Sunday, November 1, 2020

जाहिल हो

जाहिल हो ।।। यह लफ्ज़ हम अक्सर उसकी तरफ ढकेल देते हैं, जो हमारी राय जैसी राय नही रखता है । एक डॉक्टर के लिए जिस व्यक्ति को दवा कम्बीनेशन समझ न आए,उसे जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह फिलॉस्फर हो । एक वकील के लिए उसके बुने पेपर को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह डॉक्टर हो । एक लेखक के लिए किसी किताब या कविता को न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह वैज्ञानिक हो । एक वैज्ञानिक के लिए विज्ञान की सामान्य परिभाषा न समझने वाले को जाहिल कह देना बड़ा आसान है, भले ही वह कलाकार हो । एक थियेटर आर्टिस्ट के लिए उसके नाटक के ट्विस्ट को न समझने वाले को जाहिल कह देना आसान है, भले ही वह व्यक्ति कामयाब पॉलिटिशियन हो ।

असल में हम सब अपने से अलग या हमारी बात को न समझने वालों को जाहिल की माला पहनाने को तड़पते रहते हैं । कभी एक पूरे वर्ग को जाहिल कहते हैं, कभी दिल नही भरता तो पूरे देश को जाहिल कहते हैं, कभी पूरे धर्म को जाहिल कहते हैं तो कभी पूरी जाति को जाहिल कहते हैं । हम अक्सर जिस तरफ उंगली उठाकर यह जहालत के तमगे बांट रहे होते हैं, उसे वक़्त यह तमगा हमारे माथे भी चमक रहा होता है, बस हमें दिखता ही तो नही है मगर औरों को तो दिखता ही होगा ।

चार किताब पढ़कर अगर हम बिना किताब पढ़ने वाले को जाहिल कहकर निकलेंगे,तो ज़ाहिर है,यह पहचान है कि वह चार किताबें भी हम पर असर नही कर सकी हैं, कोई बदलाव नही ला सकी हैं ।

ज्ञान को पाना जितना कठिन है, उससे कहीं ज़्यादा कठिन उसे संभालना है । ज्ञान को संभालने की एक प्रैक्टिस बताते हैं, आपको दूसरा जब तक जाहिल नज़र आए,तब तक ख़ुद में ज्ञान की खूब वृद्धि करें । खूब पढ़ें,सीखें,लोगों से मिले,यात्रा करें,जिस दिन दूसरे जाहिल नज़र आना बंद हो जाएं,जिस दिन आपके ज़िक्र में किताबों,लेखकों और भद्रजनों के नामों की जगह विचार आ जाएं,वह दिन आपकी शुरआत होगा । एक बात मेरी गिरह बाँध लें,इस ज़मीन पर जाहिल कोई नही है, क्योंकि सांसों का हिसाब रखकर उन्हें पूरा करना खुद में बहुत महान काम है, बल्कि इन्हें जाहिल समझना ही असल जहालत है...
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