Monday, July 16, 2018

फीफा वर्डकप

फुटबॉल का ख़ुमार उतर गया हो,क्रोएशिया की प्रेसिडेंट को जीभर देख लिया हो,फ़्रांस के राष्ट्रपति बच्चों की तरह ख़ुशी से उछल उछल अपने खिलाड़ियों को गले लगाता वह पल धुंधला गया हो तो एक बार अपना गिरेहबान भी झाँक लें ।देख लीजिये लखनऊ जैसे शहर के बराबर देश दुनिया के सबसे बड़े खेल के फ़ाइनल में था और हम एक सौ पैंतीस करोड़ लोग थे,वह उनकी शुरआत से ही नदारद थे ।

हाँ अगर कोई विश्वकप हिन्दू-मुस्लिम करने का होता तो यक़ीनन हमे कोई पछाड़ नही सकता था ।या यही फुटबॉल केवल मुँह से खेला जाता तब भी हमारा कोई सानी नही होता ।क्रोएशिया के जो बच्चे मैदान में अपने मुल्क़ का झण्डा सबसे ऊपर ले जा पाए,वह भी हमारे बच्चों से वाट्सएप पर नफ़रत फैलाने में बुरी तरह हार जाते ।क्रोएशिया के खिलाड़ी एक दूसरे का हाथ पकड़ अपने मुल्क़ का सर जिस तेज़ी से ऊपर ले गए,हमारे बच्चे उतनी ही तेज़ी से एक दूसरे का हाथ तोड़कर नीचे आए हैं ।
हाँलाकि बच्चों को क्या कहना,यहाँ तो बड़ो से ही उन्होंने नफ़रत सीखी है ।मुल्क़ को खेल,विज्ञानं में आगे ले जाने की जगह धर्म में रँगने की शाखाओं में बड़ो नेही तो भेजा है ।
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी पर राज करने वाली सरकार के पास भी कोई प्लान नही की उसका झण्डा भी फुटबॉल जैसे महान विश्वकप में भागीदारी कर सके।विश्व के नक्शे पर जिस देश को लेंस लेकर ढूंढना पड़े,उसकी राष्ट्रपति अपने बच्चों को बिना फ़र्क किये पलपल हौंसला देती रही ।उनको ऐसा माहौल दिया की दुनिया ने इस देश को पलकों पर बैठा लिया ।

एक हम हैं, जो न जाने कब विश्व गुरु थे,उसी नशे को सूँघ सूँघ एक दूसरे को खत्म कर देने पर आमादा हैं ।हमारे लीडर भी उन्हें ही पसन्द करते हैं जो जीतने नफ़रत से सने हुए हैं ।वह भी हौंसला घर को जलाने वालों को देते हैं, बनाने वालों को नही ।
क्रोएशिया के लिए ख़ुशी का पल एशिया कउन तमाम देशों के लिए गैरत का पल होना चाहिए था,जो उसके कई सौ गुना आबादी को ढो तो रहें हैं मगर उनमे से एक ढंग का खिलाड़ी नही बना पा रहें ।
हमसे पचासों साल बाद जन्म छोटा सा देश अपने सारे भेद मिटाकर मज़बूती से फीफा की चमकती ट्रॉफी तक का सफ़र कर गया और हम एक दूसरे का कुर्ता नोचते हुए धार्मिक योद्धा ही बनकर रह गए ।वह भीड़ बनकर ट्रॉफी को चूम रहे थे और हम भीड़ बनकर किसी एक को कुचलकर मार रहे थे ।वह एक साथ मोहब्बत से लबरेज़ अपनी राष्ट्रपति के साथ खुशियों के चरम पर थे और हम अपने शीर्ष नेतृत्व के अल्फ़ाज़ों से हिन्दू मुसलमान में बंटना सीख रहे थे।

हो सकता है, यह लफ़्ज़ बुरे लगें, आप हमे ही उल्टा सीधा कहें,मगर यह भी तो सच है बेगैरती में भी हमारा कोई सानी नही है ।मुझे बचपन में स्कूल याद हैं, तब उसमे खेल की पूरी किट होती थी ।हमारे टीचर हमे खेलना सिखाते थे,शायद आज हमारे बीच से कोई ढंग का फुटबॉल खिलाड़ी बन भी जाता मगर देश में एक दौर वह भी आया ।जब धर्म के तम्बू तान दिए गए ।क्या स्कूल क्या घर सब जगह से सब खत्म,बस एक ही नारा हवा में तैरता चला गया और वह सारी सुविधाएं तहस नहस हो गई ।सरकारों को भी समझ आ गया इन्हें बस धर्म का शरबत दो,इन्हें और कुछ नही चाहिए ।आज जाकर देख लीजिये अगर एक भी स्कूल में ढंग का खेल का एक भी सामान हो,हाँ मैं दावे से कहूँगा इसके अलावा टीचर हों या बच्चे,वह वाट्सएप ग्रुप में नफ़रत और बाँटने वाले मैसेज ही फॉरवर्ड कर रहे होंगे ।फुटबॉल का फॉरवर्ड भूलकर नफ़रत के फॉरवर्ड में लगे यह बच्चे किसी और देश के नही हैं, हमारे ही हैं, मगर हमे इनकी भी फ़िक्र नही ।

अभी वक़्त हैं, धार्मिक नफ़रत के साथ खेलने की जगह मैदानों में अच्छे खेल खेलिए ।मैदानों को धर्म से पाटने की जगह खेल के लिए छोड़िये ।वरना दुनिया के छोटेछोटे देश फीफा अवार्ड कितनी बार मिला,इसकी गिनती गिनेंगे और हम,हाँ हम कितनी लाशें गिरी,कितने घर जले,कितने ब्लात्कारहुए,कितने के हाथ काटे,इसका ही स्कोर गिनेंगे ।बुरा लगे तो लगे मगर तक़लीफ़ का वक़्त है की इतने शानदार,रोमांचक, ऐतिहासिक और भव्य फीफा वर्डकप में हमारी राई बराबर मुल्क़ शिखर पर था और सवा सौ करोण भीड़ वाले हम सिर्फ ताली बजा रहे थे ।सम्भल जाइये उससे पहले की सब खत्म हो...

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