Friday, August 14, 2020

आज़ादी स्पीकिंग ट्री

आजके नवभारतटाइम्स में मेरा स्पीकिंग ट्री....

आज़ादी,जिसके लिए लोग मर मिटना पसन्द करते हैं । क्या यह एक शब्द भर है,बिल्कुल नही क्योंकि एक शब्द के लिए कोई अपने घर आँगन के मिट जाने तक नही जूझा करता है । आज़ादी,एक स्वयं में एक जीवन है, जिसे पाने के लिए इंसान कुछ भी करने को तैयार हो जाता है । आज़ादी से पहले भी एक जीवन होता है, आज़ादी के बाद भी एक जीवन होता है, जिसने पहले वाला जीवन जिया है, वह हमेशा लड़ेगा दूसरा जीवन पाने के लिए और जो दूसरा जीवन ही जी रहा,उसे हमेशा लड़ना होगा इसे बचाए रखने के लिए,क्योंकि यह एक ऐसा शिखर है, जिसपर बहुत कठिन तपस्या के बाद ही पहुँचा जा सकता है ।

हमें लगता होगा कि यह आज़ादी किसी राजा से चाहिए,कोई समझता है कि विदेशी सत्ता की पकड़ से निकलना ही आज़ादी है । कोई कोई यह भी समझता है कि हमारे मन के ठीक विपरीत लोगों की हुक़ूमत की जकड़ से निकलना ही आज़ादी है । वास्तव में क्या यह आज़ादी है या एक जाल से निकलकर दूसरे जाल में फँसने का भरम है । आज़ादी भला है क्या ।

आध्यत्म कहता है, सभी बुराइयों से मुक्ति ही आज़ादी है । तमाम मोह से निकलना ही आज़ादी है । संकीर्णता और असहिष्णुता को त्यागना ही आज़ादी है । वास्तव में हृदय की विशालता ही आज़ादी है, क्योंकि जिस हृदय में भय होगा,जो हृदय जंजीरों से जकड़ा होगा,जो हृदय अपने मन की बात कहते हुए घबराएगा,वह आज़ाद ही कहाँ हुआ है । 

आध्यात्म आत्मा की स्वतंत्रता पर बल देता है । यह सच है, हम जब किसी से आज़ादी माँग रहे होते हैं, तब हम असल मे उसकी बुराइयों से ही आज़ादी माँग रहे होते हैं । भले ही वह कोई राजा हो या शासन सत्ता,असल मे हम उसकी बुराई से व्यथित होकर ही तो उससे मुक्ति चाहते हैं । हम इसे महसूस भले न कर सकें मगर वास्तव में हमारी आत्मा दुःखी होती है और वह इसके विरुद्ध संग्राम करने की इच्छाशक्ति देती है । इंसान कभी भी अच्छाइयों से आज़ादी नही चाहता है, बल्कि बुराइयों से आज़ादी के लिए लड़ता है ।

हम जिस धरती पर हैं, उसमें भी समय समय पर आज़ादी की लड़ाई लड़ी गई मगर यहाँ हमारे बुजुर्गों ने बताया कि हम सिर्फ सत्ता परिवर्तन के लिए नही लड़ रहे हैं । हम वास्तव में मानव जीवन के उत्थान और सत्यमार्ग की स्थापना का संघर्ष कर रहे हैं । हम आज़ादी कुछ सालों के संघर्ष में पा सकते हैं मगर तमाम बुराई से आज़ादी का जो संघर्ष है, वह लंबा चलता है और हमे लंबे रास्तों से घबराना नही चाहिए क्योंकि दीर्घ उन्नति और शांति उसी में छिपी हुई है ।

बहुत मामूली सी बात है कि यदि आपके हृदय में आपके अपने भाई के लिए कटुता है, तो आपको चाहे जो आज़ादी दे दी जाए,आप कभी निर्माण नही कर सकेंगे । जब आपको कटुता से आज़ादी मिल जाएगी,तब आप ऐसी नींव रखेंगे जिनपर महल के महल खड़े किए जा सकें । इसलिए कहा जाता है, पहले अपनी बुराइयों से आज़ादी के लिए संघर्ष करो । खुद बुराइयों से जकड़कर कोई आज़ाद हो ही नही सकता है । हमारे पूर्वजों ने हमेशा उदाहरण दिए हैं, उन्होंने अपने दिलों को बड़ा किया,उसमे सबके सम्मान को जगह दी,सबको बढ़ने का मौका दिया,अन्याय और असत्य के विरुद्ध संघर्ष किया और एक ऐसी ईमारत खड़ी की जिसपर संसार ने अपना खूब प्यार उड़ेला । यह सब वह अपने अंदर की बुराइयों से आज़ादी के बिना नही कर सकते थे ।

बुद्ध कहते हैं, अपने अन्दर की यात्रा करो । कृष्ण कहते हैं, अपने अन्दर झाँको, मोहम्मद अपने अन्दर की आवाज़ को बाहर रखने के पक्षधर रहे हैं । यह कैसे सम्भव है, जब आपके अन्दर बुराइयाँ हों । हर एक इशारा ही तो कर रहा कि अपने अन्दर झाँको और कमियों से मुक्ति पाओ । जब तुम बिना किसी बाधा के,बिना किसी अवगुण की गुलामी के,अपने अन्दर की यात्रा कर सकोगे,तब ही तो तुम्हारे चेहरे पर तेज अपनी छटा बिखेरेगा । 

सत्य,न्याय,भाईचारे की स्थापना के लिए,असत्य,अन्याय और अलगाव से आज़ादी आवश्यक ही नही बल्कि धर्म है । एक इंसान अगर अपने अन्दर की बुराई से आज़ाद हो जाए,तो वह आज़ाद समाज की रचना करेगा । बुराइयों की ग़ुलामी से जकड़ा इंसान कभी भी आज़ाद समाज नही बना सकेगा । क्योंकि कभी न कभी उसकी बुराइयों के हित किसी से टकराएगा और वह अधर्म मार्ग पर पहुँचेगा । दो अच्छाइयाँ कभी आपस मे टकरा नही सकती मगर दो बुराइयाँ कभी न कभी ज़रूर आपस मे टकराएंगी,इसलिए इनके मूल से आज़ादी ही हमारा ध्येय होना चाहिए । आध्यात्म की ऊँचाई पर वही पहुँचा है, जिसने तन मन की बुराइयों से स्वतंत्रता पा ली हो,जो इसमें फंसा हुआ है, उसे अपने अन्दर की आज़ादी के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना चाहिए,जब तक सभी बुराइयों पर विजय न प्राप्त हो जाए ।
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