Sunday, March 11, 2018

अन्न दाता के पाँव

कोई उन्हें अन्न दाता लिख रहा है तो कोई उनकी टूटी चप्पलों को वाल पर सजाए है ।कोई पैरों में फटी बिवाइं की तस्वीर लगाए है तो कोई तलवों से रिसते ख़ून की तस्वीर उकेर रहा ।यह महाराष्ट्र के किसानो के उन क़ाफ़िले की धूल है जो सैकड़ो किलोमीटर और हफ्तों बाद हम सबकी आँखो में घुसी है ।

कभी सोचियेगा की कोई यह तस्वीरें क्यों लगा रहा,कोई इन्हें क्यों लिख रहा,हर अल्फ़ाज़ से आपको यह शिकायत नही लगती की वह आपके दिल की कुण्डी खटखटा रहा,की यार अब तो जाग जाओ।यह सारे लोग चाहते हैं की इन तस्वीरों से ही सही,उनके पाँव की गुलथियाँ और जूझने की इस कसमसाहट पर तो जागो ।

आज भी हमेशा की तरह सुबह होगी ।मेज़ पर बढ़िया नाश्ता भी होगा ।यह तस्वीरें भी होंगी और हम आँख फेर कुछ अच्छा देखने पढ़ने की ख्वाहिश लिए अनाज को नए नए रूप और रँग में गटकते हुए आगे बढ़ जाएँगे ।

कोशिश करियेगा की उन किसानों की आवाज़ बन जाइये ।अब न वह तोड़फोड़ में हैं, न दँगे फ़साद में,वह तो चुपचाप बढ़ रहें हैं अपनी ज़िन्दगी में एक अदद ख़ुशी के लिए ।पार्टी,धर्म,विचार,वर्ग,जाति से ऊपर उठकर इन बढ़ते हुए क़दम को आराम दीजिये ।इनकी ख़िदमत कीजिये ।जो महाराष्ट्र में उन तक नही पहुच सकते वह अपने दरवाज़े खोल दें,किसानो की जितनी हो सके मदद करें ।
मुझे गाँधी इनके हर कदमो में नज़र आ रहें,लग रहा वह कह रहें की जाओ और वह लेलो जो तुम्हारा है मगर उस तरफ नज़र भी मत उठाना जो दूसरों का है ।तभी तो वह किसान सिर्फ अपने हक़ की माँग के लिए क़दम दर क़दम चलते जा रहें हैं ।कुछ क़दम हम भी उनके लिए चल लें या बात करलें या समर्थन दे दें तो उनकी फीलियों में ताक़त बढ़ जाए,जो कल आने वाली नस्लों के लिए फिर खेत में होगी...

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