Friday, July 13, 2018

कैंसर कैंसर ही है

उसके हाथ में लगा ज़ख्म पककर मवाद के साथ बजबजा रहा था ।किसी ने कहा,यह ज़ख्म नासूर बन जाएगा,वह नाराज़ हो गए की इसे ज़ख्म क्यों कहा,नासूर क्यों कहा ।
उनके घर के आपस के झगड़े में सबके कपड़े नुच गए,पूरे नँगे वह एक दूसरे की खाल खींच रहे थे,किसी ने कहा भाई नँगे हो चुके हो अब तो रुक जाए,वह नाराज़ हो गए की नँगे क्यों कहा ।

उनके मुँह में उभरा छाला,बड़ा होकर फूटकर बहने लगा ।दर्द में वह तड़पते रहे मगर जैसे ही डॉक्टर ने कहा,यह कैंसर अब सही नही होगा,वह नाराज़ हो गए की कैंसर क्यों कहा ।

उनका बच्चा चार चार विषयों में फेल होकर उनके ही दबाव के फंदे में झूलकर आत्महत्या कर लेता है ।जैसे ही पड़ोसी उसकी मौत में फ़ेल शब्द को जोड़ते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की फ़ेल क्यों कहा ।

उनका लड़का तमाम लड़कियों को जँगल में घसीटकर बलात्कार करता है ।पकड़ा जाता है ।मारा जाता है ।सलाखों में पहुँचता है ।जैसे लोग उसे बलात्कारी कहते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की बलात्कारी क्यों कहा ।

नौकरी दिलाने के नाम से लेकर ड्राइविंग लाइसेंस या राशन कार्ड बनवाने के भी पैसे ले लेते हैं ।लोग उन्हें दलाल कहते हैं, वह नाराज़ हो जाते हैं की दलाल क्यों कहा ।

भीड़ में इक्ट्ठे होकर किसी एक को खींचकर मार देते हैं ।उसके ख़ून की छीटें मुँह पर मलते हैं ।जश्न मनाते हैं ।हर हत्यारे को मालाओं से लाद देते हैं ।जब उन्हें वहशी कहा जाता है तब,वह नाराज़ हो जाते हैं की वहशी क्यों कहा ।

आर्मी के होते हुए खुद हथियार रखेंगे,खुद ट्रेनिंग लेंगे,लोगों को मरने मारने के लिए उक्साएंगे,अपने विचारों को लाठी डंडे तलवार बंदूख बम और भीड़ के ज़ोर पर थोपेंगे ।कोई उन्हें आतँकी कह देगा तब,वह नाराज़ हो जाएँगे की आतँकी क्यों कहा ।

यह अजीब दुनिया के अजीब लोग हैं ।जो हैं,वही सुनने पर बिलख पड़ते हैं ।ख़ून से सने हाथों पर भी खुद को महात्मा कहलवाना चाहते हैं ।ऊसर को उपजाओ कहलवाना चाहते हैं ।यह बड़े अजीब लोग काँच बनकर हीरा दिखना चाहते हैं ।यह झूठे होकर सच्चे बनना चाहते हैं ।अधर्मी होकर धर्मात्मा बनने चाहते हैं ।इनके बीच वही ज़िंदा रहेगा जो चुप रहकर हाँ में हाँ कहेगा ।हर वह मारा जाएगा,जिसकी ज़बान झूठ बोलने पर एँठेगी ।जो मरकर भी नँगे को नँगा ही कहेगा ।

अभी वक़्त हैं, जिसे जो दिखना है, वह बने,वही स्वीकार करे ।लोग तो एक बार दबाव में सब मान लेंगे मगर कर्मो का फल नस्लें भुगतेंगी ।यह आज़माई हुई बात है ।वक़्त रहते कैंसर को कैंसर कहना सीख लें,तभी ईलाज सम्भव है, तभी हालत बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है, वरना नफ़रत का कैंसर हम सबको दर्दनाक मौत देगा...

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