Saturday, January 9, 2021

गांधी की वापसी

वह जनवरी ही का महीना था । वह आज की ही तारीख़ थी । वह यही ज़मीन थी,बस साल कोई और था,साल 1915...जब इस ज़मीन पर हमेशा के लिए जम जाने वाली जड़ों,जिन्हें लोग अक्सर क़दम कहते हैं, वह पड़े । इस माटी का मोहन लौट आया ।

वह ज़ंज़ीरे जो हर सांस पर कसी हुई थीं,उन्होंने उसके आने की चाप सुनी । वह दिल जो आज़ादी की झलक के लिए धड़क रहे थे, उन्हेंने उसके पाँव की धमक महसूस की । वह गोखले जो अफ्रीका में एक सूरज देख आए थे,उनके दरवाज़े पर उनकी आँखों में वह सूरज उतरते देख रहे थे,इस माटी का मोहन लौट आया था ।

आज के दिन गाँधी अफ्रीका में एक जीत चुकी लड़ाई के योद्धा बनकर अपने आँगन को सँवारने आए थे । लोग उन्हें देखना चाहते थे और वह लोगों में आज़ादी की ललक देखना चाहते थे । लोग उन्हें कुछ हल्का बहुत जानते थे और वह लोगों को कुछ हल्का बहुत जानते थे,फिर आज से एक दूसरे को समझने का सफर शुरू हुआ । दुनिया ने देखा कि वह कैसे एक दूसरे में मिल गए कि इनकीं पहचान ही जुदा नही रही,जो गाँधी थे,वह भारत हो गए और जो भारत था,ह गाँधी हो गया,मिट्टी मिट्टी से मिलकर निखर गई और सौंधी खुशबू हवा में तैर गई ।

आज गाँधी के अफ्रीका से लौटने का दिन है । इस पवित्र मिट्टी का अपने इस बच्चे को महात्मा बनाने के सफ़र को देखिये,कैसे एक माँ अपने बच्चे को महात्मा बनाती है, यह समझने का वक़्त है । जो मुल्क गाँधी की समझ में कम आया था,जब गाँधी ने यात्रा के लिए पांव बढ़ाए, देश उनके सामने खुलता चला गया और कितना खुला की गांधी और देश मे पर्दे जैसा कुछ रह ही नही गया ।

अफ्रीका में गाँधी के नाम के झंडे गड़ चुके थे । उनपर तब ही बायोग्राफी लिखी जा चुकी थीं । अखबारों में कसीदे लिखे जा चुके थे । पहचान पहले ही जम चुकी थी मगर भारत अब भी उनका इंतेज़ार कर रहा था,जो आज के रोज़ खत्म हुआ । आज रौशनी का दिन है....गाँधी की वापसी और हमारे आगे बढ़ जाने का दिन
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