Tuesday, October 13, 2015

lucknow


पता नहीं इस कद्र मोहब्बत क्यों है इस मिटटी से.शायद यह ज़मीन ज़िन्दगी का फुल पॅकेज देती है .काम,दोस्ती,खान पान ,महफिले और सुकून.जी वही सुकून जो शायद ही किसी शहर के आँगन में मिले.यहाँ तो खँडहर भी रह रह कर आपकी खैरियत पूछते है .मै कोई बात बढ़ा चढ़ा कर नहीं बोल रहा.वाकई लखनऊ की गलिय आपसे ठहाका मरकर हँसते हुए बात करेंगी.बस एक बार उसकी रूह में दाखिल तो होइए.
आपको तमाम लोग मिलेंगे जो लखनऊ को नवाब और कवाब से जोड़ते हुए मिलेंगे.लखनऊ की पहचान इनसे कभी हट भी नहीं सकती .हमें तो इससे इतर देखना  और शहर की रूह में झाकना बेहद पसंद है.चौक की गलियों में घुमे और चांदी  के वरख को पीटती हुई आवाज़े कान  में न जाए तो दिल थम जाएगा.फूल वाली गली की महक अगर मदहोश न करे तो दिमाग बहका सा  जान पड़ता है.ज़रदोज़ी का वोह काम जो बालीवुड के छोटे से बड़े परदे पर दिखता है वही तो हमारे शहर की नक्काशी है.
मौलवीगंज की गलियों की रौनक है ख़ाका भरते हुए बूढ़े लोग.खाका भरते भरते ही मोहल्ले की रूमाना से फलस्तीन और सामने बैठे मुनव्वर से अमेरिका के ओबामा तक पर लम्बी जिरह महफ़िल में जान डाल देती है.अच्छा उन पानदानों का ज़िक्र क्यों न करू जो घर घर में मौजूद है.यह पानदान एक विरासत है जो हजारो रिश्तो को जोड़ने की दास्तान लपेटे है.मछली मोहाल की गलियों में पानदान रखे औरतो के जमावड़े और मसखरे अंदाज़ हर किटी पार्टी को शिकस्त दे सकते है.
पान के बाद जिस एक चीज़ ने शहर को जोड़ा है वो है चाय .चाय की महफ़िल से शायद ही कोई महरूम रहा होगा.गम से ख़ुशी तक लखनऊ की हर धड़कन को अब चाय ही जोडती है.चाय के अड्डो का इस्तेमाल इस शहर ने अच्छे से किया है.नाटको की स्क्रिप्ट हो या फिर जलसों के भाषण या किसी शायर का मिसरा ,सियासत की बाते हो या रियासत के किस्से सबकी इकलौती गवाह है लखनऊ की चायबाज़ी .ढलती शाम में एक कप चाय  हो और गंज में पड़ी बेंच ,विक्टोरियन लाईट में नम नम  ठण्ड के साथ दोस्तो का साथ.यह वो पल होगा जो ख्वाब में सोचे  हुए बेहतरीन पालो में से एक है , जब शहर  आपमें दाखिल हो रहा होता है और आप चाय और ठहाको के साथ उसमे घुल रहे होते है.
लखनऊ को जो सबसे खास बनाती है वो है यहाँ की गंगा जमुनी तहजीब.कुडिया घाट की आरती और टीलेवाली मस्जिद की आजान का मिला जुला जायका शायद ही कही मिले.गोमती नदी एक ही वक़्त में संतो के नहाने और नमाज़ के वजू की गवाह बनती है.हमारा शहर तेज़ी से हांफता भागता घबराया हुआ शहर नहीं है.सुकून से चलने वाला ,ज़िन्दगी का लुत्फ़ लेने वाला शहर है.यहाँ दिन अगर भाग दौड़ में बीतता है तो शाम रौनक से भरी बाजारों में,सेमिनारो में,ग़ज़ल या नाटको की महफ़िल में या फिर शाम की अड्डेबाजी  में.लखनऊ हर उम्र हर तबके के लोगो को पूरा खुलने,महकने और जिंदादिल रहने का भरपूर मौका देता है.यहाँ मुस्कुराने की अनगिनत वजह है बस एक बार लखनऊ को महसूस तो कीजिये .



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