प्रख्यात साहित्यकार प्रेमचंद उन दिनों साहित्यिक पत्रिका हँस निकाला करते थे । प्रेमचंद के ही दौर में एक लेखक उभरे भुवनेश्वर । जिनका एकांकी लेखन में बड़ा स्थान रहा है । भुवनेश्वर के साहित्यिक सफर में प्रेमचंद का अद्भुत योगदान रहा है, उनकी पत्रिका हँस में भुवनेश्वर को तब महत्वपूर्ण जगह दी जब यह लेखक अपने व्यवहार से हर एक से अलग थलग था ।
एक दिन प्रेमचंद के एक सहयोगी ने उनसे पूछा कि आप उस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकते हैं, जो नित नित नए बहाने बनाकर सबको तो ठगता ही है, वरन आपको भी ठग ही रहा है । वह व्यक्ति जो हर एक को झूठे झांसे में फँसाता है, उससे आपको इतना स्नेह कैसे हो सकता है । प्रेमचंद उत्तर देते हुए कहते हैं, निःसन्देह उसने हमें ही नही हर एक को ठगा है, झूठ बोला है और प्रपंच किया है । मगर उसका लेखन अद्भुत है, उसके बुरे व्यवहार के कारण उसकी अद्भुत प्रतिभा को नकारा नही जा सकता है । पाठक तक उसके लेखन को पहुँचना चाहिए भले ही हमे उसका व्यवहार कितना ही झेलना पड़े । हम पाठक को अच्छी रचना से वंचित रखने का पाप नही कर सकते हैं ।उनके साथी निरुत्तर हो गए ।
यही हमारे लिए भी प्रेमचंद का संदेश है कि किसी की खूबियों को फैलाने का मौका नही छोड़ना चाहिए,भले ही उसका व्यवहार कैसा हो ।
खूबियों पर समाज का अधिकार है और व्यवहार पर हमारा कर्तव्य है कि उसका सामना करें । लेखन और व्यवहार को समान मानने की न गलती करनी चाहिए और न ही भरम पालना चाहिए । इनमे जो भी बेहतर हो उसको ऊंचा स्थान देना चाहिए,इसलिए प्रेमचंद ने कभी भी भुवनेश्वर के लेखन को नज़रंदाज़ नही किया,बल्कि उनकी जो बातें ठीक नही थीं,उसे नज़रंदाज़ किया ।
(आजके नवभारतटाइम्स में एकदा)
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