Thursday, September 6, 2018

सतरंगी कुदरत

आसमान और ज़मीन को पूरी तरह देखने के बाद मैंने ईश्वर से कहा की आपकी।पूरी सृष्टि को जान लिया है मैंने ।मैं चाँद के घूमने और सूरज के टिके रहने को जान गया हूँ ।मैं पाताल में और आकाश में बराबर की हनक रखने लगा हूँ ।हे ईश्वर,मैं तुम्हारे सिंघासन के इर्द गिर्द बिखरे कण कण को जान चुका हूँ ।
आसपास खड़े ईश्वर के लोग मुझपर हँसने लगे ।ईश्वर भी ठहाके मारकर हँसने लगे ।तब एक स्वर में सब बोले यह जो ब्रह्माण्ड है, यह जो क़ुदरत है, यह जो ईश्वर है, इसका अभी तुम सूई की नोक के बराबर ही जान पाए हो ।अभी से यह ग़ुरूर,अभी से यह सुर्ख़ आँखे,अभी से यह सर उठाता तमतमाया चेहरा,जाओ और अभी हज़ारों लाखों नस्लों तक इंतज़ार करो समझने के लिए की कुदरत है क्या।

मैं मुस्कुराया,ईश्वर ने सवालिया निगह डाली मुझपर तो मैं बोल उठा ।दोस्त,ओह सॉरी हे ईश्वर,नीचे ज़मीन पर जो आपके सिपाही मुस्तैद हैं, वह तो केवल एक ही किताब से कुदरत की सारी गुत्थी खोलते रहते हैं ।यहीं ज़मीन पर आग के चारो और डोरा बाँधे बैठे लोग तो आपको चन्द शब्दों में समेट कहते हैं की उन्होंने प्रकृति को जान लिया ।

यह अजीब अजीब हुलिया वाले आपके सिपाही कहते हैं की वह कुदरत को जानते हैं, तभी तो वह कुदरत के खिलाफ,अप्राकृतिक व्यवहार को समझकर फैसला देते हैं ।हे ईश्वर यह बताएँ,जो लोग अभी सूई की नोक के बराबर ही कुदरत को जाने हैं वह कैसे दावा कर सकते हैं की अपने जीवन का विस्तार,प्रेम,करुणा,विनाश,निर्माण कहाँ कहाँ रोप रखा है ।

हे ईश्वर वह कैसे कह सकते हैं की दो हृदय में प्रेम लिंग देखकर जाग्रत होगा ।यह तो ईश्वर आप खुद हैं जो अप्राकृतिक हैं ।आपको न किसी ने जना है और न जन सकता है ।आप का न कोई माँ बाप है और न हो सकता है ।आपका न कोई पुत्र पुत्री है और न हो सकती है ।इस दृष्टि से तो ईश्वर आप ही अप्राकृतिक हैं ।

ईश्वर मुस्कुराए और बोले,बेचैन मत हो,यह ज़मीन के कण कण में हमने प्रेम पैबस्त किया है तो साथ ही नफ़रत भी बोई है ।लोग अपने व्यवहार से उसे लेकर मेरे नाम से खुद के खेत सीचेंगे ।जो भी उससे पैदा होगा,वह उनका ही होगा ।तुम देखो उन्होंने अपने ही साथ पैदा हुई औरत की कितनी धज्जियां उड़ाई ।औरत को हर अधिकार देने में इन्होंने ख़ून के आँसू रुलाया ।यही लोगों ने औरत को बराबरी के नाम से मेरे ही नामपर गढ़े विधान यानि धर्म से जंज़ीरों को बाँधा ।तुम पलट कर देखो यही धार्मिक लोग औरत के लिए कहते थे की अगर उसे आज़ादी मिली तो वह बदचलन और आवारा हो जाएगी ।बताओ इनके घर की औरतें आज़ाद हैं तो क्या आवारा हो गईं ।

यह लोग कुछ भी करके,कुदरत,ईश्वर,धर्म का नाम लेकर पहले रोकेंगे मगर यह कुदरत है, जिसे चलते जाना है ।यह सारा कूड़ा मेरे तेज़ बहाओ में बह जाएगा बस तुम हर साँस को आज़ाद साँस देने के लिए लड़ना ।इस भरोसे के साथ की कुदरत तुम्हारे ही साथ है ।इन्हें क्या पता हमने सिर्फ आदमी और औरत ही नही बनाए हैं ।यह कुदरत को समझते तो दिलों में उठती मोहब्बत को कब का पकड़ लेते ।इनके दिल सड़े हुए और दिमाग़ बंधे हुए हैं, खूंटो से बंधे ।जाओ और कुदरत की परते खोलो और देखो यह कितना सतरंगी है..

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