पिछले कई सालों से शहर में अनशन की भरमार सी हो गई है।षहर का कोई भी छोटा-बड़ा पार्क नही बचा होगा जहां अनशनोत्सव नही मनाया गया होगा। कोई चैराहा नही बचा होगा जहां देश में परिर्वतन लाने के नारे ना लगे होंगे। धरना तो हम सभी कर जन्मसिद्ध अधिकार है। पापा नाॅनवेज नही खाने देते तो हम धरना देने लगते हैं कि यह हमारे अधिकारो का हनन है। टीचर नम्बर नहीं देती तो उनपर तुष्टीकरण का लेबल लगाकर चैराहों पर सर पटकते फिरते हैं।
अपना तो सारा ज्ञान ही धरनोत्सव और अनशनोत्सव से आया है तभी तो यह तुर्रा है की दुनिया के किसी भी मसले पर अपने आसमानी ख्यालों की उल्टी करनें लगते हैं। यहां अनशन का भी अलग ट्रेंड है गिने चुने एक जैसे लोग बड़ी-बड़ी दाढ़ी घिसा सा कुर्ता और ज़बान एक्सप्रेस ट्रेन जैसी बेचारे स्टेज की शोभा बढ़ाते हैं। कुछ वही पुरानी मोटी-मोटी औरते जिनको शोपीस की तरह बैठाने के लिए खास मिन्नतें की जाती हैं और वह ना नुकार कर आखिर धम्म से स्टेज पर बैठ जाती हैं।
और हाॅं धरना स्थल भरने का टेण्डर भी कुछ अतिउत्साही युवकों को दिया जाता है। उन्हे खास हिदायत दी जाती है कि अपने चाचा के लड़के को भी कह देना उसका अच्छा लिंक है दस पन्द्रह लोग तो ले ही आयेगा।चिल्लम चिल्ली करके धरने का कोरम पूरा किया जाता है।हॅंा एक बात तो और इस धरने में पोस्टर पर बड़ा-बड़ा लाल रंग से छपा होता है‘’विशाल धरना‘‘जबकि बैनर के नीचे वही दो चार घिसे पिटे लोग 23 नम्बर चाय पी रहे होते हैं।
खैर अपना क्या हमें भी शहर के एकाध लोगों नें ताड़ लिया। उनकी पार की नज़रों ने ंहमे राह चलते आसपास के लोगों के कोहनी मारते देख लिया उन्हे लगा यह बन्दा तो उनके काम का है। फौरन ही हमें एक दुबले से लड़के नें एक अनशन पर इन्वाइट कर लिया। हम भी पहुंच गए अनशनकारियों की जन्नत यानि विधान सभा के सामने। एक पिद्दी से नेता या कहें एक्टिविस्ट रुस के शासन पर अपनी ज्ञान की उल्टियां कर रहे थे जबकि उन्हे अपने घर के पास मेनहाल के खुले ढक्कनों की जानकारी भी नही है। इतने में इस विशाल धरने के फाउण्डर मुंह निपोड़कर आए ‘‘आ गए आप। आइये बैठिए अभी आपका नाम पुकरवाते हैं।‘‘अरे वाह मन में ख्याल आ रहा था कि हमें भी लोग सुनना चाहते हैं।लेकिन बोलें काहे पर अनशन किस बात पर है पता ही नहीं है।स्टेज पर विराजमान हस्तियों से पूछा तो जवाब .बस यूं हीं......’’हमें लगा यूंही काहे। मैं सोचता रहा और देखता रहा एक तरफ ’’’यूंही चिल्ला रहे हैं और दूसरी तरफ नवाबों के शहर की आवाम इस जाम से परेशान पसीना बहा रही है।दो चार घण्टे के बाद जब सारे धरनावलम्बी उल्टियां कर चुके तब धरने का आधिकारिक समापन किया गया। हाॅं बीच बीच में जब कोई कैमरा लेकर आ जाता तो यह अपनी पोजि़शन ज़रुर सुधारने लगते हैं। मुंह पर एैसी त्योरियां देते हैं जैसे सारे जहान को सुधारने का इकलौता टेण्डर भगवान नें इन्हीं को दिया है।
हर अनशन से लौटने के बाद यह सोचता हूं वहां गया क्यों था? क्या यह धरना ज़रुरी था? क्या वाकई इन्हें जनता का समर्थन प्राप्त है और इन सवालों का जवाब हमारी किसी भी किताब में नहीं मिलता। हाॅं इसका जवाब तहज़ीब के शहर की आवाम के पास है।
हफीज़ किदवई
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