जब हर तरफ ईश्वर का भय पैदा किया जा रहा था।तरह तरह से लोग ख़ुदा से डरा रहे थे।नाज़ुक दिल इंसान ख़ुदा और रसूल से डर कर ज़िन्दगी गुज़ार रहे थे।एक ख़ौफ़ था की कहीं कुछ ऐसा न हो जाए की ख़ुदा या रसूल की शान में गुस्ताखी न हो जाए।
तब हाँ यानि उस डर के साय में उन्होंने इश्क़ की एक लकीर खींची।डर और इबादत की गलियों में नँगे पाँव चल कर कहा की ए इंसानों ख़ुदा से डरने की ज़रूरत नही है।ख़ुदा के नज़दीक़ जाओ और देखो उनमे झाँक कर, उनमे उतर कर, उनमे डूब कर।यह जो तुम्हारा ख़ुदा है उसके सीने में अथाह इश्क़ है।
रेत के मैदानों में खड़े होकर उसने ख़ुदा से मोहब्बत का एलान किया।पुरानी बनी सारी बंदिशे टूटने लगी।डर की ज़ंज़ीर चिटखने लगीं।जो दिल डर से किसी कोने में सिमटे थे,वोह इश्क़ में खिलकर बहार ले आए।राबिया बसरी ने पहली बार बताया की इंसान क्या चीज़ है इश्क़ हो तो ख़ुदा भी उसकी ज़द से बाहर नही।
राबिया बसरी ने तब ख़ुदा से इश्क़ का एलान किया जब लोग अपने दिलों में इंसान से इंसान का दिल कहने को हिचकते थे।राबिया ने रसूल के दिल की नरमी पर हाथ रखा।रसूल की मोहब्बत का एहसास कराया।रसूल के दिल से निकली मोहब्बत की छाँव में हर एक को समेटलिया।
राबिया का इश्क़ इस क़दर परवान चढ़ा की इश्क़ ए इलाही की वोह पहली औरत बन गईं।दुनिया डर के ऊपर मोहब्बत को महसूस करने लगी।राबिया के चेहरे से दमकती गुलाबी रौशनी गवाही थी की ख़ुदा ने उसकी ज़िद के साथ मोहब्बत में होना ही बेहतर समझा।
अगर इश्क़ हो,तो करो।किससे, कब,कहाँ,क्यों नही बस इश्क़ होना चाहिए।इतना टूटकर चाहो की हर पन्ने में तुम्हारे किस्से हों।मेरे साथ चलो तो मैं तुम्हे कभी मैदान में मीरा से मिलवाऊं तो कभी रेत में राबिया से,मोहब्बत से कोई ज़मीन छूटी ही नही।
राबिया ने मोहब्बत की जो मिसाल रखी वोह उसे सूफ़िज़्म की सबसे ऊँची चौखट तक ले गया।राबिया ने करके दिखा दिया की इश्क़ सबसे पहले डर को खत्म करता है।जिस दिन डर पर जीत लिए उसी दिन इश्क़ की पहली कश्ती,इश्क़ के समन्दर में निकल गई।उठो और टूटकर चाहो,यह दुनिया मोहब्बत पर सवाल भले करे मगर इनसे भाग कर नही जा सकती।क्योंकि इसकी बुनियाद ही मोहब्बत है।यही तो है इश्क़ में राबिया होना।
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