जब उसने खूबसूरत दुनिया की तरफ पहला कदम बढ़ाया। तब ही उसकी माँ कभी ना खत्म होने वाला गम देकर अलविदा कह गई।किसी तरह पलने से उसने ज़मीन पर पाँव उतारे।बाप जो घड़ी बनाने में महारत रखता था उसने अपने बेटे का वक़्त बुरा बनाना शुरू किया।12 साल के मासूम बच्चे को रात में सराहने बिठाकर उसने उससे अश्लील साहित्य सुनाने का काम दिया।मासूम मन ऐसे ही घिनौने कीचड़ में फलता रहा।वो मासूम लड़का अब मासूम नही रहा।दुनिया की हर गलाज़त को उसने चखा।
फ़्रांस की गलियों को पैरों से रौंदा।इतना रौंदा की उसमे से विचारों के सोते फूटने लगे।उसने जब भी औरत के जिस्म को छुआ फ़ौरन समानता का वो विचार लिख डाला जो रूहानी था।उसने शराब को हाथ लगाते ही सामाजिकता पर वो लिखा जो अब तक न लिखा था।जुआ खेलते खेलते दुनिया के ढाँचे को लिख डाला।गाली, अक्खड़पन,रूखेपन,गुस्से,निराशा, बीमारियो,ठुकराये जाने के दर्द के साथ एक ऐसी समाज की कल्पना कर डाली जिसने मील के पत्थर का काम किया। उसने पूरे नशे में सरकार का नशा उतार दिया।
बचपन से जवानी तक फूटते असंतोष और विद्रोह में सरकार की यह कल्पना की कि सरकार को किसी व्यक्ति को इतना शक्तिशाली नही होने देना चाहिए की वह किसी नागरिक के जीवन को खरीद सके,और इतना कमज़ोर भी नही रहने देना चाहिए की किसी को अपने को बेचना पड़े।वो लिखता रहा।हर बुरे काम में लिखता रहा।इतना लिखा की उसकी हर कमी उसके लिखे के आगे हार गई।बुराई ने दम तोड़ दिया और उसके विचार ने उड़ना सीख लिया।
पेरिस,जेनेवा की दीवारो से निकल कर उसने दुनिया के कूचे कूचे को छू लिया।दुनिया आज भी उसके विचारों के आगे सर झुकाय खड़ी है।उसका नाम है रूसो।दार्शनिक,राजनैतिक,सामाजिक विचारक रूसो।मेरा दोस्त रूसो।हम जैसों का रूसो जो कहता है हालात चाहे जैसे हों,अतीत कितना ही भयंकर हो,वर्तमान कितना की संघर्ष युक्त हो,पढ़ो और लिखो । पढ़ो अपने लिए,लिखो आने वाली नस्लों के लिए क्योंकि यही रह जाएगा ।
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