एक बार एक नवाब अपने वज़ीरों के साथ नदी पार कर रहे थे । नदी में भयँकर भूचाल आया हुआ था । पानी कभी ऊपर होता, कभी नीचे,नाव हिलती डुलती रहती । नाव में नवाब का एक ग़ुलाम भी था ।
नाव के सभी सवार सतर्क तो थे मगर अपने कामों में भी लगे थे । नदी की बेचैनी तो दिख रही थी मगर नवाब साहब भी शतरंज में लगे हुए थे । मगर नदी के विकराल रूप से डरकर गुलाम बार बार चीख रहा था,रो रहा था,परेशान हो रहा था,जिससे सबके कामों में व्यधान हो रहा था ।
जब गुलाम के फैनहे पन की अति हो गई,तब वज़ीर नवाब से बोला,हुज़ूर कहिए तो इसे चुप कराएं, नवाब ने पंकज त्रिपाठी की तरह अपनी भौं और पलको से इशारा कर दिया । वज़ीर ने पलक झपकते ही गुलाम को नदी में फेंक दिया ।
आठ दस गोते लगाने के बाद ग़ुलाम को बालों से खींचकर वापिस नाव पर ले आए,अब वह नाव के एक किनारे चुपचाप बैठा था । शांत । सयंम और ठहरा हुआ,नवाब को हैरत हुई,तो फिर सवालिया भौं उचकाई...
वज़ीर बोला, हुज़ूर असल में इसने नदी के बुरे रूप को महसूस ही नही किया था,यह डूबना जानता ही नही था,तभी जब नाव में सुक़ून से बैठा था,तो उसे वह ही बुरा वक्त लग रहा था । जब इसे असली बुरे दिन का एहसास हो गया,तो नाव पर बैठे रहने की अहमियत इसे समझ आई ।अक्सर जो अच्छे वक़्त में रोया करते हैं, उन्हें बुरे वक्त का मज़ा ही नही पता होता है, हुज़ूर ।
यह कहानी आज भी सही है, मनमोहन सिंह के वक़्त रोने चिल्लाने वाले भी विकराल नदी में फेंक दिए गए हैं । जहां उनके आँसू पर लोग हंसते हैं, तक़लीफ़ पर भरे पेट से मज़ाक उड़ाते हैं, बस अफसोस यह है कि इनको वापिस नाव पर लाने वाला वज़ीर नही है, वज़ीर है, मगर यह आज भी उसके हाथ पर भरोसा नही कर रहे, उसे पकड़ कर बदतरीन वक़्त से निकलने की कोशिश नही कर रहे....अभी तो हर एक कि बारी आनी है, नफ़रत से खड़ी इमारतें सिर्फ अशांति ही ला सकती हैं, अक्लमंदी इसी में है कि वापिस नाव में बैठ जाओ,उससे पहले की डूबने की नौबत आए...
#हैशटैग #hashtag
No comments:
Post a Comment