जब तक आपको मूर्ति में भगवान दिख रहें है तब तक आप ईश्वर से मिलने की पहली ही सीढ़ी पर हैं। जैसे ही ईश्वर मूर्ति से आज़ाद हो जाए वह दूसरी सीढ़ी है और जब यह आपमें दिखने लग जाए तो यह अंतिम सीढ़ी है।आप किसी भी सीढ़ी को नकार नही सकते,कमतर नही समझ सकते,हाँ अपनी समझ के साथ आप आगे बढ़ते हैं।यह लफ्ज़ हमारे नही हैं।यह वह गहराई के अल्फ़ाज़ हैं जो मेरे कान हमेशा सुनते रहे हैं।दिल ने हमेशा आपके हर लफ्ज़ को उतारा है। मैं सोचता हूँ की आप पर लिखने का साहस भला कैसे लाऊं ।
आप पर मैं लिखूं,यह कैसे हो सकता है।आपके क़दमों में लिखूं यह भी तो आपको नही पसंद था। अब आप सामने हैं, तो सबकुछ दिखने लगा है । आपका यौवन ओढ़े गम्भीर चेहरा अजब सी रौशनी पैदा करता है।आपको पढ़ा,सुना फिर जब आपसे अकेले घंटों बातें की तब खुद को समझ सका।वह आप ही तो थे जिसनें आखों को ऐसे खोला की दीवार के पार दिखने लगा।दिमाग को ऐसे परत दर परत खोला की किसी तरह का मैल नही रह गया।
मेरी ज़िन्दगी को हर घङी जिसनें मज़बूत किया वह ही तो थे आप ,वही तो थे नरेंद नाथ दत्त जी यानि हमारे विवेकानन्द। महान संत रामकृष्ण परमहँस की छाँव से निकले मेरे विवेकानंद । देखिये आपनें हमे क्या पढ़ाया और लोगों नें आपको कैसे पढ़ा इसमें बङा फ़र्क है।
आपने हमे मोहब्बत के साथ मिलकर रहने को सिखायाऔर दूसरे आपके ही नाम पर नफ़रत बांट रहे। आपने हमे सवाल करने का साहस दिया,अगर आपके सवाल नही होते तो रामकृष्ण परमहँस के वह उत्तर,जिनसे आपके दिल की गांठ खुली,कभी न खुलती । लोग सवाल से भागते हैं, उनके पास उत्तर नहीं, आपने सवाल पूछना और उत्तर देना दोनों हमे सिखाया । आपने दूसरों को नीचा दिखाने से ज़्यादा खुद को ऊंचा उठाना हमे सिखाया,यही तो सत्य का रास्ता है, जो झूठ का ज़िक्र नही करता,बल्कि खुद खुल जाता है, जो झूठ होगा वह खुद बखुद खत्म हो जाएगा,सत्य को झूठ की चर्चा से बचना होगा । मैं तो दावे से कहता हूँ मेरे विवेकानन्द नें 39 साल की मामूली सी उम्र में जो वैचारिक,आध्यात्मिक और सामाजिक रेखा खींची है उसे इस काल में तो कोई छूने वाला नहीं, पार करना तो सोचे भी ना।
हां बीती रात उन्होंने हमसे कहा दोस्त घबराना नहीं जितना दिल करे मेहनत करो,मुझे एक सुकून पसंद और तरक्की पसंद हिंदुस्तान चाहिए ,मै हर वक्त तुम्हारे पीछे साए की तरह हूँ ।तब से मै भी बेफिक्र हूँ एक दिन ज़रूर हमारा मुल्क मुस्कुराएगा।लिखने को तो बहुत से किस्से याद आ रहे,आखरी वक़्त पर बिस्तर पर पड़े बीमार चिड़चिड़े विवेकानंद को लिख सकता हूँ,दुनिया को रौशनी देता हुआ चमकदार विवेकानंद लिख सकता हूँ,परमहंस के सामने अपने दिल को खोलते विवेकानंद को लिख सकता हूँ,आध्यत्म और सेवा में सेवा को प्रमुखता देते विवेकानंद पर लिख सकता हूँ । दूसरों से नफरत और प्रेम में अथाह प्रेम पकड़े विवेकानंद पर लिख सकता हूँ मगर कम्बख़्त आंखें भीग कर लिखना दुश्वार कर रहीं हैं और मेरे विवेकानन्द को आंसू पसंद नहीं । सारी दुनिया फख्र करे की हमारे पास विवेकानन्द हैं और मै फख्र करू क्योंकि अपनें दोस्त की ज़मीन पर पैदा हुआ हूँ। विवेकानंद जैसे चरित्र एक धर्म के डोर में नही बंधते, बल्कि उनपर हर एक का अधिकार होता है । रौशनी किसी एक के लिए कभी होती भी नही,वह तो हर आँख वाले के लिए होती है ।
आज लोग कहते हैं कि विवेकानंद की पुण्यतिथि है, जबक हम कहते हैं कि आज वह ज़मीन की बेड़ियाँ तोड़कर पूरे संसार के सफर पर निकल गए थे,एक घर से आज़ाद होकर हर शरीर के घर यानी हृदय में रहने निकल गए थे । मेरे लिए विवेकानंद एक रोशनी है, जो मेरा सफर खत्म किये बिना भला खत्म कैसे हो सकते हैं...पढ़िए उन्हें,इतना पढ़िए की दिल सख्त से मुलायम होने लगे,फिर जीवन मे इतना उतारिये की आपमें नफरत दम तोड़ दे,जबतक नफरत,अहंकार है तब तक विवेकानंद सिर्फ जीभ पर आएँगे,कंठ से नीचे नही जाएँगे,उनका स्वाद जो मस्तिष्क को निर्देशित करेगा ,आप ले ही नही सकेंगे जब तक हृदय विशाल नही होगा । उसको पाने के लिए सबसे प्रेम आवश्यक है,तो मर्ज़ी आपकी चाहे जीभ पर नाम जपिये चाहे उन्हें शरीर मे धारण करने तरफ बढ़िए....
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