ज़मीदार खुद तो लम्बे तगड़े लठैत कोठी पर पाले था । मैं सोचता हूँ की आखिर ज़मींदार को क़िस्से डर, वह तो अपने ही गाँव में है । अपने गाँव में भला कोई डरता है, भला कोई लठैत रखता है । ज़मींदार भी तो उस दिन मुल्हे के इतना कहने से भड़क गया था,जब मुल्हे ने कहा,साहब गाँव में अँधेरा है, रौशनी लगवा दें । बच्चे डर जाते हैं इस फैलते हुए अँधेरे को देखकर ।
अँधेरे पर सवाल उठा मुल्हे ने अपनी जलती हुई मढ़ैय्या देखी, टूटते बर्तन देखे, चीखते बच्चे देखे,मुल्हे पर हर पड़ने वाली लाठी आवाज़ करती हुई कहती,साले,अँधेरे से डरत है । हम गाँव वालों के बीच डरत है । हमारे बच्चे तो हैं नहीं की सिर्फ तुम्हार बच्चे अँधेरे से डरत हैं । हर लाठी से मुल्हे की पीठ पर छूटते लाल निशान तमाम गाँव को अँधेरे से प्यार करना सिखा देते हैं,उन्हें रौशनी चुभती है । वह रौशनी की बात से चीख़ उठते हैं क्योंकि ज़मींदारों ने बताया है की अँधेरा उनकी शाँति के ही लिए है ।
मुल्हे पर हर उठने वाला हाथ खुद के घर में चिराग़ भी रखता है, डरने वाले बच्चे भी रखता है मगर ज़ुबान नही रखता । अगर वह नही डरते तो चार दीवारी क्यों बनाते हैं, लॉकर क्यों रखते हैं, वह डरते हैं, सबसे ज़्यादा मुल्हे की आवाज़ से डरते हैं जानते हैं यह मुल्हे नही बोल रहा है बल्कि बहुत देर से जागा ज़मीर बोल रहा है, वह ज़मीर जो अँधेरे में मंगलू के डरते बच्चों की उन चीख़ों से नही जागा था,वह ज़मीर जो मंगलू की झोपड़ी जलाकर गाँव के अँधेरे के डर को दूर करते वक़्त सो रहा था और हाँ उधर ज़मींदार अपने आँगन में और ज़्यादा तेज़ रौशनी करवा देता है क्योंकि छोटे ज़मींदार झींगुर की आवाज़ से ज़मींदारिन की गोद में दुबक जाते हैं । दुबकना डर नही है न...ज़मींदार के यहाँ डरा नही दुबका जाता है ।
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