Wednesday, May 23, 2018

क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम

"तुम हो प्रेम के घनश्याम ,मै प्रेम की श्याम-प्यारी।।
रोये श्याम-प्यारी,साथ बृजनारी,आओ मुरलीधारी।।"

कान्हा को याद करते हुए जब उनकी कलम चलती तो यमुना का पानी झूमकर उन्हें वज़्ज़ू करवाता।मस्जिद की मुँडेर पर बैठने वाला जब कृष्ण के चरणों की धूल पर कलम घिसता है, तब मुल्क़ की मोहब्बत का मुस्तक़बिल बनता है।वोह जिसे ज़माने ने भुला देना बेहतर समझा क्योंकि याद करते तो उसके जैसा दिल कहाँ से लाते।आज उनकी पैदाइश पर अगर उनके हमारे मुल्क़ के लिए लिखे गीतों को ही याद कर लेते तो बड़ा काम हो जाता।

आज़ादी की लड़ाई की तपिश में तड़पने वाले इस कवि के दिल को महसूस करना हमारी ज़िम्मेदारी थी।हमने उन्हें बंगाल के दायरे में क़ैद कर दिया।हम आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों को दायरों,खाँचो में बाँटने के आदी हो चुके हैं।वह हैं क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम,जिनको हमेशा याद रखना चाहिए मगर क्या करें हम बड़े व्यस्त हैं।इस व्यस्तता में भी अगर आज हम उन्हें याद करलें तो उनके चेहरे पर एक मुस्कान दौड़ जाए।उनकी सबको जोड़ती कलम महक उठेगी।उसकी खुशबू हो सकता है हमारे आँगन को भी महका ही दे।

पदम् भूषण क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम को याद करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि कुछ गिने चुने नामो में वह एक हैं, जो दिलों की नफ़रत पर राख डालकर उसमे फूलो की नरमी उड़ेलते हैं।उनके बारे में ढूंढकर पढ़िए ।आज उनके जन्मदिन पर खुश होईये,लोगों से उनके बारे में पूछिये,इससे दिल में नफ़रत के फफोले फूटेंगे और सुक़ून,मोहब्बत और तरक्की के रास्ते खुलेंगे ।फिर कह रहें अपने दिल से हर तरह की नफ़रत को जड़ से खत्म करदें वरना नस्ले भुगतेंगी इसको।हमारे पास नफ़रत खत्म करने खूबसूरत वजहों में से एक क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम भी तो हैं....

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