पिछले डेढ़ महीने देश ने तमाम उतार चढ़ाओ देखे । जामिया में गोलियों की गूंज से जो लोगों को दबाने की आहट निकली,वह दर दर दरकती चली गई । हम सब इस दौर के गवाह बने,शाहीनबाग दिल्ली से लखनऊ घण्टाघर तक गुज़रती भीड़ देखी,हर बेचैन आँख देखी,उन आंख पर बैठे खाकी पहरे को देखा । अपने तमाम साथियों को सलाखों में देखा तो तमाम को जूझते देखा । इस दौर का बच्चा बच्चा गवाह बन गया,जिसे जैसा मन हो वैसी व्याख्या करे । कोई चाहे आलोचना करे या इस ठंड और निष्ठुरता को हराती औरतों की तारीफ करे, सबके पास बहुत कुछ है कहने को ।
मैं लौटता हूँ गाँधी पर,जिनका नाम इधर जितना लिया गया,उतना शायद कभी ही लिया गया होगा,सबकी ज़ुबान पर था गाँधी का भारत,कोई इस भारत को ज़िन्दा रखने को बेताब है तो कोई इसे मटियामेट करने को बेचैन । यह जो गाँधी की मोहर है, यह जितनी मिटाने की कोशिश होंगी,यह उतनी गहराती चली जाएगी ।
मैं कभी आंदोलनों से अभिभूत नही हो जाता और न ही उससे उदासीन होता हूँ । कल के दिन गाँधी को हमसे छीनने की नाकामयाब कोशिश की गई थी । शरीर को मिटाकर कोई संगठन विचार को मिटा डालने का असफल प्रयत्न करता है । अब जब गंगा में इस क़दर पानी बह चुकने के बावजूद गाँधी आंदोलनों की शक्ल में सामने खड़े हों,तो कौन मूर्ख यह समझेगा की गोलियों से गाँधी मिटाए जा सकते हैं । गाँधी तो अन्याय,अधर्म,असत्य के सामने मुस्कुराते हुए हमेशा खड़े मिलेंगे ।
इन गुज़रते आंदोलनों और भीड़ में बहुत नाम गूंजा मेरे गाँधी का,बस मैं इसमें उस गाँधी को नही खोज सका,जिससे अंग्रेज़ घबराते थे । पता है गाँधी को न मानने वालों ने जितना गांधी पढ़ा है, उससे कम ही उन्हें मानने वालों ने पढ़ा है, अगर पढ़ा होता तो हर आंदोलन,हर अनशन,हर विरोध सामने वालों की मुस्कान छीन लेता,नाकि उनकी विजय का सूत्र बनता । खैर यह बहुत अलग बातें हैं, जो वही समझेंगे,जो गाँधी को जपते नही बल्कि समझते हैं ।
कल जब गाँधी जी की हत्या पर अफसोस जताइयेगा, तब यह ज़रूर सोचिएगा की हम अब आगे क्या करें । गाँधी से मोहब्बत करने वाले इन लोगों को कितना पैना बनाए की इनके एक एक कदम का प्रभाव पड़े । गाँधी की पहली से आखरी सांस तक गूंथे हर सन्देश को उन तक पहुँचाएँ क्योंकि गांधी भीड़ नही लीडर बनाने का नाम हैं । गाँधी उन ज़बान तक तो आ ही गए हैं, जिनके दिमाग मे भी नही थे,उम्मीद है जल्द ही दिल ओ दिमाग मे आ जाएँगे । महीनों से बिखरे बेचैन इकट्ठे लोगों की आंखों में देखिए और सोचिए कि गाँधी होते तो क्या करते,अब जब मोहनदास करम चंद गाँधी बन पाना लगभग असंभव है, तो थोड़े थोड़े ही गांधी बना जाए मगर वह थोड़ा भी सम्पूर्ण हो,प्रभावकारी हो,सत्य पर टिका हो,साजिशों से दूर सिर्फ नैतिकता और धर्म मार्ग पर टिका हो,जब यह सब कर लोगे तब बातों में असर पैदा होगा,तब विरोधी झुकेंगे अन्यथा तुम्हारे इकट्ठे होने का वह लाभ ही लेंगे,यह याद रखना हमेशा की अंग्रेज़ गाँधी के एक भी आंदोलन का लाभ अपने पक्ष में नही ले पाए थे,इतनी पैनी निगह रखना,तभी गाँधी के लोग कहलाओगे । अंग्रेज़ रत्ती भर जिस व्यक्ति का फ़ायदा नही उठा सके,वह गाँधी थे,अपने किसी कदम को विरोधी के लिए लाभ का मत बनने देना,कल गाँधी आखरी सांस लेते हुए भी आज़ाद भारत के अपने विरोधी को परास्त करते हुए नज़र आएँगे,अपना लाभ , विरोधियों को उठाने मत देना,गाँधी को समझ सको तो समझो दोस्त..
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