आजका दिन इन दो नामो की वजह से बड़ा खास है।सोनिया गाँधी न परिचय की मोहताज हैं और न यह बताने की हिंदुस्तान की अवाम उन्हें किस क़दर मोहब्बत करती है।सोनिया गाँधी ने राजीव की आँख से जो भारत देखा था उनके जाने के बावजूद उसे अपने सीने से लगा रखा।अपने बच्चों में इंसानियत और दूसरों की इज़्ज़त और जज़्बात की तरबियत दी जो रोज़ ज़ाहिर हो रही।मुझे ख़ुशी है की मुल्क़ को सोनिया ने और सोनिया को मुल्क़ ने बड़ी खूबसूरती से अपनाया।हर दुःख की खड़ी में दोनों साथ रहे।जब सोनिया का साथ राजीव से छूटा तो पूरे देश ने सोनिया को मोहब्बत से लबरेज़ कर दिया।जब मुल्क़ को बेहतर नेतृत्व चाहिए था तो सोनिया ने भी दहलीज़ लांघी।लिखने को काफी है मगर आज सोनिया गाँधी को उनके जन्मदिन पर खूब बधाई।उनके स्वास्थ्य की चिंता है, वह ठीक रहें अभी उनकी बेहद ज़रूरत है।
अब दूसरी महिला हैं रुक़य्या बेगम।दुर्भाग्य से अब पूछियेगा की कौन रुक़य्या।रुक़य्या सखावत हुसैन।बंगाल की रूह रुक़य्या।अबरोध बासिनी लिखने वाली रुक़य्या।जो हमेशा मज़हब की शाल ओढ़कर,मज़हब के आडम्बर,ज़ंज़ीर से उलझती हुई रास्ते बनाती रही।वोह रुक़य्या जिसे सुनने वालों की तादात तब तक बढ़ती ही रही जब तक उसे भुला नही दिया गया।
आजही के दिन 1880 को उन्होंने दुनिया में पहली साँस ली थी और आजकी ही सुबह 1932 में रुक़य्या बेगम ने अपनी आखरी साँस भी ली थी।मैं जब तुम्हे स्त्री विमर्श पर बहस करते देखता हूँ तो खुश होता हूँ की चलो तुम उनकी आवाज़ तो बन रहे हो।मगर दोस्त थोड़ी देर बाद तुम्हे ख़ाली पाता हूँ।जानते हो क्यों।क्योंकि तुमने खुद को कभी खाद पानी दिया ही नही।तुम्हे उन औरतों को पढ़ना होगा।
उठो और कमसेकम आजके दिन रुक़य्या सखावत हुसैन को पढ़ो उनकी अबरोध बासिनी को पढ़ो।मोतीचूर,पदमार्ग और सुल्ताना के ख्वाब को पढ़ो,देखो दिमाग की तहे खोलती यह कैसे उस दौर में ज़मीन पर टिकी।जब न मिले तो उनसे पूछो जिन्होंने इन्हें पढ़ा है।तब डट कर कुरीतियों,आडम्बरो से मुकाबला करो।हर लड़ाई लड़ने से पहले उस लड़ाई को लड़े जाने के पुराने तरीकों को मालूम करना ही अक्लमंदी है।उन महिलाओं को पढ़िए,खोजिए जिन्होंने सदियों पहले दहलीज़ से निकलकर ज़माने की तरक्की के दरवाज़े खोल दिए थे।सोनिया को जन्मदिन की बधाई और रुक़य्या बेगम को नमन।
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