Tuesday, December 1, 2015

जिसे हम घर कहते है।

चार इंच की ईटों से  ऐब  ढकने वाली जगह को हम घर  कहते है।जिन दीवारो को आप घर समझते है वो आपके सारे गंदे खयालो की गवाह है। लोग घर में खुशिया,हिफाज़त और न जाने क्या क्या तलाशते हैं जबकि हमें तो ये खुशियो को कैद करने वाली जगह लगती है। आप ज़िन्दगी के बहुत से जशन इन चार दीवारो में मना  लेते है। उम्दा से उम्दा रौशनी,खुशबु और ज़ायके ये चार इंच की कमज़ोर दिवार लांघ नहीं पाते है।
अब रही बात हिफाज़त की तो अक्सर लोगो को घर से ज़्यादा सेफ जगह कोई और नहीं लगती। इसीलिए हर शाम वो हफ्ते खफ्ते इस कैद में भागे हुए आते है। ये वही हिफाज़त की जगह है जहाँ औरते मारी जाती है ,बूढ़े सताए जाते है और बच्चो का इस्तेमाल हो रहा होता है। मगर कुछ बाहर नहीं आता है। सारे गुनाहो पर घर नाम की शराफत की जो चादर पड़ी रहती है। हमें तो हर घर से सिसकती हुई रूहो की आवाज़ आती है। 
घर वो जगह है जिसे मै दावे के साथ कह सकता हूँ की यहाँ भगवन नहीं होते। तभी तो एक शराबी छनकती बोतले लिए सीधे घर आता है। कभी आपने उसे बोतले मंदिर या मस्जिद ले जाते देखा है। उसे अच्छे से पता है की यहाँ ईश्वर कभी भी झांक नहीं पाएगा। उसकी दीवारे ईश्वर की आँखों पर पर्दा डाल जो देती हैं। 
जब जब घर सोचता हूँ तो अकेलेपन का एह्सास होता है। पूरी खूबसूरत दुनिया अपने से भागति हुई लगती है। बेहतरीन दोस्तों को बिछड़ने वाली जगह लगा घर। काश यह घर न होते तो बता दे आपके बहुत से झगडे भी न होते। मेरी खुशिया कभी चार दीवारो में  नहीं खुश होंगी । मेरे आंसुओ का रंग सब देखे। हमारे बीच झूठ का पर्दा न हो। हम जैसे है वैसे दिखे। और ऐसा होने में सबसे बड़ी रुकावट है जिसे हम घर कहते है। 
  

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