सुभद्रा जोशी,बेग़म अनीस क़िदवई और मृदुला साराभाई यह वह तीन नाम हैं जिनको हमेशा याद रखना चाहिए ।जब कभी दँगे फ़साद हों और दिल करे की इन्हें कैसे रोकें तो इन औरतों की ज़िन्दगी में झाँकिये और देखिये की कैसे जूझा जाता है।
इन तीनों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी ।मगर उससे कहीं ज़्यादा इन्होंने बंटवारे के ज़ख्मो पर फाहे रखने का काम किया ।यह तीनो गाँधी जी के एक इशारे पर लोगों के दर्द को अपना दर्द समझ मिटाने में लग गईं ।
मृदुला साराभाई का काम आखिर हम कैसे भूल सकते हैं ।मखमल के गद्दों और खूबसूरत बड़े बड़े कमरों को छोड़कर उन्होंने खुले मैदान में लगे राहत शिविरों में सेवा करते हुए बहुत सी रातें गुज़ारी हैं ।
बेग़म अनीस क़िदवई ने तो दंगो में अपने शौहर को क़त्ल किये जाने के एक हफ़्ते के अंदर देश के लिए खड़े होने को मजबूर कर दिया ।वह गाँधी जी के सामने थीं और आँसू रुकते न थे,गाँधी जी ने उन्हें भी राहत शिविरों में सेवा में लगाया और वह वहाँ ख़िदमत करते करते अपने हर दुःख को भूल दूसरे के दर्द में शरीक हो गई ।
सुभद्रा जोशी जैसी मिसाल इतिहास में नही है जो दँगाई इलाकों में बेधड़क चली जाए।एक दुबली पतली लड़की दंगाइयों के बीच जाकर उनमे से लड़कियों को छुड़ा लाए,ऐसा जिगरा किसमे था भला ।
कल महिला दिवस है, बहुत सी मशहूर महिलाओं के ज़िक्र निकलेंगे ही मगर थोड़ी ज़हमत करके उन महिलाओं को भी याद कीजिये जिन्होंने अपनी मेहनत,हिम्मत और लगन से इस देश की बुनियाद की ईंटे रखी हैं।जिनके होने से तड़पते दिलों को सुक़ून मिला है ।जो न होती तो हमारी सूरत भी अच्छी न होती ।जिनके हाथों ने घर और चूल्हे से इतर देश को गढ़ा है।जिनके हाथों ने देश को संवारा है।इन तीनों और इनके जैसी अनगिनत उन औरतों को सलाम जिन्होंने हमारे लिए एक खूबसूरत दुनिया बनाने में अपनी ज़िन्दगी लगा दी।
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