Friday, March 29, 2019

चौकीदार चोर है

तुमने है जब भरी थी हुंकार
सुर्ख होकर दे रहे थे ललकार
प्रधानमन्त्री एक तरफ थे खामोश खड़े
तुम शब्दबाण लेकर उनपर थे टूट पड़े
भृष्टाचरियों की ईंट से ईंट बजेगी बच्चा बच्चा बोला था।
तुम्हारी ओर उम्मीद से देख सारा देश का देश डोला था ।
लाल किले पर चढने की कसम तुमने खाई थी
सीमा के उस पार लाल आंख तुमने दिखलाई थी
तुमने कहा था देश के दुश्मन खींचकर लाएंगे
भरी जनसभा में बोल उठे थे अच्छे दिन आएँगे
जनता ने उठकर तुम्हारा हाथ थाम लिया
लालकिला पहुचाकर तुमको था मान दिया
सन ४७ में भारत ने देखा था एक प्रथम सेवक
तुमने सर उठाकर कहा अब मैं हूँ प्रधान सेवक
रफ्ता रफ्ता साल का साल गुजरता गया
जोश ऐ उम्मीद का ख्वाब धुंधलाता गया
कैसे भूले बतलाओं तुमने पाकिस्तान में बिरयानी खाई थी
बोलो गले नवाज़ के लगकर तुम्हे जराभी शर्म न आई थी
पठानकोट में आईएसआई को जाँच करने बुलवाया था
पहले बार देश का मान सम्मान तुमने बेच खाया था
मेरा देश जिनको ठहरता रहता था आतंकी सर्वस्त्र
तुम मांग रहे थे उन आतंकियों से चरित्र प्रमाणपत्र

फिर भी देश ने धैर्य रख तुम पर उपकार किया
बिन सवालों के फंसी तुम्हारी वैतरणी पार किया
जबतुम लाखों का सूट पहनकर इतराय
तुम पर शक करने से हम सब कतराय
सोचा चलो हममे से कोई तो खुशहाल हुआ
गरीब तुम्हे आशीर्वाद देकर भी बेहाल हुआ
तुमने कराहती जनता का बटुआ था छीन लिया
नोटबंदी के नाम पर बचाखुचा भी था बीन लिया
सारे अर्थशास्त्रियों को हमने झुठलाया
तुमपर भरोसा करके धोखा था पाया
घर घर डिब्बा बोला नोट में तुमने चिप लगवाई थीं
तड़पते भारतवासियों में झूठी बातें खूब चलवाई थीं
तुमने कहा था विकास सबका और साथ सबका
सहम गया था इन मक्कारियों से तबका तबका
कितना भरोसा करके तुमको हम लाए थे
क्या मालूम था उस समय हम पगलाए थे
धर्म को भड़काकर तुमने किया था खूब इस्तेमाल
हम भी मिट गए और बंटकर हो गए खस्ताहाल
तीन तलाक ,कब्रिस्तान और शमशान को भी तुमने याद किया
भाईचारे पर प्राणघातक इस हमले को हमने भी था बर्दाश्त किया

मन में सिर्फ एक ही विचार था चढ़ रहा
मिट भी जाएँ तो क्या, देश तो है बढ़ रहा
देश की पीठ पर तुमने तब ही खंजर था भोखा
बैंक लुटेरों को विदेश भागने पर दिया था धोखा
किसान ने तुमसे अपने पसीने के मोल पर करनी चाही बात
तुमने उनसे मुह मोड़ कर,धूल में मिलाया था उनके जज़्बात 
मायूसी से थक कर था फंदे से वह झूल गया
तुम्हारे दिए दर्द को मरकर था वह भूल गया
खून से भीगी सीमा पर जब सारा देश गमगीन हुआ
“समस्या बोर्डर पर नही दिल्ली में हैं” पर यकीन हुआ
सैनिक मेरे हँसते खेलते शहीद हो रहे थे
तुम पाक-दिवस की मुबारकबाद दे रहे थे
बताओ सबको छोड़ सिर्फ तुमपर एतबार किया था
हमारे इस ही भरोसे को तुमने तार तार किया था
जब भी तुम विदेश जाकर गर्व के साथ मुस्कुराते थे
तरक्की की उम्मीद में सीना फुलाकर हम लहलहाते थे
हमे लगता ही नही था की सपना चकनाचूर हुआ
हमारे जज़्बात से खेलकर कोई बहुत मशहूर हुआ
तुम्हारे विरोध में उठती हर आवाज़ को हमने था चोट दिया
क्या मालूम था की अपने ही हाथ अपना गला है घोंट दिया

तुमपर जब ऊँगली कोई उठाता था
तमतमाकर देश खफा हो जाता था
खुद को कमजोर करके देश ने तुम्हारा था साथ दिया
उस कमजोरी पर चढकर तुमने हमही को बर्बाद किया
नही मालूम था तुम्हे मजबूत करते करते हम इतना बंट जाएँगे
देश के चाँद अमीरों के झोले भरते भरते खुद ही कट कट जाएँगे 
नहीं नौकरी,नहीं शांति और नही रहा हर हाथ काम
बिना कुछ पाए संसार भर में मुफ्त हो गए बदनाम
तुमने सिर्फ यही भरोसा नही तोड़ा है
भरे मंझदार में हमारा हाथ छोड़ा है
अर्थव्यवस्था हो या हो समाजनिति
तुमने यहाँ सिर्फ किया है राजनीति
जब देश को अटल के जाने के दुःख का था सदमा
तुम अस्थिकलश से वोट पाने का देख रहे थे सपना
प्रचार के सिवा कब तुमने था देश का सम्मान किया
अहंकार में अपनी ही धरोहर का तुमने अपमान किया
देश सारे भेद है जान गया
चौकीदार चोर है जान गया

बांटने वाले हर इंसान को हमने लिया है पहचान 
सबक इसी वक़्त देंगे मिलकर सबने लिया है ठान
धर्म हमारा है,भगवान हमारे हैं,गंगा मेरी है माई 
झूठे धोखेबाज़ को मिटा डालने की कसम है खाई
अब तो पूरा देश है बोल रहा
अहंकार का सिंघासन डोल रहा
तुमको प्रचंड,निरंकुश,असीमित दी थी शक्ति
देशहित छोड़ तुमने सौदागरों की थी भक्ति
जिसके केवल बोल में नही बल्कि हृदय में हो भारत माता
ऐसे सच्चे,सभ्य,साहसी और सरल नेत्रत्व ही आशीष है पाता
तुम ऐसे सम्मान के अब अधिकारी नही हो
व्यथित भारतियों के अब नितिनिर्धारी नही हो
जाओ झोला उठाओ या बन जाओ फ़कीर
देश अब खींचने जा रहा है एक नई लकीर
जहाँ समर्पण होगा,त्याग होगा और दूर रहेगा अहंकार
नौजवान,किसान और कमजोर से दूर हटेगा अन्धकार
हम साथ मिलकर हर एक का भविष्य चमकाएँगे
जगमगाते भारत को विश्वगुरु बनाकर दिखलाएँगे
यह देश, हाँ सुन लो, यह देश अब बंट सकता नही
नफरत से चाक दिलों को अब कोई कर सकता नही

जाओ तुम्हरा युग जो युग था ही नही समाप्त हुआ
हमे गलती सुधारने का दिव्यज्ञान अब है प्राप्त हुआ 
जाते जाते तुमको सदियाँ करेंगी खूब याद
जिसने चलते पहियों को कर दिया था बर्बाद
चलो की आई अब चला चली की बेला
तमाम भीड़ में खुद को देख तो अकेला
मुश्किल में न कोई तेरा साथी है और न ही है कोई संगी
अहंकार के नशे में देख तूने क्या क्या छोड़ दिया हुडदंगी
हर साथी की पीठ में छूरा भोखा था
तू भूल गया की पाल रहा धोखा था
(Written by hafeez kidwai )

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