गुज़री रात मैं एक ऐसी जगह था जहाँ सिर्फ बच्चे थे ।अलग अलग रँग,अलग अलग मुल्क़ के मालूम पड़ते थे मगर लाख देखने पर भी उनका मज़हब और ज़ात मालूम नही पड़ता था ।सब खेल रहे थे ।कोई किसी के कान खींचता तो कोई किसी की टाँग ।बड़े से दरख्त की डाल इतनी झुक जा रही थी की बच्चे उनसे खेल सकें मैंने देखा की वहाँ गिद्ध अपनी पीठ पर बच्चों को हवा में कुलांचे भर भर उड़ रहे थे ।कुछ बच्चे मगरमच्छ के दाँतो में उंगलिया फंसा कर गिनतियाँ सीख रहे थे ।हैरत हुई की कुछ भेड़िये अपनी पीठ पर बच्चों को बैठाकर लुका छिपाई खेल रहे थे ।
चील,बिज्जू,लोमड़ी,साँप,बिच्छू सबके साथ बच्चे बड़ी हँसी ख़ुशी खेल रहे थे ।लग रहा था पूरी कुदरत यहाँ बच्चों की मुस्कान के लिए उतर आई थी।की तभी शेर की आवाज़ गूँजी,सारे बच्चे इकट्ठे हो गए। शेर हमारी तरफ पंजा उठाकर उनसे बोला की बच्चों खेलते खेलते उधर मत जाना,उधर इंसान रहते हैं ।
उनसे बचना,जब कोई परेशानी आए तो हममे से किसी को भी बुला लेना मगर इनके नज़दीक़ मत जाना।यह तुम्हारे ख़ून पर जगह जगह ठहाके लगाते हैं क्योंकि तुम्हारा ख़ून उनके मज़हब,उनकी ज़ात,उनके विचार का नही है ।यह तो हम सबको भी मार चुके हैं ।अब यहाँ ख्वाबिस्तान में हम न तुम्हे दोबारा मरने देंगे और न खुद को.....ख्वाबिस्तान के दरवाज़े पर मैं लाचार, बेबस,पूरे जिस्म पर दूसरों का ख़ून मले,एक अदद मुस्कान पाने की ख्वाहिश में दम तोड़ता रहा की ख्वाब टूट गया और वह सारे बच्चे अख़बार में अलग अलग हेडलाइन में सिमट कर मुझपर हँसते रहे...
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