यह पढ़कर हमे जी भर कोस सकते हैं, मैं इस कोसने का स्वागत करता हूँ।देखिये एक्टिविज़्म दो तरह का होता है।एक गाँधी जी वाला और आजकल हम सब वाला।हो सकता है जो हम लिख रहें यह हमारे लोगों को तक़लीफ़ दे मगर करें तो क्या करें,इस एक्टिविज़्म से ज़ख्म नासूर जो बनता जा रहा।
गाँधी जी के सामने जब कोई दंगो,हिँसा,नफ़रत से पीड़ित आता था तो वह उससे कहते थे की जाओ और उसी सम्प्रदाय के पीड़ित की मदद करो।जाओ बदहाल परेशान की मदद करो।राहत शिविरों में जाओ और पानी पिलाओ,दवा दो।
अब हमारा एक्टिविज़्म देखिये।हम पीड़ित को ले लेकर देशभर घुमाते हैं।उसके बैनर लगाते हैं।उसके पीड़ित के ज़ुल्म के पर्चे बाँटते हैं।उसके ज़ख्म को मार्मिक या गुस्से दोनों से लोगों को बतलाते हैं।
गाँधी के एक्टिविज़्म का हासिल यह था की दुनिया के सबसे बड़े मानव पलायन और दंगो के बावजूद हमारे देश ने उन ज़ख्मो को भरकर आगे बढ़ने का संकल्प लिया और सभी भाई भाई बनकर बढ़ते गए।हमारे एक्टिविज़्म का हासिल यह है की जो एक दूसरे से नफ़रत,गुस्सा,डर था वह कई गुना बढ़कर नासूर बन गया।
मेरी बात से गुस्सा हो सकते हैं, क्योंकि आजके एक्टिविज़्म में यह भी तो है की कोई उसके तरीकों की आलोचना करे तो यह तिलमिला उठती है।जबकि गाँधी जी के सामने उनकी आलोचना होती रहती और यह सूत के धागों में लिपटी चादर बनकर किसी पीड़ित के ज़ख्मो को ढक कर उसे दूसरो की सेवा करने लायक बना देती।
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