Wednesday, June 20, 2018

कान्हा और नन्दी

नंदी खामोश खड़े कान्हा को देख रहे थे ।बड़ी बड़ी आँखों से आसूँ बून्द बून्द बनकर ज़मीन पर गिरते,जैसे ही आँसू ज़मीन पर गिरते,ज़मीन ने छन्न सी आवाज़ आती ।जैसे किसी जलते हुए तवे पर किसी ने पानी छिड़क दिया हो ।कान्हा से नन्दी की यह मायूस सूरत देखी नही जा रही थी ।बाँसुरी को कमर में लगा वह नन्दी के सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं,"नन्दी,क्या बात है जो इतने बेचैन हो"
नन्दी ने कान्हा के हाथों पर अपनी ज़ुबान फेरते हुए कहा,आपसे छुपा ही क्या है ।आपको मेरे ही क्या,सबके दिलों का हाल पता है।

कान्हा मुस्कुराए और बोले मुझे मालूम है मगर तुम यूँ रो मत,तुम तो मानव की ख़ुशी के लिए ख़ुद को मिटा देने वाला जीव हो ।भला तुम अपने कुल के जीवों के नामपर पृथ्वी पर होने वाली मानव की हत्या कैसे बर्दाश्त कर सकते हो ।तुम्हारा आजका दर्द मेरे लिए भी पहाड़ जैसा है ।
नन्दी ने कहा,जब आप उस गाय की टेक लगाए बाँसुरी बजा रहे थे,तो मैं अपने भोले भाले शिव को उनके ध्यान से बिना जगाए आपके पास आ गया, की कहीं मेरे आँसू मेरे शिव ने देख लिए तो यह धरती फट पड़ेगी ।हे कान्हा बाँसुरी से ऐसा संगीत निकालिये की आपको मानने वालों के दिल नरम हो जाएँ ।वह वैसे ही हो जाएँ जैसे होने का उनका आवरण है ।वह मानव को हमारे और आपकी भक्त गायों के नामपर क़त्लेआम न करें।
कान्हा मुस्कुराए,नादान नन्दी,भला असुर हृदय,जिसको रक्त का स्वाद लग गया हो,उसे तुम्हारे प्रेम के अर्थ समझ भी आएँगे।आकाश से पाताल तक सबको पता है निर्दोष की हत्या की क्षमा कहीं भी नही है ।

हे नन्दी,निर्दोष मानव की हत्या उस समाज तक को दण्डित करवाएगी,जो इसपर मौन है ।तुम परेशान मत हो,मुझे पता है पृथ्वी पर धर्म के नामपर की जा रही हत्या तुम्हे विचलित कर रहीं हैं ।तुम धैर्य रखो और शिव जी के पास जाओ,अगर उन्हें यह पाप और तुम्हारे बेचैन दिल का हाल पता चला तो धरती ऐसे हिलेगी की धर्म के नामपर खड़ा हर पापी अपने लिए कम कष्ट की मृत्यु माँगेगा ।जाओ नन्दी,जब तक कान्हा है, उससे ज़्यादा गौ की सेवा और प्रेम करने वाला भला कौन है तीनो लोकों में,जाओ मैं अपनी गौओं को मानव की हत्या की वजह नही बनने दूँगा ।

मेरी गाय मेरे प्रेम और सेवा का प्रतीक हैं अगर इनके नाम से हत्याएँ होने लगेंगी तो धर्म बचेगा ही कहाँ ।कान्हा ने चीख़ कर कहा,मेरे बनाए मानव की हत्या से बड़ा अधर्म तीनों लोको में कोई है ही नही ।जिन्हें हमसे मोहब्बत है, वह अपने हाथों में हत्या का रक्त लगने न दें वरना मानव  रक्त का हर धब्बा उनको मेरे सामने पापी और अधर्मी होने का सबूत देगा,जिसका दण्ड तय है ।कान्हा की नरम से सख़्त होती आवाज़ से मेरी नींद खुल गई ।तपती दोपहरी में बरगद के नीचे लेटा मैं ख्वाब में कान्हा और बेचैन नन्दी को देख इंसान बन गया,जब जागा तो आँख में आँसू और बगल में मोर का पँख पड़ा हुआ था ....

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