Monday, February 10, 2020

गार्गी की लड़कियां

अब चुनाव परिणाम ही अच्छे नहीं लगते,कोई भी जीते । एक हारे हुए समाज मे कोई विजय,कोई पराजय क्या ही प्रभाव डालेगी । एक समाज जो अन्दर से बदल रहा है या सड़ रहा है या सड़ते हुए बदल रहा है, उसपर इन परिणामों की छाँव का उल्लास या रुदन क्या ही देखा जाए ।

जेएनयू की लड़कियों से शुरू होकर जामिया की लड़कियों से होते हुए,आज़मगढ़ की औरतों पर पड़ती लाठियों के साथ गार्गी कॉलेज की लड़कियों के गिरहबान तक पहुँच चुके वहशी,प्रशिक्षित, हिंसक हाथ पर कितनी खामोशी रही है । यह निष्ठुर समाज जो मीडिया के उठाने से निर्भया के वक़्त मोमबत्तियों का ढेर उठा लेता है, वही समाज गार्गी कॉलेज पर मीडिया की खामोशी के साथ इतना खामोश है, जैसे कुछ हुआ ही न हो ,बड़ी मासूमियत से कह देगा,हमे तो पता ही नही क्या हुआ ।

अरे समाज को पहला सवाल तो यही करना चाहिए कि लड़कियों को छेड़ने और अश्लील हरकतों के करने में उनके ईष्ट के नाम के नारे लगाना, उन्हें अपमानित करना है । धर्म को घिनौना खेल बनने से अगर नही रोका और धर्म को हिंसक भीड़ का हथियार बनते हुए देखने से विचलित नही हुए तो बस ठहरे रहिए,आईएसआईएस ने जैसे बर्बादी दिखाई थी,ऐसी ही बर्बादी होगी । हम सबकी यह बातें आज भले समझ न आएँ, मगर जब समझ आएँगी, तब बर्बादी हो चुकी होगी ।

गार्गी कॉलेज की लड़कियों को दिल्ली की और सड़कें घेर लेनी चाहिए,जो समाज सड़ने लगे,उसे भला चलने की ही क्या ज़रूरत । चले तो वह,जो बढ़ना चाहे,जिसे पिछड़ना है, उसे सपाट सड़कों की क्या ही आवश्यकता है । जाओ और लड़कियों की रूह पर छपे अपने लम्पट अश्लील असभ्य क्रूर हिंसक नौजवान लड़कों के अपराधों पर पर्दे डालने का बंदोबस्त करो ।

 महाभारत में एक सभा थी,द्रोपदी सामने थी और चीरहरण हो रहा था,पूरा सिंघासन मौन था,बड़े बड़े शूरवीर खामोश थे,एक से एक ज्ञानी चुप थे,मगर आपको क्या लगता था,यह खामोशी दब जाएगी,नही द्रोपदियों की चीखें हर अहंकार के दरबार को दरकाकर तहस नहस कर देंगी,बस देखना यह है कि कौन द्रौपदी के साथ है और कौन अधर्म के साथ है । जेएनयू ,जामिया समेत गार्गी कॉलेज की हर लड़कियों के पक्ष में खड़ा व्यक्ति ही धर्म के साथ है, बाकी सब अधर्म के साथ हैं, क्योंकि वहशी व्यक्ति अधर्मी ही होता है और इसको संरक्षण देने वाला पापी ।

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