मैं मोहब्बत में था,नही नही बल्कि हूँ।उनकी मोहब्बत में,क्योंकि उनके दिल की नरमी ने मेरे दिल को छुआ था।उनके अल्फ़ाज़ ने मेरी रूह पर हाथ धरे।मैं भी इंसान इंसान को बिना फ़र्क देखने लगा।मुझे लगा की चाहे रेत हो या जँगल,चाहे ज़मीन हो या समन्दर सब जगह मोहब्बत से बदलाव हो सकता है।
मैं कभी दोहों में अटका तो कभी दिल से फूटे अल्फाज़ो में गुँथा,कभी ख़िदमत में पैबस्त हो गया।मैं ज़िन्दगी के हर रँग को सिर्फ आपकी खुशबू से पहचान पाया।दावे से कहूँगा की अगर आपके मानने वालों ने आपकी ज़िन्दगी और फलसफे को छुआ होता तो आपके किरदार की ताक़त उन्हें हर जगह हर हिस्से में पहुँचा देता।
मैं सिंधु के पानी को छूना चाहता हूँ।मैं उस माटी को चूमना चाहता हूँ।मैं उन दोहों को ज़िन्दगी बना देना चाहता हूँ जो मेरे हाँ मेरे नानक के होंटो से निकले हैं।
कोई गुरु यूँहीं नही हो जाता।कोई गुरु बड़ी बड़ी पी आर एजेंसी से नही बन जाता।गुरु तो दिल से होता है।जो सबको सुनता है।गले से लगाता है।समझाता है।पुचकारता है।मनाता है।तभी तो गुरु होता है।गुरु नानक होता है।
अभी कहता हूँ आज गुरु की पैदाइश में लंगर बाटो या न बाटो,बस गुरु की ज़िन्दगी को अपनी ज़िन्दगी में उतारो।गुरु के दिल के इतनी मोहब्बत को उतारो।उतनी तक़लीफ़ को बर्दाश्त करो।गुरु के लिखे,सिर्फ गुरु के लिखे हर लफ़्ज़ को पढ़ो।समझो और ज़िन्दगी में उतारो।
मेरे नानक का दिल जिस दिन तुम्हारे दिल तक पहुँच गया,तुम्हारे चेहरे में चमक आ जाएगी।तुम्हारे लफ़्ज़ दिलों को झकझोरने लगेंगे।मेरे नानक को महसूस तो करो।यह भूमि नानक की वजह से ही महकी है।नानक के लफ़्ज़ और किरदार ही इस देश की ज़रूरत है।नानक हमेशा से ज़्यादा अब ज़रूरी हैं।हम सबमें थोड़े थोड़े नानक हो जाएं तो यह माटी महक उठे।नानक सुन लो।बस आ जाओ।गुरु ग्रन्थ साहिब से निकल कर, हमे इंसान बना दो।मेरे नानक।
जगत में देखो प्रीत,
अपने ही सुखसों सब लागे,क्या दारा क्या मीत।।
नानक भव जल पारपै जो जो गावैं प्रभु के गीत।
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