पता नहीं क्यों आज एक चिड़िया को देख कर सारा बचपन आँखों के सामने आ गया.वो भी एक साधारण सी गौरैया को देखकर.सच में ये बेशर्म आँखों में आंसुओं ने फिर से जगह बना ली .याद आ गई वो बचपन की शरारत जब डलिया में दाने डाल कर इन बेचारी गौरैया को पकड़ने की असफल कोशिश किया करता था.सारा घर जब दोपहर में आराम करता तो मई इन्हें पकड़ने के लिए उस उम्र के सारे जतन कर रहा होता.....आज वो बचपन फिर तैर गे ..सोचा ज़माने ने हमें कहन से कहन लाकर खड़ा कर दिया की ..अब इन चिड़ियों को देखना भी नसीब नहीं होता......जिस तरह नानी दादी ज़िन्दगी से जाती रही....ये खूबसूरत चिड़िया भी कहीं दूर उड़ गई......अब तो इन्हें देखकर पकड़ने का भी मन नहीं करता बस यही जी चाहता है इन्हें एक उम्र तक सिर्फ निहारता रहूँ...........................सच यही तो मेरा बचपन है कौन इन्हें भूलना चाहेगा.......ये चिड़िया नहीं ये तो बचपन के फ़साने की पारिया. है जो हमेशा याद रहेंगी........सबके भाच्पन की तरह ये भी हमारे बचपन के अकेलेपन की एक शरारती साथी थी.............अगर सुन सकती हो गौरैया तो आज मई तुमसे अपने प्यार का ऐलान करता हु..........
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Sunday, June 19, 2011
Thursday, June 16, 2011
kavi..........
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.
कैसे बोलूँगा तुम्हारे खिलाफ
ये काम भी आँखों को करना होगा
कल तक तुम मेरी थी
न जाने कैसे हो गई पराई
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
कल तक मेरे हाथो में था जादू
आज ये इतने गरीब क्यों.
क्यों तुम्हे मेरी अदाएं
लगने लगी काँटों सरीखी
इसलिए फिर मै बोलता हु
हमारे चरित्र पर ऊँगली न उठा
अगर मैंने पलके भी उठा ली तो..
जाने क्या गज़ब हो जाएगा.
adab
आखिर मीडिया के लोग इतने अख्खर क्यों होते है................क्यों उन्हें इतना घमंड होता है........आसुतोष हो या रजत ....माना की आप एक बार नाम है लेकिन.............क्यों.......मई भी मीडिया में एक नाम तलाश रहा हु ...........लेकिन अपने चैनल से दुसरे चैनल तक सब एक जैसी जमात बिची हुई है..........
भाई भतीजावाद पर सबसे ज्यादा ऊँगली हम ही युथाते है......लेकिन क्या मीडिया से ज्यादा कहीं और है ऐसा................बहुत अफ़सोस होता है देख कर ये सब..............लेकिन मन में तगर विश्वास है की ये सब सुधर जाएगा......................थोरी सी या बहुत सख्त मेहनत की ज़रुरय्त है................
हम काम दिखने वाला तो अच्छा करते ही है लेकिन हमारे आफिस में क्या चलता रहता है जग ज़ाहिर है...................शराब और शबाब आम है...................
Wednesday, June 15, 2011
adab
तहजीब की दुनिया को हमारे आगाज़ का आदाब .
अब आप हमसे और हम आप से रूबरू होंगे.
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