बेहतरीन क़ाबिल लोगो की जमात ने 900 ईसवी में इख़्वानुस्सफ़ा नाम का ग्रुप बनाया। इसके माइने थे पवित्र बिरदरी। अरब अपने इल्म के सातवें आसमान पर थे। वह रश्क भी कर सकते थे क्योकि जब यूरोप अरस्तू को खो चुका था तब अरबी ज़बान में सिसली में वह ज़िंदा थे। अरब के मामूली से मदरसों में अरस्तू और अफ़लातून पढ़े जा रहे थे,क्या ही दौर रहा होगा वह।
इख़्वानुस्सफ़ा ने एक एनसाइक्लोपीडिया तैयार की और उसमें सब कुछ उतार डाला । यहाँ तक एक बेहतर इंसान की खूबियों पर,कमियों पर लंबे लम्बे तज़किरे किये गए । एक दूसरे को समझा गया फिर जाकर उन्होंने बेहतरीन इंसान की भोगैलिक खूबियों को परखकर कहा,
"एक बेहतरीन इन्सान वह है जो ऊचे दिमाग का इरानी मूल का हो,अरब आस्था का हो,हनफ़ी हो,शिष्टाचार में ईराकी हो,परम्परा में यहूदी,सदाचार में ईसाई,समर्पण में सीरियाई,ज्ञान में यूनानी,द्रष्टि में भारतीय और ज़िंदगी जीने में सूफ़ी।।।।
हम आज इसे माने या नकारे,हमारी मर्ज़ी मगर एक बात तो हमेशा सच रहेगी,सबसे बेहतरीन इंसान वह जिसमें तमाम तरह की खूबियां हों,जिसमे तमाम धर्मों के रंग भरे हुए हों,जिसमे तमाम भोगौलिक विशेषताओं का जमावड़ा हो,जिसकी ज़ुबान हर तरह के जायके को इज़्ज़त देना जानती हो,जिसका दिमाग संकीर्णता से ऊपर उठकर हर विचार को बराबर में बैठाकर चलना सिखाता हो,जिससे इंसानियत को ख़तरा न हो,जिसके खड़े होने से लोग जुड़ जाएँ नाकि बंट जाए ।
इख़्वानुस्सफा और सूफ़ीज़्म पर पहले भी कहते रहे हैं, समझिये इसे न कि इसको सुनकर झूमिये । दिल को बड़ा कीजिये जिसमें अलहदा अलहदा रँग अपनी खूबसूरती बिखेर सकें,कोशिश कीजिये अपनी ज़मीन के सबसे बेहतरीन इंसान बनिये,मूल को हम नही मानते मगर कर्म को मानते हैं, कर्म ही आपके मूल हैं, प्रेम को कर्म बनाइये,मूल आपका श्रेष्ठ होगा,नफरत को कर्म बनाएंगे,तो बदनाम मूल ही होगा...
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