Sunday, March 10, 2019

नयापन बनाम पुरानापन

मुझे नई चीज़ों से उलझन होती है।मज़ा पुराने सामान में आता है।जब किसी के यहाँ जाऊ तो उसके नए बर्तन में खाना हमे रोकता है।मै चाहता हूँ की वह हमे पुराने कप में चाय दे।उसमें जिसे उसने सैकड़ो बार धोया हो।अपने होंटो से लगाया हो,तब तो अपनापन है।नहाते में जब कोई मेज़बान नई तौलिया देता है तो वह जिस्म में परायापन पैदा करता है।मुझे तो वह घिसा, पिटा तौलिया ही पसन्द है जो सैकड़ो बार उनके बदन को सुखाता रहा हो।

मुझे नई चादरों में नींद नही आती।यहाँ तक नया टूथ ब्रश भी तकलीफ देता है।मुझे अपना पुराना बिखरा सा ब्रश पसन्द है।मैं जब चाहता हूँ इस ब्रश को बदलना तो विरह की वेदना से गुज़रता हूँ।चमकदार नए जूते पैरों को सही रास्ता नही दिखाते।सड़क पर जम कर घिसा जूता मेरी पहली पसन्द है।पता नही क्या शौक़ है।खैर है तो है।पुरानी पीली किताबो में तो मैं बसता हूँ।उसका हर पन्ना हमें सुकून देता है।उस किताब को मैं महसूस कर पाता हूँ।

कभी हँसी आती है,कभी रोना,मगर दोनों ही सूरत में आँसू आ जाते हैं।अब उन्हें अगर नए रुमाल से पोछू तो आँखे सुर्ख़ हो जाए इसलिए पुराना रुमाल भी मेरे शौक में शुमार है।मुझे कपड़ों की प्रेस तो बेहद चुभती है, पैंट की क्रीज़ से बड़ा दम घुटता है।मुझे चमकती चमचम दीवारों से काई लगी बेदम दीवारें ज़्यादा अपनेपन का एहसास देती हैं। तमाम पेंट के मुकाबले चूने से पुती दीवारें दिल मे खुशियाँ भरती हैं । खैर कुछ काम तो दूसरों के लिए करने पड़ते हैं इसलिए बहुत कुछ चाहकर नही कर पाता। यहाँ तक नए पोस्ट से हमे पुराने पोस्ट ज़्यादा अच्छे लगते हैं तभी वह बार बार सामने रखते रहते हैं जैसे की यही...

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