वह पीढ़ी कितनी खुशकिस्मत थी जिसने कम से कम सीना ठोककर आपातकाल लगाने वाली लीडर भी देखा और उनसे टूटकर लड़े भी ।
यह तो हम अभागी पीढ़ी हैं, जिन्हें आपातकाल लगाए बिना आपातकाल से कठिन समय से गुज़रना पड़ रहा है ।
यह चालाकी उस समय के लीडर में नही थी कि बिना आपातकाल की घोषणा किये भी तमाम साँसे क़ैद की जा सकती हैं । वह नही जानते थे,जो मीडिया आपातकाल की घोषणा से उनके सामने लेट जाती थी,वह बिना आपातकाल लगाए भी लिटाई जा सकती थी ।
इमरजेंसी लगाने वाले सूत्रधार के असली वंशज वहीं मौजूद हैं, जहाँ बिना इमरजेंसी लगाए,अपने मुख़ालिफ़ हर आवाज़ को दबा दिया जा रहा है । इमरजेंसी हमारे लिए एक सबक़ थी कि अगर हमने ज़रा सी लापरवाही की तो कोई भी खुद को मिली ताक़त का दुरुपयोग कर बैठेगा ।
इंदिरा गाँधी साहसी थीं, गलती किया तो सबके सामने किया । गलती की सज़ा भुगती और फिर उसी जनता में वापिस भरोसा जीता,जिस जनता से वह हारी थीं ।
जिन्होंने इमरजेंसी झेला था,वह अपने सीने पर हाथ धर कर कहें कि जो आजके हालात हैं, यह ज़्यादा बुरे हैं या वह ज़्यादा बुरे थे । हमे इमरजेंसी पर ज्ञान देने की आवश्यकता नही है क्योंकि 1857 से आजतक हर बुरी और गुलामी भरी बात के ख़िलाफ़ हमारे आँगन से आवाज़ उठी है । अगर इंदिरा और मेनका गाँधी के पति संजय गाँधी की ज़्यादती के खिलाफ बोला है, तो आज भी बोलेंगे । घोषित इमरजेंसी से हमेशा बुरी और पीड़ादायक अघोषित इमरजेंसी होती है ।
हिम्मती लीडर सामने से आते हैं । जनता की आंख में आंख डालकर बात करते हैं । अगर मन में अपने मुख़ालिफ़ आवाज़ को दबाने का भाव आए भी तो खुली इमरजेंसी लगाते हैं । जिनमे हिम्मत नही होती है, वह पर्दे के पीछे छिपकर इमरजेंसी जैसे हालात थोप देते हैं ।
आज लड़ाई ज़्यादा मुश्किल है । आज ख़ुद को खड़ा रखना ज़्यादा मुश्किल है । बकौल एक बड़े संगठनकर्ता के इमरजेंसी में मीडिया से बैठने को कहा गया,वह लेट गया । हम आज कहते हैं, मीडिया से लेटने को कहा गया,वह सामने से सिपाही बनकर खड़ा गया ,यह मीडिया उनपर सवाल ठोकता है, जिनके सवाल उसे उठाने थे ।
इमरजेंसी का अगर दुःख वास्तविक है, तो लालू यादव,मुलायम सिंह जैसे लीडर्स की इज़्ज़त करना सीखें,जिन्होंने मुकाबला किया । इनको हटाकर इमरजेंसी का दुःख जताना बेईमानी और मक्कारी है ।
इमरजेंसी को याद करिए मगर यह जानकर की वह इतने बुरे दिन नही थे । इंदिरा और मेनका के पति संजय को कोसिए मगर यह जानकर की आज इंदिरा के दो बेटों में से जो एक इमरजेंसी का जनक था,उसकी नस्ल सत्ता में है और जिस बेटे का इमरजेंसी से कोई ताल्लुक नही था,उसकी नस्ल विपक्ष में है, यहीं से आपको अपना रास्ता तय करना है, वर्तमान देखिये,भविष्य सुधारिये,बस...
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