लखनऊ से अच्छा खाना कहीं का नही है।साऊथ से बढ़िया खाना कहीं का नही है।मुझसे पूर्वांचल के खाने का बाटी चोखा बर्दाश्त नही होता।मराठा बड़ा पाव का मुकाबला कोई भाई लोग कहाँ कर सकते हैं।खाने को लेकर तरह तरह की सीमाएँ हैं।
आपको बता दें यह भी एक प्रकार की साम्प्रदायिकता है।अपने खाने को श्रेष्ठ और दूसरे को बद्तर समझना ही तो साम्प्रदायिकता है।यह खाने की साम्प्रदायिकता है।बाटी चोखा खाने वाले भोगौलिक क्षेत्र के लिए बाटी चोखा ही महत्वपूर्ण है वहाँ आपकी बिरयानी मुँह बाए खड़ी रहेगी।जहाँ पोर्क खाया जाता है उनके सामने मटन को सर चढ़ाना बेहतर नही।साऊथ की इडली राजस्थान की मिर्च पर ज़बरदस्ती नही चढ़ सकती है।
मैं फिर कह रहा हूँ हमारे साम्प्रदायिकता से लड़ने वाले लोग रँग,भोजन,पेय,कपड़े,हेयर स्टाइल,बोली,भाषा की सांप्रदयिकता को तवज्जो नही देते हैं।यही चीज़ें बड़ी होकर हमे तहस नहस करती हैं।एक पोर्क खाने वाले के बगल में मटन खाने वाले सेक्युलर से सेक्युलर लोग नाक भौं चढ़ाएंगे।लखनऊ के तो मशहूर से मशहूर एक्टिविस्ट अपने खाने को लेकर ऐंठता मिल जाएगा।तब वोह खाने के फ़र्क को बढ़ाएगा।
हैदराबादी ज़िन्दगी भर यही बकते रहेंगे की उनकी बिरयानी मोरादाबाद और लखनऊ से अव्वल है।इतना समझ लीजिये जो मज़ा मेरे लिए हमारे खाने का वही मज़ा दूसरे को उसके खाने के लिए है।शराब पीने वाले को चाय पीने वाला बर्दाश्त नही कर सकता।दूध पीने वाला कोल्ड्रिंक वाले को निचली नज़र से देखता है।पिज़्ज़ा वाला समोसे को दबाता है।तो सत्तू वाला शिकंजी पर शिंकजा कसता है।क्या यह खाने की साम्प्रदायिकता नही है।
खाने में जब हम फ़र्क कर रहे होते हैं तब हमे ज़रा भी गुमान नही होता की हम इस मामले में किस हद तक साम्प्रदायिक हैं।बड़ी बड़ी बातें करने वाले भी अपने ज़ायके के गुलाम हैं।पसन्द नपसन्द तो आपकी हो सकती है मगर आप किसी के खाने को नीचा नही दिखा सकते हैं।जो जिस खाने के सहारे ज़िंदा है वही उसका सर्वश्रेष्ठ खाना है।इसलिए अपने ज़ायके पर राल बहाने से पहले दूसरे किसी ज़ायके का मज़ाक उड़ाने से बचिये।
भूगोल में जकड़ा ज़ायका धर्म की सीढ़ी चढ़ कर कब ज़हर में बदल जाता है, पता ही नही चलता।इसलिए हर एक की भूख,भोजन का सम्मान करना चाहिए।
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