इतना हिंसक,इतना भयँकर बनाकर धार्मिक नारों को चीखकर बोलो की उन शब्दों के साथ ही धर्म और धर्म की आत्मा तुम्हारे शरीर से निकल कर अपने राम के पास चली जाए और तुम खंडहर दिल लिए हत्याएं करके,उनके खून को मुँह पर मल लो ।
मैं अपनी आखरी सांस तक अपने राम,अपने मुल्क और अपने हर उस भारतवासी को फख्र से देखता रहूँगा,जिसकी आंख भीगी हुई है । मेरे यही दोस्त मेरा भारत हैं । मेरे इन्ही दोस्तों के दिलों में राम हैं । इनमे ही सच्चा धर्म है, इसलिए मेरा मेरे राम पर भरोसा है ।
हर लिंचिंग का विरोध करेंगे, जमकर मुखालफत होगी । बिना नफा नुकसान से डरे हर राजनैतिक दोषी का नाम उछाला जाएगा । हम चीखकर तुम्हे तुम्हारा चेहरा दिखाएंगे मगर तुम यह भी देखकर तड़पोगे,की असली राम को मानने वाले असली के इंसान मेरे साथ हैं । राम के प्रेमी मेरे साथ हैं । राम के सामने दिल झुकाने वाले मेरे साथ हैं, तुम्हारे साथ सिर्फ और सिर्फ नफरत से भरे पुतले हैं, जो जीवन मे सिर्फ तुम्हारी जीत का बटन ही दबा सकते हैं, वह खाली हैं, मेरे राम वहां से कुछ कर गए,वह निपट खाली हैं,  राम अब हमारे साथ हैं ।

अगर तुम आज होते

*इसको पकड़ो,इसके दाढ़ी है ।अबे नाम बताओ,वह बोला अब्दुल...पूरा बोलता की सब चीख पड़े मारो,मारो,मारो।
दाढ़ी वाले को पकड़ कर मारते हुए भीड़ बोली,बोलो जय श्री राम,दाढ़ी वाला बोला जय श्रीराम । बोलो वंदे मातरम,बोला वन्देमातरम,बोलो राधे राधे और वह न रुकने वाली आंसुओं की धार के साथ बोला राधे राधे...
भीड़ ने पीट पीट उसे भी मार डाला,बाद में पता चला,मरने वाला तो मशहूर कृष्ण भक्त अब्दुल रहीम था,उसकी लाश पर उसका यह दोहा पैबन्द की तरह टांक दिया गया....

गहि सरनागति राम की, भवसागर की नाव।
‘रहिमन’ जगत-उधार को, और न कछू उपाय॥

*अगर तुम आज होते रहीम

Monday, June 24, 2019

धर्म रक्षक

गीता का कोई श्लोक पढ़ो,जैसे ही उस गुस्से से लाल लाठीधारी ने कहा,वह नौजवान पढ़ने लगा । हुआ कुछ यूँ की अनीस अपने परिवार के संग कार से कहीं चला जा रहा था । एक जगह बहुत से लाठीधारी धर्मरक्षक युवकों की भीड़ ने उन्हें रोका । गाड़ी में बैठा अनीस और उसका परिवार डर गया । पत्नी ने कहा,अब क्या होगा । अनीस ने कहा,तुम चुपचाप पीछे रहो, मैं देखता हूँ । भीड़ में से एक लड़का टेसुए रँग का अंगौछा ओढ़े आया और बोला तुम कौन हो ।

अनीस ने कहा,मैं विशाल हूँ । उसकी पत्नी ने घूर कर अनीस को देखा । गाड़ी के पास आए लठधारी ने कहा,गीता का कोई श्लोक सुनाओ । युवक ने कहा,

ओम शुंगयम मंगल्यमन कुमंगल धारियम,नमो नमः ।

ईश्वर की रक्षा का वचन लिए उस लड़के ने अपनी जैसी भीड़ से कहा,जाने दो,भाई है,भाई है । जाते जाते यह भी पूछा कि ठंडा पानी तो नही चाहिए और बड़े आराम से जाने दिया ।

अब अनीस की पत्नी पूछती है, अनीस ,तुमने झूठ क्यों बोला और गीता का श्लोक तुमने कब याद कर लिए । अनीस बीबी को देखकर मुस्कुराया । कहा भीड़ से भिड़ जाना बेवक़ूफ़ी है ख़ासकर जब तुम साथ हो । रही बात श्लोक याद करने की,तो वह तो बस अल्लम गल्लम कुछ भी मुँह से निकाल दिया ।

पत्नी ने हैरत से पूछा,अच्छा,अगर वह यह गलत श्लोक पकड़ लेता तो क्या हाल करता हमारा ।
अनीस ने बीबी के हाथ पकड़े और कहा,यक़ीन जानो,इनमे से एक ने भी पवित्र गीता पढ़ने की तो छोड़ो, उसे नज़र भर देखी भी नही होगी । जिसने गीता को पढ़ा होगा,वह भला अत्याचार करेगा । कान्हा जिसके दिल मे होंगे,उसके हाथ दूसरे के खून से रँगने को उठ ही नही सकते ।बीबी इनको श्लोक तो छोड़ो,इनसे सँस्कृत की एक लाइन सही उच्चारित नही होगी ।

पत्नी ने अनीस को इत्मीनान से देखते हुए कहा,अच्छा यह आइडिया कहाँ से आया...
अनीस बोला,कुछ साल पहले इस्लामिक स्टेट के ऐसे ही लड़को से दूसरे धर्मों को दो चार होना पड़ता था । आज यह अपने ईश्वर का नारा लगवा रहें,कल इस्लामिक स्टेट वाले अल्लाह हू अकबर लगवाते नही थकते थे । यह कट्टरपंथी उनसे कुरान की आयत सुनते और लोग ऐसे ही कुछ गल्लम गल्लम सुना कर निकल जाते, कमबख्त वह भी पकड़ नही पाए,क्योंकि कुरान उन्होंने भी नही पढ़ा था । बीबी एक बात गिरह बांध लो,जो भी अपने धर्म की ज़िंदाबाद तलवार,लाठी,भीड़ का डर दिखाकर कहलवाए,उसके खुद के अंदर का धर्म मर चुका होता है ।

Sunday, June 23, 2019

विपक्ष सम्भल जाए

"ए भय्या हम अकेले गाँव में थे,जो राहुल को वोट किये, उई हार गए । तो का अब ई हमारी मदद नही करेंगे । राहुल का जीते के ही साथी हैं, हारे के नही । " सच पूछिए आज सुबह सुबह मिलने आने वाले एक शख्स राम सरन के यह लफ्ज़ मेरे कान में पिघले सीसे की तरह उतर गए ।
काँग्रेस, सपा और आरजेडी के नेताओं,यह शब्द उनके हैं, जिन्होंने भयँकर आंधी में भी अपना धैर्य और साहस नही छोड़ा । यह लाखों में जो एक आध वोट तुम्हे मिले हैं, वह उनके लाखों वोटों के बराबर हैं, इनकी क़दर करो ।

यही नही जिन्होंने तुम्हे वोट नही दिया,जिन्होंने तुमपर रत्ती भर विश्वास नही दिखाया अगर वह परेशानी में हैं, तो उनके आँसू पोछना तब तक तुम्हारा कर्तव्य है, जबतक तुम मर नही जाते । सार्वजनिक जीवन को धरने वाला व्यक्ति चाहे सत्ता में हो या चाहे विपक्ष में हो,उसे जनता की सेवा से चूकना नही चाहिए । जनता की सेवा से चूका राजनेता,डाल से चूका बन्दर समान है, यह मत आने देना ।

मैं तुमसे कह रहा हूँ,जो गाँवो में,कस्बों में,शहरों में तुम्हे चुटकी भर भी वोट मिला है, उसके लिये तुम्हे लड़ना होगा । जिस विश्वास से लोगों ने तुम्हारे निशान के सामने का बटन दबाया था,उस विश्वास को तुम्हारी निराशा तोड़ डालेगी ।

जब तुम कहते हो कि जनता ने वोट धर्म और पाकिस्तान के लिए दिया था,अस्पताल और रोजगार के लिए तो नही, यक़ीन जानो बड़े अश्लील नज़र आते हो । यह देश है, जिसने तुम्हे भी सत्ता दी थी,कभी खुशी और कभी मायूसी तुमने भी दी थी । यही ने आज इनको सत्ता दी है, यह भी खुशी तो कभी मायूसी दे रहे हैं । इसमें तुम क्यों अपने कर्तव्य भूल रहे हो ।
मुझसे रोज़ ही कोई न कोई मिलने आता है । ऊपर जो अल्फ़ाज़ हैं, वह भी मिलने ही आया था,उसके लफ्ज़ मुझे डराते हैं कि कहीं वह यह न मान ले कि जिनको वोट दिया था, वह बेकार गया ।

लोकतंत्र में एक भी वोट,सिर्फ जिताऊ और हराऊ वोट नही होता बल्कि वह विश्वास का परचम होता है । राहुल गाँधी हों,अखिलेश यादव हों या फिर तेजस्वी,यह सब जो भी वोट पाएँ हैं, उन्हें उनकी रक्षा करनी ही होगी । उन्हें अपने कर्मो से यह दिखाना होगा कि वह हर कमज़ोर वक़्त में देश की जनता के साथ मज़बूती से खड़े हैं ।

विपक्ष के सभी छोटे बड़े कार्यकर्ता का धर्म है कि वह अपने इर्द गिर्द अपने होने का एहसास कराए । जिस गाँव, गली,कूचे में एक भी वोट मिला है, उसे उस गाँव गली कूचे की फिक्र में दिन रात एक करना होगा ।

मैं क्या हूँ, रत्तीभर भी तो कुछ नही,राजनैतिक होने का भरम मुझमे है नही,फिर भी इस दौर के हर मायूस इंसान की आंख पोछता हूँ, कन्धा देता हूँ रो लो,कहता हूं,सब गलतियां मेरे ऊपर डालकर,खुदको मुक्त करो । उनसे कहता हूँ, हवा का रुख और ज़मीन की जुम्बिश मैं नही पहचान सका । मैं अपने ही देश मे अपने ही भाइयों के दिलों की चाहत को नही समझ सका । गलती हो गई,अब नही होगी । अब मैं, तुम सबके साथ मिलकर देश की खुशहाली की नई सुबह लाने फिर लगूँगा ।
यह ट्वीट,यह पोस्ट,यह मैसेज,यह लेख केवल माध्यम भर हैं, मैं घर घर गली गली भटककर,सही रास्ता पाने की खोज में हूँ । मुझे मेरे लोग,मायूस अच्छे नही लगते ।
इठलाती सत्ता को रोज़ देखता हूँ, वह मेरी चुनौती हैं । गाँधी से सीखता हूँ, वह मेरा रास्ता हैं । मैं, ऊपर के शब्द दोबारा नही सुनना चाहता हूँ, इसलिए उस बूढ़े राम सरन के पीछे साय जैसा आखरी सांस तक खड़ा हूँ.....

Thursday, June 20, 2019

जेल रास्ता है

"हम कहते थे उनसे की यह फटे कम्बल की सिलाई से अच्छा हमे सड़क की कंक्रीट तोड़ने में लगा दें । उन्हें लगता था बंद कोठरी में कम्बल ठीक करना ज़्यादा आसान काम है और कड़ी धूप में बिना किसी साय में,कंक्रीट बनाना मुश्किल काम है । मैं कहता कि मेरे लिए दोनो काम एक जैसे हैं, बस बाहर खुली हवा है और उस हवा में हमारे जैसे और लोग हैं । लोगों को देख भर लेना मेरे लिए सुक़ून है ।"

यह थे मोहन दास गाँधी, अफ्रीका में पहली जेल यात्रा का ज़िक्र था । पत्थर तोड़ते तोड़ते उनकी दोनो हाथों में छाले पर जाते,पैर सूज कर फूल जाते मगर फिर भी एक ही बात की अपने हर साथी के साथ मुस्कुराते हुए कहते,यह वक़्त एक खूबसूरत सुबह के लिए है । ऐसी सुबह जिसको सत्य,अहिंसा और धर्म मार्ग से हम प्राप्त करेंगे ।
गाँधी कहते,अन्याय से उपजे संघर्ष के दिनों में सबसे खूबसूरत जगह जेल है । जेल के सख्तियाँ तुम्हे मज़बूत करेंगी । कंकर मिला खाना तुम्हे तुम्हारे लक्ष्य पर टिकाएगा । तुमपर होने वाला अत्याचार,तुम्हे तुम्हारे मकसद के और नज़दीक़ ले जाएगा । जेल जाओ,वह सब बर्दाश्त करो,जो दूसरे कैदी करते हैं....

जेल की कालकोठरी में ही उस सुबह का सूरज छिपा है, जिसे तुम देखना चाहते हो । मोहब्बत करों सलाखों से,यह जेल की सलाखें नही तुम्हारे विश्वास की निशानी हैं । मत लो ज़मानत,मत भरो जुर्माने,कहो कि हमे जेल भेजो,यह जेल ही तुम्हे गाँधी के शुरुआती रास्ते पर ले जाएगी....लम्बा,थकाऊ,कठिन सफर भले हो मगर रास्ता यही है, चाहे आज चलो चाहे कल,चलना यहीं हैं....जेल से मत डरो,डरो उस दिन से की कहीं जेल में हम कमज़ोर पड़कर टूट न जाएं ।