काशी, यह सिर्फ एक शहर का नाम नही है।यह एक पूरी सभ्यता है।पाँच हज़ार सालों से जिसकी नीव आज भी मज़बूत खड़ी रहे,ऐसी जगह अचम्भित ही करती है।यह काशी,धरती पर हज़ारों साल से खुद में रोज़ होने वाली उथल पुथल से अलग शाँत सा गंगा किनारे खड़ा है।इसकी शाँति शिव की शाँति है।शिव में शाँति रूद्र की है।रूद्र की नगरी उनके अपने अवतार शिव के छूने भर से चमक गई।रूद्र की नगरी में शिव हैं तो शिव की नगरी में रूद्र या कहें इन दोनों की छाव ही तो काशी है।
तभी तो काशी नरेश को शिव का अँश यानि शिवांश जैसी उपाधि मिली हुई है।आप इस शहर को करीब से देखिये तो सुबह भोर में उठने वाला यह शहर और इससे सटकर सोई हुई गंगा नदी,खुद बताएँगे की वह कितना वक़्त यूँहीं बिताते रहे।आबादी आती रहीं,जाती रहीं,राजा महराज आते जाते रहे मगर यह काशी इन सबसे होते हुए बहुत आगे बढ़ गई।काशी एक ऐसा रजवाड़ा जिसकी अपनी खुद की कभी कोई सेना नही रही।जिसकी रक्षा करना दूसरे राज्यों के लिए पुण्य था,वह काशी हमेशा आज़ाद रही।जिस समय शैव और वैष्णव सम्प्रदाय आपस में लड़ कर मर मिट रहे थे,उस दौर में भी काशी ने अपने बाहें तुलसी के लिए फैलाए रखी।शैव का गढ़ काशी में बैठकर ही तो तुलसी रामचरित मानस लिखते हैं।यह काशी का ही दिल तो है जो तुलसी में खुशबू बनकर महकता है।जब जाति वाद पूरे भारत को जकड़ रहा था तब वह काशी ही तो थी जिसने रविदास को गले लगाकर सन्त रविदास बना दिया।काशी ने हर दौर में टूटते समाज को जोड़कर रखा।गंगा की तलहटी से निकली मांटी से बिखरते दिलों को जोड़ा तो अपने ही पानी से उसमे तरावट डाली।
गंगा के अगर हर घाट को देखें तो हरघाट की अपनी एक कहानी है।उस कहानी में उस घाट से जुड़ा एक इतिहास है।उस इतिहास छिपे हज़ारों किरदार हैं।यह घाट कल की तो कहानियां समेटे ही हैं बल्कि रोज़ एक नई कहानी गढ़ रहें हैं।तुलसी की रामायण से आज के साहित्य तक के कितने क़िस्से अस्सी घाट पर उतराते रहते हैं। मणिकर्णिका घाट से मुक्ति मार्ग खोलने वाला यह काशी जन्म से मृत्यु के बाद के चक्र को भी सम्भालता ही है।
पूरा काशी घूमिए तब देखिये भारत की सभी रियासतों के महल,कोठी,भवन वहाँ बिखरे पड़े हैं।हर रजवाड़े का कोई न कोई अँश काशी में मौजूद है।यह काशी जन्म,विवाह,मृत्यु,वैधव्य सबको जगह देने वाला है।देश भर से आई विधवा महिलाओं का शांतिस्थल भी तो अपना काशी ही है।
काशी एकमात्र ऐसी जगह है भारत की जिसमे पूरा भारत समाहित है।यहाँ की स्थापत्य कला में पूरे भारत की स्थापत्य कलाएँ बिखरी पड़ी हैं।यहाँ दक्षिण के मन्दिर हों या ब्राह्मण से लेकर राजस्थान,कश्मीर समेत पूरे भारत की भवन निर्माण शैली मिल जाएगी।
एक ओर जहाँ काशी में भक्ति काल के कवियों,लेखकों का जमावड़ा है तो दूसरी ओर यह घोर वामपंथी लेखकों की आरामगाह भी है।शायद ही कोई दूसरा शहर हो जहाँ मन्दिर के द्वार किसी बिस्मिल्ला खान की आवाज़ से खुलते हों।संकटमोचन मन्दिर आज भी भारत रत्न बिस्मिल्ला खान की शहनाई को नही भूला है।पता नही संकटमोचक बिस्मिल्ला को जगाते थे या संकट मोचक को बिस्मिल्ला खान उठाते,अजब रिश्तों की गवाह है यह काशी।
काशी का ज़िक्र आए और जुलाहे उससे छूट जाएँ तो यह काशी के साथ अन्याय ही तो होगा।इसी काशी की सरहद पर बैठ जब कोई जुलाहा साड़ी बुनता है तो उसे काशी ही तो पहनता है।इस काशी की बुनावट सारी दुनिया साड़ी की शक्ल में पहनती है।सनातन धर्म और संस्कृति को जीती हुई काशी खुद में बुद्ध को भी तो समेटे है।गौतम बुद्ध का ज़िक्र बिना काशी अधूरा है और काशी भी बिन उनके अधूरी है।काशी के उन प्रकाशन गृहों को भी खंगालना चाहिए जो साहित्य को जीवित करते रहे हैं।कंठस्त परम्परा से लिपियों के कागज़ में उतरने तक के हर समय को काशी ने जिया है।गुरु कुल से लेकर काशी विद्यापीठ और काशी विश्विद्यालय तक का सफ़र भी तो काशी ने ख़ामोशी से तय किया है।भारत की प्राचीन सभ्यता का उत्कृष्ट नमूना है हमारा काशी।जिस तरह माँ गंगा हर आने जाने वालों के पाप धोकर उन्हें पवित्र करती रही हैं ठीक उसी तरह काशी हर युग को,हर शासन को,हर धर्म को,हर जाति, वर्ग,विचार को खुद में समेटकर पवित्र करता रहा है।दुनिया में सब शहर मिटते बिखरते रहे मगर यह काशी है जो सबको जोड़कर अपने मूल स्वरुप के साथ वर्तमान को जोड़ता आगे बढ़ता रहा।यह काशी एक बार देखने वाली जगह नही है, इसे बार बार देखिये,इसमें छुपी संस्कृति की परतो को महसूस कीजिये,काशी की गलियों में बिखरे संगीत,साहित्य,नृत्य सबको देखिये,यक़ीन जानिये यह काशी आपको बार बार चमत्कृत करेगी।
कुछ किस्से हमारे जिस्म के साथ दफ़न हो जाएँगे .मेरे जाने के बाद सिर्फ वही रह जाएगा जो दिमाग की खुराफात ने उपजा कर शब्दों में ढाला था.इसलिए जरूरी हो जाता है दिमाग में चलने वाली इन आम से ख़ास खुराफातों को कहीं न कहीं उकेर दिया जाए.अब हम पत्थरों पर शिलालेख लिख नही सकते.जानवरों की खालों,पेड़ की छालों या खंडहर की दीवारों पर कोई अभिलेख लिख नही सकते तो यहाँ आ गए.ब्लोगर पर,अपने दिमाग को दर्ज करवाने....
Monday, November 13, 2017
काशी
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hafeezkidwai
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