यह तो सभी समझते हैं, फ़र्क़ बस इतना है कि अगर हमारे मज़हब का लीडर मज़हब की शाल ओढ़कर सियासत कर रहा,तो वह हमारी आवाज़ है और अगर कोई दूसरे मज़हब का लीडर,अपने मज़हब की शाल ओढ़कर राजनीति कर रहा,तो वह कट्टर है ।
जिस राजनीति का शिकार बन रहे हो दोस्त,उस राजनीति की जड़े अगर अपने आँगन में जमने दोगे, तो कभी सुक़ून नही आएगा,क्योंकि ज़हर चाहे जिस थाली में रहे, ज़हर ही रहेगा,इसलिए राजनीति और लीडरशिप में कम से कम उन्हें देखो,जो सामने से धर्म की ओट लेकर आपसे वोट नही माँग रहे ।
धर्म जीने का सलीका हो सकता है मगर राजनीति की सीढ़ी नही,फिर वह दुनिया का चाहे जितना बेहतरीन वक्ता हो,कितना ही क़ाबिल इंसान हो अगर उसने अपनी सियासत में मज़हब घोला है, तो यह एक भयँकर धोखा है । हम किसी एक का नाम लिखकर इस शास्वत सत्य को एक कपड़े में समेटना नही चाहते,क्योंकि यह हर दहलीज़ के लिए सच है, कट्टरपन और नफ़रत, कभी भी सुक़ून और तरक्की नही ला सकते,इसे चाहे आज मानो या कल ।
सुक़ून और नफ़रत, आग और पानी की तरह हैं,एक साथ रह ही नही सकते,इसलिए सुक़ून और तरक्की के तलबगार हो तो खुद को मज़हबी सियासी शोरवे से अलग कर लो,वरना वैसे ही हँसे जाओगे,जैसे इन नफरती ताक़तों पर तरस खाते हुए हँसा जा रहे हैं,जो अपना सब गवाकर सिर्फ इस लिए खुश हैं, की सामने वाला तक़लीफ़ में है....
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