तुम्हे पता है जब मैं पुरानी तस्वीरें देखता हूँ तो क्या सोचता हूँ ।उस तस्वीर में उलझे इतिहास पर कम ही नज़र जाती है । मैं अपनी इन तस्वीरों में पहने कपड़ों को देखता हूँ ।उन जूतों को देखता हूँ जो तस्वीर में मेरे पाँव को जकड़े हैं ।मैं उस शर्ट के रेशे रेशे को ज़ूम करके देखता हूँ जो उन तस्वीरों में मेरे बदन को ढके हुए है ।
सच कहूँ तो मैं खोजने लगता हूँ की वह शर्ट कहाँ गई जो फला अनशन में पहनी थी ।वह कुर्ता कहाँ गया जो उस धरने में पहना था ।वह जूता कहाँ गया जो पदयात्रा में सबसे ज़्यादा काम आया । मैं तस्वीर में उन्हें पहचानता हूँ फिर उसको ख़ूब याद करता हूँ ।
तब ध्यान आता है की जो शर्ट मैंने उपवास में पहनी थी वह कई साल तो चली,पिछले साल उसका कॉलर उधड़ कर बाहर आया,बटन टूटे और कंधो पर से वह जब फटने लगी तभी तो उसको फाड़कर चार रुमाल बनाए थे ।खादी अंतिम समय तक काम में ऐसे ही तो आती है ।
तीन या चार उपवास में एक ही भूरा कुर्ता पहना तो याद आया की दो साल पहले एक मित्र उसे हमे यह फ़लसफ़ा पहनाकर उठा ले गए की वह इस संघर्ष की निशानी को अपने पास रखना चाहते हैं, जबकि हमे उनकी हरकतों और चरित्र से सौ फीसद यक़ीन है की या तो मेरा वह कुर्ता कार साफ़ करते करते खत्म हुआ होगा या पोछा बनाकर उसे डुबो डुबो कर उनकी पत्नी ने निपटाया होगा ।
एक जूता था जो हमारे वज़न से कुछ ही कम रहा होगा,ऐसा हमे पहनने पर महसूस होता था ।कश्मीर की बर्फ़ हो या राजस्थान की रेत ,शिमला की सर्दी या सूरत की गर्मी सबमें वह मेरे पाँव में ही रहा ।इसे पहनकर बहुत लम्बी लम्बी पदयात्राएं की और वह हर यात्रा के बाद हल्का हल्का मरता रहा ।काली पोलिश घिसकर अंदर की सफ़ेदी दिखाने लगी ।अब याद करता हूँ की वह जूता कहाँ है तो याद ही नही आता ।सैकड़ों तस्वीरों में मौजूद मेरा वह बूट नुमा वज़नी जूता मेरे ज़हन में तो है मगर नज़र में नही ।
ख़ूब याद करता हूँ तब ध्यान आता है की एक भट्टे का मज़दूर वह लिए गया था,उसे पहनकर वह भट्टे पर मौजूद आग और गर्मी से बच सकता था ।यात्राओं में पहना वह जूता गीली मिटटी और दहकते कोयले में बहुत पहले ही दम तोड़ चुका होगा ।
यह सब क्यों लिख रहा हूँ,सिर्फ इसलिए की जब अपनी तस्वीर देखिये तो हर उस चीज़ को गौर से देखिये जो आपको बदल रही होगी ।अपने जिस्म के काम आई हर बेजान चीज़ को देखिये की उसने कितना सफ़र किया और कैसे खत्म हुई ।उस चीज़ को देखिये जिसने आपका बदन छोड़ा तो दम तोड़ा या किसी और के भी काम आई।
बहुत बार बहुत गम्भीर नही होना चाहिए,हल्का चिंतन कीजिये ।यह सब बाते तब भारी हो जाएँगी जब आप वज़नी हो जाएँगे ।गौतम बुद्ध की ओढ़ी चादर अगर आज किसी के पास हो तो लोग लाइन लगकर देखेंगे ।अम्बेडकर के कोट,गाँधी की चादर,नेहरू की शेरवानी,इंदिरा की ख़ून से सनी साड़ी, राजीव के जूते सब अभी भी दर्शन के लिए रखें हैं ।जबकि इनमे मौजूद शरीर और आत्मा कब की जा चुकी है ।तो अपने को ऐसा बनाएँ की आपका रुमाल भी तबर्रुक़ लगे ।तब तक अपने पुराने कपड़ों का इतिहास याद करिये और हंसिए ।
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