Saturday, December 8, 2018

मजाज़

उसे मृत्यु दिख रही थी । वह उसके आकर्षण में चला जा रहा था । मृत्यु का आकर्षण उन गहरी आँखों में साफ़ देखा जा सकता । वह कभी तेज़ तो कभी आहिस्ता मृत्यु की ओर बढ़ता रहा । चलते चलते रास्ते में पर्चे उड़ाता जा रहा था । कोई पर्चा आँसू से भीगा था तो कोई मुस्कुराहट से हवा में तैर गया । किसी के हाथ आया तो कोई बोला यह तो ग़ज़लें हैं, किसी ने कहा यह तो नग़मे हैं ।

वह मृत्यु के आकर्षण में क्या क्या हीरे अपनी जेब से बिखेरता जा रहा था उसे खुद खबर नही । किसी ने कहा वह गरीब है, मतवाला है, बेचारा है, आवारा है । वह इससे भी बेख़बर मृत्यु के होंटो की लरज़त की लज़्ज़त में बस चला जा रहा था । वह जान गया था स्वादों में सर्वोत्तम स्वाद मृत्यु का है, जो सबसे अंत में मिलना है ।
उसने मृत्यु की भीनी भीनी खुशबु पहले ही पा ली थी,वह मृत्यु के आलिंगन में बस चलता जा रहा था । दोनों बाहें फैलाए वह मृत्यु को ललचाई हुई नज़रों के साथ भींच कर गले लगा लेने को आमादा था । उसी रास्ते पर उसकी कुछ पसीने की बूँद गिरी,कुछ हवा उसे छूकर गुज़रीं,कोई मुस्कुराहट आँख से भीगी हुई मुँह के बल कागज़ पर गिरी । ज़माने ने उसे नाम दिया आहंग ।

वह जो मृत्यु के आकर्षण में दुनिया का सबसे आकर्षक इंसान था,वह जा मिला उस इंतज़ार करती बेचैन मृत्यु से और एक बिजली की चमक सर्द रात में दौड़ पड़ी,जिसे चीखकर लोगों ने कहा...ओह मजाज़...मृत्यु मजाज़ को पाकर सुहागन हुई....एक ज़िन्दगी जो मृत्योत्सव हो गई,वह मजाज़ जिसकी चलती साँसे ज़माने में बिखरी रहीं और उखड़ी साँसों ने कसकर ज़माने को बाँध लिया और वह वक़्त कहलाया मजाज़ लखनवी का दौर...

No comments:

Post a Comment