गुज़री रात एक कवि हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह व्यवस्था जो रोज़ बिगड़ी हुई व्यवस्था को टोकना जानती थी । गुज़री रात एक लेखक हमारे बीच से चले गए और चले गए वह ख्वाब जो बेचैन रातों का सहारा थे । गुज़री रात एक विचारक हमारे बीच से उठकर चले गए और चली गई वह चिंता की लकीरें भी जो भविष्य की बर्बादी के लक्षण सामने रख दिया करती थीं ।
गुज़री रात हमसे रूठकर एक एक्टिविस्ट चले गए और चले गए वह कदम जो हर नाइंसाफी पर खुद बखुद बढ़ आया करते थे । गुज़री रात हमारी आवाज़ चली गई और चली गई हमारी वह खूबी जिसपर कमज़ोर को भरोसा था कि वह उसके दर्द को आवाज़ देगा । क्या वाकई गुज़री रात एक कवि,एक लेखक,एक विचारक,एक एक्टिविस्ट,एक मुखर वक्ता चला गया या गुज़री रात एक व्यवस्था गुज़र गई,जिसको हम फलता फूलता देखना चाहते थे ।
मंगलेश डबराल जी का जाना हम सबके लिए एक ऐसा दर्द है, जिसको आज नही तो कल मिलना था मगर हम कभी भी यह दर्द सहने को तैयार नही थे । हमारे सरों से धीरे धीरे वह हाथ हट रहे हैं, जो अचानक हमारी अल्हड़ता,चंचलता,मासूमियत को पीछे छोड़कर ज़िम्मेदारी का एहसास करा रहे हैं । हम मंगलेश जी के साथ के कितने किस्से सुना सकते हैं मगर सच पूछिए काम की तो उनकी नसीहतें हैं, जो हमें इंसान से संवेदनशील इंसान बनाने की प्रक्रिया है ।
पलट कर देखिएगा कितने लिखने वाले हैं, जिनके आँख बंद करते ही सन्नाटा होते दिखाई दे । लेखक जिसे पढ़ने वाले कम बचे हैं, उस दौर में लेखक का गुज़रना लोगों को अपने घरों के किसी बुज़ुर्ग का जाना महसूस हो तो यह उस लेखक की वह कमाई है, जो हर एक कमाना चाहेगा ।
मंगलेश जी की तमाम यादों और किस्सों संग बस इतना सा वादा पूरा हो जाए,तो उनके स्पर्श का मान रह जाए कि अन्याय और चुप नही रहेंगे....क्या कहें जब घर खाली हो रहा हो,रोएँ या घर को बचाने के लिए खड़े हों,मंगलेश जी रोने की जगह खड़े होने की नसीहत हमें दे चुके हैं, वही सही है, दुःख में टूटेंगे नही बल्कि दुःखों को दूर करेंगे सर....
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