Friday, February 8, 2019

प्रेम मीरा फरवरी

राजपूतों का आलीशान दरबार तमाम दरबारियो से सजा और बीच में राजा।राजा के तख़्त के सामने घुंघरुओं में जकड़ी उसकी बहु।पूरे दरबार के सामने आज उसकी बहु की मोहब्बत का इज़हार था।।मोहब्बत में चूर जैसे ही उसने पांव थिरकाय राजसिंघासन काँप गया।तख्त हिलने लगे।दरबारियों ने सर झुका लिए।
वो नाची जी भर नाची सारा राजपाट देखता रह गया।सारे बंधन सारी परम्पराये,लोकलाज,सब हर थिरकन के साथ टूट गई।घुंघरुओं की आवाज़ ने उबल रहे गुस्से पर इश्क़ की गुलाबी छींटे डाल दीं।हज़ारों साल से चली आ रही परम्पराएं उसके पाँव की थिरकन और मदमस्त होकर नाचने में कबकी बिखर गईं।वो मोहब्बत में थी और मोहब्बत कानून से नहीं चलती।उसमे शर्म,हया,लोग क्या सोचेंगे,नहीं चलता।बस ख़ालिस मोहब्बत।उसके नाचने ने हज़ारो साल की बेड़िया तोड़ दी।मोहब्बत को कैद करने की परम्पराएं चिटख गईं।

पूरे राज्य ने आज उसकी मोहब्बत की पुकार को सुना और उसके सामने सर झुका दिया।आज हम और आप मामूली से हैसियत में बगावत नहीं कर पाते और उसने उस दौर में पूरी शान ओ शौकत और राजपाट को ठुकराकर अपनी मोहब्बत का इज़हार किया था।आज मामूली सी हैसियत के बाद भी आप दिल की बात नही कह पाते, हिम्मत से दुनिया के सामने कुछ भी नही कह पाते मगर उसने उस दौर में अपने इश्क़ में अपने ही राज दरबार में नाचकर मोहब्बत का परचम फैलाया था।वोह हिम्मत से लबरेज़ हमारी मीरा थी।उसकी पाक मोहब्बत का जिसमे न कोई लालच थी न कोई फायदा।मीरा का प्यार अपने गिरधर गोपाल के लिए।

मीरा ने उस दौर में हर बेड़िया तोड़ी थीं गिरधर के लिए।मीरा में मोहब्बत थी।मीरा मोहब्बत में थी या कहे मीरा ही मोहब्बत थी या मोहब्बत ही मीरा थी।कृष्ण,मीरा,मोहब्बत सब मिल चुके थे।कुछ भी जुदा ना था।इश्क़ के चबूतरे पर मीरा की छाँव में अगर बढ़ सको तो बढ़ो।जिसे चाहो तो टूटकर चाहो जिसमे हासिल की शर्त न हो।जिसमे नफा नुकसान न हो।जिसमे सवाल जवाब न हो। जिसमे मैं और तुम का फर्क न हो,जहां तुम ही मैं हूँ औऱ मैं ही तुम । बस चाहने,टूटकर चाहने की तड़प हो।इसी को तो कहते हैं इश्क में मीरा होना...

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