शुरू शुरू में जब धर्म आते हैं, तब समन्दर होते हैं,अपने प्रवर्तक की छाँव में उस धर्म की तमाम खूबियाँ हवा में बिखर रही होती । वह विशाल हृदय के समन्दर हर एक को अपने में समा लेने का हुनर रखते हैं ।
फिर धीरे धीरे यह समन्दर बहकर नदियों में बदल जाते हैं ।उसके बाद यह तालाब में बदलते हैं ।फिर यह नालियों में बदल जाते हैं और एक वक़्त के बाद यह नालियों में सड़ते हुए कीचड़ में बदलकर अपने अंदर की बदबू से हर एक को नाक पर रुमाल रखने को मजबूर कर देते हैं ।
यह भी है की नालियाँ सदैव अपने समुद्र रूप का बखान करती हुई बदबू छोड़ती रहती हैं । वह बोलते हैं की प्राचीनकाल से ही हमारा हृदय विशाल और सहिष्णु रहा है, यह ज़रा कुछ लोगों के चक्कर में हम ख़ून चख भर लेते हैं, वरना हम तो सदैव शाँति प्रिय ही रहें हैं । कोई बोलता मेरा मज़हब तो भाईचारे,त्याग और शांति का परचम है मगर क्या करें विरोध को तो कुचलना ही पड़ता है और यह कहते हुए हर धर्म के लोग खुद के नाली रूप पर चादर ढककर समन्दर होने का झाँसा देते रहते हैं । इनमें से कोई भी समुंदर रूप की खूबियां खुद में नही लाना चाहता बस समंदर रूप पाने के लिए खून बहाने को बेचैन रहता है, वह जानते हैं कि वह अब नाली बन चुके हैं, जिसमें खून बहाकर वह लोटते रहना चाहते हैं, यह सभी जानते हैं कि इनकी नालियों में इनके महान प्रवर्तक कभी नही आएँगे,क्योंकि समुद्र हृदय नालियों में समा भी नही पाएँगे ।
छोटे दिल के बड़े लोग कभी धर्म को बढ़ा नही सकते,बल्कि उसे घिनौना ही बना सकते हैं । बड़े दिल के लोग ही तो धर्म की सुंगन्ध फैलाते हैं, जिनको अब यह नालीनुमा लोग न सुनना चाहते हैं न ही उनकी बात करना चाहते हैं । एक दिन नालियाँ चोक होंगी मगर समंदर बेलौस शांत अपनी जगह उनका इंतेज़ार करता रहेगा,जिनका हृदय इतना छोटा नही की किसी दूसरे के खड़े भर हो जाने से चोक हो जाए....
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