Thursday, September 27, 2018

बचा लो

मस्जिद की काई लगी सफ़ेद दीवार के सामने खड़ा मैं उस तारीख़ को देख रहा था जब यह बनाई गई होगी ।उस ईंट में लगे हाथ को महसूस कर रहा था जिसने इन्हें चुना होगा । मैं दीवार की तरफ़ खड़ा अपने दरकते वजूद से लड़ रहा था और सवाल कर रहा था,बताओ की मैं किससे लड़ूं तुम्हारी इस फीकी बासी सूरत के लिए ।

बताओ काफिरों से लड़ूं ।या यहूदियों से लड़ूं,या फिर ईसाईयों से लड़ूं,या हिंदुओं से लड़ूं ।तुम बताओ अपनी शानदार तारीख़ के गिरते खण्डहर को बचाने के लिए कादियानी से लड़ूं ।या शिया से लड़ूं ।या सुन्नी से लड़ूं । या बोहरा से लड़ूं ।या वहाबी से लड़ूं ।बताओ देवबन्दी से लड़ूं या बरेलवी से लड़ूं ।या औरत से लड़ूं ।या समलैंगिक से लड़ूं ।नास्तिक से लड़ूं तो कहो आस्तिक से लड़ूं ।

तभी गुद्दी पर एक झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ता है और आवाज़ आती है । कमबख्त कापी क़लम किताब से लड़ो ।पढ़ना लिखना है नही ।फ़ौरन ही दूसरा हाथ गाल पर पड़ता है और मस्जिद की काई हमारे गालों पर उतर आती है ।कान खोलकर सुनलो अगर आज फिर इन वाहियात बातों के लिए स्कूल नही गए तो इसी मस्जिद की तारीख़ी नीव के नीचे गाड़ देंगे ..और इस तरह एक क्रन्तिकारी विचारक कोर्स की किताबों में डुबो कर मार दिया गया ।

दुनिया की सबसे शानदार लैब में से एक में खड़ा जब वह माइग्रेन की दवा खोजकर मुस्कुराता हुआ निकला,दुनिया ने उस साइंटिस्ट के सामने पलकें झुका दीं, तब एहसास हुआ की अगर वह थप्पड़ सही वक़्त पर न पड़ा होता तो...

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