जब हम पर रोज़ नए टैक्स लग रहें हों।हर योजना के लिए जनता पर बोझ लादा जाए।राजनेता खुद की तनख्वाहें,भत्ते दिन दूने रात चौगने बढ़ाएँ।अपने मित्रों के लिए हमारे पसीने की बूंदों से इकट्ठे राजकीय कोष को तीतर बटेर कर दें।तब मुझे बचपन में पढ़ी एक कविता याद आती है।शायद किसी किताब केपहले या दूसरे पन्ने पर थी मगर आज भी हूबहू याद है।यह तमिल की एक प्राचीन कविता है,इसका हिंदी अनुवाद आप भी पढ़ें और हाथी को पहचानने की कोशिश करें।कुछ कविताएँ हज़ारों साल भी सच्ची ही होती हैं-
छोटे खेतों में भी
पके धान की फ़सल
ठीक से काटी जाए और मुँह भर खाई जाए
तो वह बहुत दिन चलेगी,
धान के सौ खेत हों
और अकेला हाथी उनमे पहुँच जाए
और खाने लगे
तो जितना मुँह में जाएगा
उससे ज़्यादा पैरों से रौंदा जाएगा
ऐसे ही बुद्धिमान राजा
प्रजा से उचित कर ठीक ढंग से वसूले
तो उसे करोणों की आय होगी
और देश समृद्ध होगा
किन्तु यदि
राजा अय्याश और अविवेकी हो
चाटुकारों,
वाचाल मंत्रियों,
लोभी मित्रों से घिरा हो
अपनी उत्पीड़ित प्रजा से
आए दिन मनमानी उगाही करना चाहे,
करों के बोझ लादे
तो धान केखेतों में हाथी की तरह
न तो उसे भरपूर प्राप्ति होगी
न देश समृद्ध हो पाएगा।।।।।
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