Sunday, November 5, 2017

किताब गुलाब हम

अब तो किताब का वह पन्ना खोल दो।जिसमें तुमने मेरे दिए गुलाब को दबा रखा है।इधर बड़ा बेचैन रहा हूँ।हफ्तों से साँस अंदर से बाहर आने में पूरे बदन की मेहनत ले रही है।मुझे याद है जब ऊँचे टीले पर चढ़ते हुए जब यह गुलाब तुम्हे दिया था,तब सिर्फ फेफड़े ही साँसों को तरतीब में लगाकर,तुम्हारे सामने खड़े किये थे।अब तो हर साँस पर बदन झूल जा रहा है।
कल ही डॉक्टर से मिले थे।बोल रहे थे की साँस घुट सी रही होगी,दवा से सही हो जाएगी।अब इन नासपीटो को कौन बताए यह उखड़ती साँस दवाओं से नही सही होने वाली।

यह तो तब से घुट रही हैं जब से वह ताज़ा गुलाब प्राचीन भारतीय इतिहास की किताब में दबा हुआ है।किताब का रोज़ बढ़ता पीलापन ही तो मेरे चेहरे के गुलाबीपन को फीका कर रहा है।पता नही जाती हुई तुम वह किताब साथ ले गई हो या आजभी गुलाब के साथ वह इतिहास की किताब का इतिहास भी किसी लकड़ी की अलमारी में क़ैद है।कोई वह पन्ना उलट दे और उसमे सूख चुका गुलाब छलक कर बाहर आ जाए,उसके आते ही मेरी साँसे जिस्म से निकल कर हवा में घुल जाएँ।

यह बदन कीड़े मकौड़े की गिज़ा के लिए तैयार हो जाए।मुझे रोज़ मरते हुए लगता है की प्राचीन इतिहास की उस किताब में किसी ने मुझे इस शिद्दत से दबाकर रखा है की न वह मुझे जीने देना चाहता है और न ही मरने दे रहा...बेचैन साँसों में उलझा हुआ एक गुलाब नुमा दिल...न धड़क रहा,न रुक रहा,मर भी तो नही रहा...

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