Monday, March 19, 2018

केदारनाथ सिंह

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,
उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,
दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में —
भरने लगा एक खोयापन,
बड़ी हो गई कटु कानों को 'चुर-मुर' ध्वनि बाँसों के वन की ।
थक कर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,
प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।
....कल से पढ़ रहें हैं, दिल कह ही नही रहा की केदारनाथ जी को हैं की जगह थे लिखा जाए ।अनगिनत क़िस्से रात से सामने आ रहें हैं, लग रहा बचपन के कोर्स की किताब में बिखरी कविताएँ एक एक करके मिट रहीं हैं ।

सच तो यह है की केदारनाथ जी तब तक ज़िंदा हैं, जब तक कविताएँ हवा में तैर रहीं ।भला कवि और लेखक अपनी रचनाओं से कभी निकल पाते हैं, बल्कि हर शब्द में उनकी आत्मा ऐसे गुँथति है की वह उस हर शब्द में अमर हो जाते हैं ।हम सबके बीच से चलते फिरते बोलते उठते बैठते केदारनाथ जी भले चले गए हों मगर वह खुद तो यहीं हैं, कविताओं में,रोते,मुस्कुराते,हँसते,डाँटते,समझाते हुए,हमारे केदारनाथ जी...

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